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Friday, August 14, 2026

​निर्गुण भक्ति के दोहों से झंकृत हुई वामा साहित्य मंच की मासिक गोष्ठी

सपना सी.पी. साहू 

नित्य संदेश, इंदौर। जीवन के गूढ़ अर्थों को उद्घाटित करने वाले निर्गुण भक्ति के कवियों के दोहों की प्रस्तुतियों से वामा साहित्य मंच की मासिक गोष्ठी गूंज उठी। "मोको कहां ढूंढे रे बन्दे" विषय पर आयोजित इस बैठक में भक्तिकालीन संतों और कवियों के दोहों को विशेष रूप से रेखांकित किया गया। कबीर जन-जागरूकता आंदोलन से जुड़े सुरेश पटेल के मुख्य आतिथ्य में कार्यक्रम का आरंभ हुआ। प्रतिमा जाट द्वारा प्रस्तुत सरस्वती स्तुति और कबीर पंथ की गायिका अंजना सक्सेना ने मधुर भजन की प्रस्तुति दी। इस अवसर पर संस्था उपाध्यक्ष वैजयंती दाते ने शब्द-पुष्पों से उपस्थित जन का अभिवादन करते हुए कहा कि दोहे के सीमित शब्दों में भी बहुत बड़ा कहने की असीम शक्ति समाहित होती है, जो जन-मानस की चेतना को झकझोर कर बदलाव की बयार बहाने की क्षमता रखती है।

मुख्य अतिथि सुरेश पटेल ने कहा कि कबीर तब तक जिंदा रहेंगे जब तक स्त्रियों के कंठ में श्वास है। केवल सफल पुरुष ही नहीं, सफल स्त्रियों के पीछे भी पुरुषों का हाथ होता है। स्त्रियों को हम जो देते हैं वे उसे ज्यादा लौटाती हैं, इसलिए यदि उन्हें तकलीफ भी देंगे तो वे ज्यादा लौटाएंगी; अतः यह विचार करके ही दें। उन्होंने ज्ञानमार्गी महिला संतों में मीरा, गार्गी, मैत्रेयी, सहजोबाई का नाम लिया तथा ललेश्वरी को कश्मीरी भाषा को नए शब्द देने वाली संत बताया। उन्होंने कहा कि राधा रानी एक काल्पनिक पात्र थीं और राजस्थान के चित्रकार ने जब उनका पहला चित्र बनाया तो वे 'भारतीय मोनालिसा' कहलाईं। जिन संतों ने ज्ञान परंपरा चलाई वे कभी पढ़े-लिखे नहीं रहे और न ही किसी विश्वविद्यालय गए। कबीर जुलाहे थे, रैदास जूते बनाते थे, दादू रुई धुनकते थे; किंतु संतों ने कभी अपना कर्म और धर्म नहीं छोड़ा। वे गांव-गांव गए और समरसता का संदेश दिया। कबीर केवल देश में ही नहीं, अपितु विश्व स्तर पर व्याप्त हैं। वे मानते थे कि जब प्रकृति, पेड़ और नदियां भेद नहीं करते, तो इंसान भेद करने वाला कौन होता है।

इस अवसर पर क्रांति चतुर्वेदी और अनिल कर्मा ने पधारकर मंच का सम्मान बढ़ाया। क्रांति चतुर्वेदी ने कहा कि वे वामा-सखियों के विचारों और गतिविधियों को पढ़ते हैं व इनसे उनका निरंतर जुड़ाव बना रहता है। वहीं अनिल कर्मा ने कबीर को केवल एक संत के रूप में न देखकर एक पत्रकार के रूप में देखा। उन्होंने कहा कि खबर और सत्य के बीच का फर्क जैसे-जैसे कम होगा, पत्रकारिता सत्य होती जाएगी।

कार्यक्रम में मंच से जुड़ी लेखिकाओं में श्रुति शर्मा ने 'माला फेरत युग गया', डॉ. भावना बर्वे ने 'काठ की पुतली', मृदुला शर्मा ने 'हमन है इश्क मस्ताना', सृष्टि उपाध्याय ने 'बुरा जो देखन मैं चला', आशीष होरा ने 'शबद कोई बोले राम-राम', डॉ. शोभा प्रजापति ने 'दुर्बल को न सताइए', भावना दामले ने 'ऐसा चाहूं राज मैं', अमिता मराठे ने 'कबीर कूता राम का', सुषमा शर्मा श्रुति ने 'ऐसी वाणी बोलिए', पद्मा धर्माले ने 'मत कर माया को अहंकार', आशा मानधन्या ने 'ऐसी बानी बोलिए', आशा गर्ग ने 'जब मैं था तब हरि नहीं', डॉ. आराधना तिवारी ने 'पाहन पूजे हरि मिले', जयश्री उपाध्याय ने 'नहाए धोए क्या हुआ', आशा मुंशी ने 'धीरे-धीरे रे मना', रेखा पाठक ने 'करम बंधन में बंध रयो', अनीता जोशी ने 'चाह गई, चिंता गई' तथा माधवी तारे ने 'मन लाग्यो यार फकीरी में' दोहों को विवेचित किया।

आयोजन की संयोजक कविता अर्गल एवं अवंति श्रीवास्तव रहीं। सूत्रधार की भूमिका निधि जैन ने निभाई तथा आभार अनुपमा गुप्ता ने व्यक्त किया। इस अवसर पर मंच की अनेक सदस्याओं की गरिमामयी उपस्थिति रही।

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