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Thursday, August 13, 2026

समष्टि जगत में भगवान आकर साधु-संतों की रक्षा करते हैं: स्वामी अनंतानंद

 


नित्य संदेश ब्यूरो

मेरठ। आभा मानव मंदिर वरिष्ठ नागरिक सेवा सदन में शुभम करोति फाउंडेशन द्वारा आयोजित श्री रामचरितमानस ज्ञान यज्ञ सप्ताह के दूसरे दिन महामंडलेश्वर स्वामी अनंतानंद आनंद सरस्वती महाराज ने चर्चा करते हुए कहा की आत्मा ही ब्रह्म है। हम अपने आराध्य रूप का चिंतन करते हैं और यह चिंतन करते-करते ही हमें अपने आत्म दर्शन प्राप्त हो जाते हैं। भगवान राम का जो स्वरूप है वह मन बुद्धि इत्यादि के द्वारा समझ में नहीं आ सकता है। 


उन्होंने कहा कि भगवान राम के जीवन में ऐश्वर्य प्रकट नहीं हुआ। उन्होंने बताया जब प्राण संकट में आ जाएं तो उस समय असत्य का भी सहारा लेना पड़े तो कोई दोष नहीं लेकिन बाद में उस असत्य का प्रायश्चित कर लेना चाहिए। उन्होंने बताया कि किसी का पैसा चुराना ही चोरी नहीं है ऐसा जीवन जीना जिसमे मनुष्य केवल अपने बारे में ही सोचे , यह भी चोरी ही है। जो हमारे कर्तव्य हैं उनको विस्मृत करना भी एक चोरी है जैसे माता-पिता ने हमारी सेवा की ऐसे ही समय आने पर हमें अपने माता-पिता की सेवा करनी चाहिए। भगवान की कृपा से सब कुछ मिला है तो उन्हें थोड़ा-थोड़ा हमें स्मरण करना चाहिए, उनका आभार प्रकट करना चाहिए।


समष्टि जगत में भगवान आकर साधु-संतों की रक्षा करते हैं। आपके पास जो भी शक्ति है, सामर्थ्य है उसको केवल अपने भोग के लिए, अपने स्वार्थ के लिए उपयोग न करें।  जब निष्कामता आ गई तो यही कर्म योग हो जाता है, जब सबके लिए प्रेम हो जाएगा तो यही प्रेम योग हो जाता है, जब आपका ज्ञान सबके लिए उपयोगी हो जाए तो यह ज्ञान योग हो जाता है। जय और विजय का प्रसंग सुनाया कि किस प्रकार भगवान की सेवा मिलने पर दोनों को अहंकार को किया था। जय विजय ही रावण व कुंभकरण बने। 


महाराज जी ने बताया कि हमारी इंद्रियों का स्वामी मन है। ध्यान के द्वारा ही मन का नाश हो पता है। जब आप ज्ञान रूपी, साधना रूपी ,संयम रूपी जाल मन  ऊपर डालते हो तो मन धीरे-धीरे शांत हो जाता है। उन्होंने कहा पहले लोग साधन, भजन, दान इत्यादि बहुत छुपा कर करते थे कि किसी को पता न चल जाए लेकिन अब सब बता कर और दिखा कर करते हैं। एम एल अग्रवाल, आर एस पी एस बरुनिया, सुभाष शर्मा, सुशील बंसल, कन्हैया शर्मा आदि उपस्थित रहे।

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