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Thursday, July 30, 2026

प्रेमचंद ने हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल दिया : प्रो. तारिक छतारी



सीसीएस विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में "प्रेमचंद : फ़िक्र-ओ-फ़न के आईने में" विषय पर ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित

नित्य संदेश ब्यूरो

मेरठ। प्रेमचंद पर पुनः गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। कुछ लोगों का मानना है कि प्रेमचंद ने केवल राजनीतिक और आर्थिक समस्याओं पर लिखा तथा प्रगतिशील कहानियाँ लिखीं। प्रेमचंद ने अरबी और फ़ारसी का भी अध्ययन किया था, किंतु अपनी सरल एवं सहज भाषा-शैली के माध्यम से उन्होंने प्रतीकों और रूपकों का प्रभावी प्रयोग किया। उनकी कहानियाँ "दो बैलों की कथा" और "रोशनी" आदि में राजनीतिक तथा सामाजिक समस्याओं का सशक्त चित्रण मिलता है। ये विचार प्रसिद्ध साहित्यकार एवं अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ के उर्दू विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रोफेसर तारिक छतारी ने उर्दू विभाग एवं आयुसा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित ऑनलाइन कार्यक्रम "प्रेमचंद : फ़िक्र-ओ-फ़न के आईने में" विषय पर अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि प्रेमचंद ने हिंदू-मुस्लिम एकता पर विशेष बल दिया। "बड़े घर की बेटी" धन-दौलत से नहीं, बल्कि अपने आचरण और संस्कारों से बड़े घर की कहलाती है। यदि प्रेमचंद ने समाज की सच्चाइयों को सामने रखा, तो वे दलितों के विरोधी नहीं थे, बल्कि समाज की वास्तविकता को स्पष्ट करना चाहते थे। कार्यक्रम का शुभारंभ सईद अहमद ने पवित्र कुरआन के पाठ से किया। अध्यक्षता प्रोफेसर तारिक छतारी की रही। मुख्य वक्ता के रूप में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. सगीर अफ़राहीम उपस्थित रहे। लखनऊ से आयुसा की अध्यक्ष प्रोफेसर रेशमा परवीन भी कार्यक्रम में शामिल हुईं। स्वागत भाषण मोहम्मद ज़ुबैर ने दिया। कार्यक्रम का संचालन सैयदा मरियम इलाही ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन लिमरा ने प्रस्तुत किया। प्रसिद्ध साहित्यकार एवं आलोचक प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि मुंशी प्रेमचंद अपने समय में भी महान थे और आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं। उनकी रचनाओं के अनेक ऐसे पक्ष हैं, जो पहले स्पष्ट नहीं थे, लेकिन अब सामने आ रहे हैं। प्रेमचंद की कहानियाँ और उपन्यास आज भी अपनी महत्ता बनाए हुए हैं। उन्होंने उर्दू कथा-साहित्य को गाँव-गाँव तक पहुँचाने का कार्य किया। प्रेमचंद उर्दू और हिंदी दोनों भाषाओं के साझा साहित्यकार हैं। हिंदी और उर्दू, दोनों ही भाषाओं के साहित्यकार उन्हें अपना मानते हैं। उर्दू और हिंदी के विकास में उनका अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान है।


प्रोफेसर सगीर अफ़राहीम ने कहा कि प्रेमचंद जिस युग में साहित्य के क्षेत्र में आए, यदि उस समय को वैचारिक दृष्टि से देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि वे अपने पूर्वजों की साहित्यिक परंपरा से अत्यंत प्रभावित थे। उनके साहित्य में देशभक्ति और राष्ट्र-समर्पण की भावना स्पष्ट दिखाई देती है। वे अपने पात्रों के संघर्ष और संवादों के माध्यम से अत्यंत प्रभावशाली वातावरण का निर्माण करते हैं। उन्होंने समाज की वास्तविकताओं को जिस कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया, वह अत्यंत महत्वपूर्ण है। उनकी शैली स्थायी प्रभाव छोड़ने वाली है। प्रेमचंद ने अपनी भाषा में उर्दू, फ़ारसी के साथ-साथ ग्रामीण बोली का भी प्रयोग किया। उन्होंने फ़ारसी के साथ ऐसे हिंदी शब्दों का प्रयोग किया जो आम जनता के लिए सहज और परिचित थे। अपने कथ्य को प्रभावशाली बनाने के लिए उन्होंने वर्णन-शैली पर विशेष ध्यान दिया। प्रेमचंद ने कभी भी उग्रता का मार्ग नहीं अपनाया। सदियों तक प्रासंगिक बने रहने की विशेषता उनके साहित्य में विद्यमान है। उन्होंने खेत-खलिहानों के साथ-साथ ग्रामीण चौपालों के जीवन को भी अत्यंत जीवंत रूप में प्रस्तुत किया है। उनके समय में भी उनके साहित्य का अनुसरण किया गया और आज भी उनकी प्रासंगिकता बनी हुई है।

आयुसा की अध्यक्ष प्रोफेसर रेशमा परवीन ने कहा कि आज का यह कार्यक्रम अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रेमचंद की कहानियाँ "दो बैलों की कथा", "कफ़न" तथा उनके उपन्यास "निर्मला" और "गोदान" आदि में भारतीय गाँवों की समस्याओं का अत्यंत यथार्थ चित्रण मिलता है। मेरे लिए आज का यह कार्यक्रम अत्यंत महत्वपूर्ण रहा। इस अवसर पर मोहम्मद ईसा राना ने "प्रेमचंद की समकालीन प्रासंगिकता" विषय पर अपना शोध-पत्र प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में डॉ. आसिफ अली, डॉ. इरशाद स्यानवी, फरहत अख्तर, मोहम्मद शमशाद तथा अन्य छात्र-छात्राएँ भी ऑनलाइन माध्यम से जुड़े रहे। 

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