सपना सीपी साहू
नित्य संदेश, इंदौर। वेदव्यासजी ने वेदों की रचना कर सम्पूर्ण मानव जाति का मार्गदर्शन किया है। इस रूप में वे सारी मानवता के गुरू हैं और जो गुरू सिखाता है उनकी छोटी से छोटी बात भी हमारे लिये ग्रहण करने योग्य होती है क्योंकि छोटी सी सीख हमें बड़ा ही नहीं बनाती है बल्कि छोटी सी सीख घटने पर बौना भी बनाती है।
गुरूपूर्णिमा को महर्षि वेदव्यास का जन्म हुआ था इसलिये इसे व्यासपूर्णिमा भी कहा जाता है, उक्त विचार अखिल भारतीय साहित्य मालवा प्रांताध्यक्ष श्री त्रिपुरारी लाल शर्मा ने की गुरु पूर्णिमा निमित्त अर्चना कार्यालय में आयोजित काव्य गोष्ठी के मुख्य अतिथि के रूप में व्यक्त किये। साथ ही गुरु महिमा का गुणगान पर अपनी रचना:
"गुरु इतनी कृपा करना
मुझे प्रभु से मिला देना
पुनर्जन्म के चक्र से
मुझे मुक्त करा देना"
"मैं भटक रहा माया में
तन मन भ्रमित है मेरा
विषय वासना के संग
मैं खेल रहा हु खेला"
गाकर गुरु वंदना की।
काव्य गोष्ठी की अध्यक्षता श्री बालकराम "साद" ने करते हुए उनकी गजल:
"तेरे कूचे से जिस दिन निकल जाएंगे
ये बहारे ये मौसम बदल जाएंगे
आज मेरे शहर में है शामें गजल,
मौत को कह दिया है कि कल आयेंगे"
को सुनाकर भरपूर दाद पाई।
काव्य गोष्ठी का शुभारंभ द्वारा दिनेश पाठक द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना से हुआ।
श्री दिनेश दानिश की बेटियों पर बेहतरीन गजल:
"इधर तो ख्वाब देखे जा रहे है।
उधर रिश्तों पर रिश्ते आ रहे है।
किसी दिन फूर्र से उड़ जायेगी चिड़िया,
क़फस के तार काटे जा रहे है"
को श्रोताओं की भरपूर दाद मिली।
श्री दिनेश पाठक ने बेटियों पर एक मार्मिक कविता:
"अपने घर की रौनक बच्ची लगती है।
बढ़ती हुई हकीकत सच्ची लगती है।
बेटी जहां कहीं भी हो इस दुनियाँ में।
हँसती गाती हर पल अच्छी लगती है"
को सभी ने तालियां बजाकर कविता की सराहना की।
गजलकार श्रीमती राखी जैन द्वारा तरन्नुम में गजले पढ़ी गई। उनकी एक गज़ल:
"हमें दर्द कहने की आदत नहीं है
जो पूछोगे हम मुस्कुराने लगेंगे"
को श्रोताओं ने मुक्त कंठ से दाद देकर आनंद लिया।
श्रीमती सपना साहू ने:
"देखो देखो शिव नगरी में
श्री महाकाल दर्शन देते है"
रचना से सावन एवं शिव की झांकी प्रस्तुत की।
राजेंद्र पांडे तपन ने उनकी गजल:
"हमें क़रार तुम्हारी नज़र से मिलता है।
सुकुन मरीज को ज्यों चारागर से मिलता है"
से काव्य गोष्ठी का माहौल बदल दिया।
बृजमोहन शर्मा "बृज" ने:
"नाव पर है ये सफर और नाव कागज की
नाव है बीच भंवर और नाव कागज की
हजार खतरें हैं सफ़र में तूफां बारिश के
अभी तो दूर है घर और नाव कागज की"
जीवन की कठिनाइयों को गजल के माध्यम से अभिव्यक्त किया।
डा. इसरार मोहम्मद ख़ान की रचना:
"पथ में तो अंधियारा है, लेकिन मानव कब हारा है।
चलते-चलते रुके चरण, तो डगरिया क्या कहेगी"
को पढ़कर जीवन के संघर्ष को अभिव्यक्त किया।
श्रीमती शीला चंदन ने उनकी रचना:
"युवा और आज के जेनजी पर -
हैरत नहीं ये सोच या, इनके फिराक पर।
तुम नहीं तुमसे ये जिंदगी के, प्रतिमान बदले हैं।।
हर गली हर मोड़ पर यह, पूछती फिर रही हूं।
कि ये पता गलत है या, ये सारे मकान बदले हैं"
के माध्यम से जेन जी की मानसिकता को अभिव्यक्त किया।
श्रीमती शीला बड़ोदिया मानव मन की चंचलता को अपनी रचना:
"मन कुछ कहता है,
बहुत कुछ कहता है ये मन,
मन ये मन,
कुछ कहता है"
सुनाकर सबको सोचने के लिए बाध्य कर दिया।
रामचन्द्र अवस्थी ने ईश्वरीय महिमा का गुणगान करने वाली कविता:
"सूरदास सँग जसोमती जब जोइ-सोइ कछु गावै।
तीनों लोक जगाने वाला सुनकर खुद सो जावै"
सुनाकर भक्त और ईश्वर के प्रेम को रेखांकित किया।
ओमप्रकाश जोशी 'बब्बु' की रचना:
"सवालों में है अहम् सवाल हमारा क्या है
मुगाल् तो ने कहा, हमें न पाल हमारा क्या है"
को श्रोताओं ने सराहा।
प्रेमानंद सरस्वती ने रचना:
"कदंब अमुआ पर झूला झूले मनवा मोरा प्रेम आंगन में।
बावरा हो गया मनवा मोरा मन से मन के स्पंदन में"
प्रेम को अभिव्यक्त किया।
हरीश साथी ने उनकी गजल:
"कदम कदम पर लुटेरों के जल कितने हैं
मेरे वतन में वतन के दलाल कितने हैं"
को सुनाकर राष्ट्र के सम्मुख चुनौतियों पर संकेत किया।
श्रीमती निधि दीक्षित ने:
"हमने समझा ही नहीं जीवन का सार, खोजते रहे परायों मे प्यार, और बुनते रहे मन से मिले हजारों तार"
मृग मरीचिका के दर्शन करवा दिए।
कार्य़क्रम का सफल संचालन हास्य कवि श्री दिनेश पाठक ने किया।
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