नित्य संदेश। भारत में मेडिकल शिक्षा को विश्वस्तरीय बनाने की बातें तो बार-बार की जाती हैं, परंतु वास्तविकता इसके बिल्कुल उलट दिखाई देती है। मेडिकल कॉलेजों में योग्य शिक्षकों की भारी कमी है, और इस कमी को पूरा करने के लिए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) द्वारा कम योग्य चिकित्सकों को शिक्षक बनने का अवसर देना एक गहरी चिंता का विषय है।
आज के समय में जहाँ मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता से समझौता नहीं होना चाहिए, वहीं दूसरी ओर आरक्षण या अन्य कारणों से कम योग्यता वाले लोगों को शिक्षण पदों पर बैठाना, चिकित्सा शिक्षा को खोखला बना रहा है। यही नहीं, एक अनुभवी व वरिष्ठ प्रोफेसर को डीजीएमई (DGME) का पद न देकर, एक कम उम्र के गैर-चिकित्सक आईएएस अधिकारी को यह जिम्मेदारी देना, मेडिकल शिक्षा की गंभीरता के साथ खिलवाड़ है। क्या यह उचित नहीं होगा कि जिस क्षेत्र का संबंध मानव जीवन से है, वहाँ नेतृत्व की जिम्मेदारी उन्हीं को दी जाए जिनके पास वर्षों का चिकित्सकीय अनुभव हो?
जब एक प्रोफेसर अपने जीवन के 25–30 वर्ष चिकित्सा शिक्षा और शोध को देता है, तो उससे बेहतर नीति निर्धारण और संस्थागत नेतृत्व कौन कर सकता है? यदि वास्तव में सरकार मेडिकल शिक्षा का स्तर ऊँचा बनाए रखना चाहती है, तो तत्काल प्रभाव से योग्य व वरिष्ठ मेडिकल प्रोफेसरों को DGME जैसे पदों पर नियुक्त करना चाहिए, तभी मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता को बचाया जा सकता है और भावी डॉक्टरों को उचित मार्गदर्शन मिल सकेगा। मेडिकल शिक्षा कोई प्रयोगशाला नहीं है जहाँ अप्रमाणिक प्रयोग किए जाएँ। यह समाज और आने वाली पीढ़ियों के स्वास्थ्य का आधार है।
प्रस्तुति
डॉ. अनिल नौसरान
संस्थापक, नेशनल यूनाइटेड फ्रंट ऑफ़ डॉक्टर्स

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