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Thursday, August 13, 2026

स्वतंत्रता के संदर्भ में उर्दू में खूब कार्य हो रहा है: प्रोफेसर सगीर अफराहीम



चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में “स्वतंत्रता संग्राम और भारतीय साहित्य” विषय पर ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित।

नित्य संदेश ब्यूरो

मेरठ। भारत की स्वतंत्रता में भाषा और साहित्य की अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका रही है। मैं पूरे विश्वास के साथ कह सकती हूँ कि यदि उर्दू भाषा और साहित्य की भूमिका न होती तो देश की स्वतंत्रता संभव नहीं थी। वर्ष 1857 से पहले के समय को देखें तो पता चलता है कि लगभग दो सौ वर्षों में लिखा गया साहित्य हमारे चेतना-बोध को जागृत करने और स्वतंत्रता की भावना को अभिव्यक्त करने का महत्वपूर्ण माध्यम रहा है। लोगों के भीतर जागरूकता उत्पन्न करने और प्रतिरोध की भावना को मजबूत करने के लिए भी बहुत कुछ लिखा गया। 1857 के बाद जब स्वतंत्रता का संघर्ष व्यावहारिक रूप से सामने आया तो अनेक आंदोलनों को गति मिली। अंग्रेजों के विरुद्ध जन आंदोलनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मीडिया ने भी इसमें उल्लेखनीय योगदान दिया। लेखकों ने मीडिया का सहारा लेकर स्वतंत्रता संग्राम की आवाज को जनता तक पहुँचाया।


ये विचार प्रोफेसर आमिना तहसीन ने ‘आयुसा’ और उर्दू विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित “स्वतंत्रता संग्राम और भारतीय साहित्य” विषयक ऑनलाइन कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में अपने संबोधन के दौरान व्यक्त किए। उन्होंने आगे कहा कि मौलाना अबुल कलाम आज़ाद और हसरत मोहानी के समाचार-पत्रों को बंद कर दिया गया था। अनेक स्वतंत्रता सेनानियों ने पत्रकारिता के माध्यम से महत्वपूर्ण कार्य किया। तमिल और तेलुगु भाषाओं में भी ऐसा साहित्य मिलता है, जिसमें स्वतंत्रता की भावना और संघर्ष की अभिव्यक्ति हुई है। विभिन्न भारतीय भाषाओं की महिलाओं ने भी स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय भावनाओं को लेकर उल्लेखनीय लेखन किया। रुकैया सखावत हुसैन ने बंगाली में, सुभद्रा कुमारी चौहान ने हिंदी में, रमाबाई ने मराठी में तथा सुब्बालक्ष्मी ने तमिल के साथ-साथ उर्दू में भी उपन्यासों, कहानियों, कतआत आदि के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित महत्वपूर्ण साहित्य की रचना की। इससे पूर्व कार्यक्रम का आरंभ मोहम्मद नदीम द्वारा पवित्र कुरआन की तिलावत से हुआ। फरहत अख्तर ने नातिया कलाम पेश किया। अध्यक्षता  प्रोफेसर सगीर अफराहीम ने की।


मुख्य अतिथि के रूप में प्रोफेसर आमिना तहसीन, विभागाध्यक्ष, महिला अध्ययन विभाग, मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद ने सहभागिता की। विशिष्ट अतिथि के रूप में डॉ. कहकशाँ लतीफ़, मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद उपस्थित रहीं। वक्ताओं के रूप में प्रोफेसर मोहम्मद अहमद खान, मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद तथा डॉ. मुश्ताक अहमद वानी, पूर्व अध्यक्ष, उर्दू विभाग, बाबा गुलाम शाह बादशाह विश्वविद्यालय, राजौरी ने कार्यक्रम में भाग लिया। इस अवसर पर लखनऊ से आयुसा की अध्यक्ष प्रोफेसर रेशमा परवीन भी ऑनलाइन जुड़ी रहीं। स्वागत एवं परिचयात्मक वक्तव्य डॉ. इरशाद सियानवी ने दिया तथा कार्यक्रम का संचालन डॉ. शादाब अलीम ने किया। अंत में धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत किया गया।


विषय का परिचय प्रस्तुत करते हुए प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी ने कहा कि अगस्त का पूरा महीना ही स्वतंत्रता से जुड़ा हुआ है। स्वतंत्रता आंदोलन में सभी भारतीय भाषाओं ने अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दास्तानों, उपन्यासों और साहित्य ने स्वतंत्रता के लिए किस प्रकार वातावरण तैयार किया, आज के कार्यक्रम में हम इसे देखेंगे और समझेंगे कि हमारे साहित्य ने स्वतंत्रता संग्राम में किस प्रकार अपनी भूमिका निभाई। डॉ. मुश्ताक अहमद वानी ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में हमारे अनेक विद्वानों, साहित्यकारों और कवियों ने अपना बलिदान दिया। पत्रों, समाचार-पत्रों और पत्रिकाओं के साथ-साथ अनेक लेख भी स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित लिखे गए। 1857 के स्वतंत्रता संग्राम से पूर्व के कवियों को देखें तो पता चलता है कि साहित्यकारों और कवियों ने समाचार-पत्रों एवं पत्रिकाओं के माध्यम से तत्कालीन परिस्थितियों का एक सजीव चित्र प्रस्तुत किया। प्रगतिशील आंदोलन के माध्यम से प्रेमचंद, जोश और फ़ैज़ जैसे साहित्यकारों ने जनता की समस्याओं को प्रमुखता से सामने रखा।


डॉ. कहकशाँ लतीफ़ ने कहा कि दुनिया भर में चलने वाले स्वतंत्रता आंदोलनों की लहर को अनुवाद के माध्यम से उर्दू में प्रस्तुत किया गया और विदेशी शासन के विरुद्ध अनेक महत्वपूर्ण रचनाएँ सामने आईं। विश्व की घटनाओं और समाचारों के अनुवाद भी उर्दू में प्रकाशित किए गए। प्रेमचंद के उपन्यास का अनुवाद “इंकार” के नाम से किया गया। हमें अनुवाद की भूमिका को भी नहीं भूलना चाहिए। इकबाल ने भी अनुवाद के माध्यम से अपने विचारों को प्रस्तुत किया। प्रोफेसर रेशमा परवीन ने कहा कि स्वतंत्रता संग्राम में हमारी महिलाओं ने जो सेवाएँ और योगदान दिए, उनका अध्ययन किया जाना चाहिए। स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में उर्दू ने जिस प्रकार महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, उसे आज भुलाया जा रहा है, लेकिन स्वतंत्रता संग्राम से संबंधित उर्दू की साहित्यिक सेवाओं को इतिहास कभी भुला नहीं सकता। इस अवसर पर प्रसिद्ध शायर मौलाना सैयद नायाबुद्दीन नायाब ने भी कार्यक्रम में सहभागिता की और अपनी काव्यात्मक प्रस्तुति के माध्यम से प्रभावपूर्ण विचार व्यक्त किए। अंत में अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रोफेसर सगीर अफराहीम ने कहा कि स्वतंत्रता के संदर्भ में उर्दू में खूब कार्य हो रहा है। मुगल साम्राज्य के बाद हमारी संस्कृति पर आक्रमण किया गया। उस समय राजा राममोहन राय, हमारे धर्मविदों के साथ-साथ अनेक महिलाएँ भी आगे आईं। वर्ष 1857 में सभी एकजुट हो गए। हमें इकबाल, टैगोर और बिस्मिल के बारे में पढ़ना होगा। नज़र सज्जाद हैदर, कुर्रतुलऐन हैदर आदि ने भी स्वतंत्रता की भावनाओं को अभिव्यक्त किया।


उन्होंने कहा कि अंग्रेज भारत में व्यापार के उद्देश्य से आए थे और धीरे-धीरे पूरे भारत में फैल गए। जब ईस्ट इंडिया कंपनी ने पूरे भारत को अपने नियंत्रण में ले लिया तो यहाँ के लोगों में असंतोष और बेचैनी उत्पन्न होने लगी। पैगाम आफ़ाक़ी, जोगिंदर पाल, सज्जाद हैदर यलदरम आदि साहित्यकारों ने भी स्वतंत्रता संग्राम को अपनी रचनाओं में प्रस्तुत किया। “कई चाँद थे सर-ए-आसमाँ” (शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी), “एक क़तरा-ए-ख़ून” (इस्मत चुगताई), प्रदीप का साक्षात्कार तथा लता मंगेशकर के गीत—इन सबमें भी चारों बंदरगाहों पर अंग्रेजों के आगमन और स्वतंत्रता संग्राम की ओर संकेत मिलते हैं। कार्यक्रम से डॉ. आसिफ अली, डॉ. अलका वशिष्ठ, मोहम्मद ईसा राना, सईद अहमद सहारनपुरी, मोहम्मद शमशाद सहित अनेक छात्र-छात्राएँ ऑनलाइन जुड़े रहे।

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