नवीन मौर्य
नित्य संदेश, इंदौर। 21 वीं सानंद नाट्य स्पर्धा में सोमवार की शाम लेखक वसंत सबनीस और दिग्दर्शक राहुल भराडे के नाटक म्हैस आली आणि हौस गेली की संस्था रंगायन ने रंगारंग और रोचक प्रस्तुती दी। लेफ्टिनेंट कर्नल श्री संदीप जोशी ने दीप प्रचलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया । अतिथि स्वागत किया जयंत भिसे, संजीव वावीकर, अनिरुद्ध नागपुरकर ने । औपचारिक कार्यक्रम का सूत्रसंचालन किया सानंद मित्र कु. तेजस्वी भागवत एवं श्री अर्पित बापट।
यह नाटक एक मध्यमवर्गीय परिवार की रोजमर्रा की जिंदगी, उसकी छोटी-बड़ी परेशानियों और रिश्तों के बीच पनपने वाले हास्य को बेहद सहज अंदाज में मंच पर प्रस्तुत करता है। कहानी के केंद्र में ‘मैं’ यानी पति, उसकी पत्नी कुटुंब, बच्चे अबीर और आद्या तथा कुटुंब का भाई बाळकराम हैं। बाळकराम अपनी बहन के घर को अपना ही घर समझकर वहीं डेरा जमाए रहता है और हर परिस्थिति में बहन का पक्ष लेकर अपने जीजाजी की मुश्किलें बढ़ाता रहता है।
नाटक की सबसे दिलचस्प कड़ी कुटुंब का नया-नया प्रयोग करने का शौक है। वह हर बार कुछ अलग करने की कोशिश करती है, लेकिन उसके प्रयोग परिवार के लिए नई मुसीबत खड़ी कर देते हैं। पति की मजबूरी, बच्चों की शरारत और साले का बहन के प्रति अंधा समर्थन मिलकर ऐसी परिस्थितियां पैदा करते हैं, जिनसे हास्य का स्वाभाविक वातावरण बनता है। खास बात यह है कि हास्य किसी बनावटी पंच या जबरन पैदा किए गए संवादों पर निर्भर नहीं रहता, बल्कि पात्रों के स्वभाव और पारिवारिक परिस्थितियों से निकलता है।
सोसायटी में रहने वाले लोगों की उत्सुकता भी कहानी को अतिरिक्त मनोरंजक बनाती है। परिवार के घर में आए दिन होने वाली घटनाएं पड़ोसियों के लिए कौतूहल का विषय बन जाती हैं। घर के भीतर चल रहे तमाशे को देखने के लिए उनकी ताक-झांक और प्रतिक्रियाएं घटनाक्रम को और रोचक बनाती हैं। इस तरह नाटक सिर्फ परिवार की कहानी नहीं रहता, बल्कि मध्यमवर्गीय सोसायटी के सामाजिक व्यवहार पर भी हल्की-फुल्की टिप्पणी करता है।

नाटक की खूबी यह है कि मनोरंजन के साथ इसमें एक सहज पारिवारिक संदेश भी बुना गया है। लगातार होने वाली घटनाओं और हास्यपूर्ण परिस्थितियों के बाद कहानी उस मोड़ पर पहुंचती है, जहां कुटुंब को अपनी गलतियों का अहसास होता है। उसका यह संकल्प कि आगे वह ऐसा कोई काम नहीं करेगी जिससे परिवार मुसीबत में पड़े, कहानी को सार्थक निष्कर्ष देता है।
कुल मिलाकर, यह नाटक मध्यमवर्गीय परिवार के जीवन की छोटी-छोटी विसंगतियों को हास्य के माध्यम से सामने लाता है। पात्रों की आपसी नोकझोंक, बच्चों की शरारत, साले-जीजा का समीकरण और पड़ोसियों की जिज्ञासा दर्शकों को लगातार बांधे रखते हैं। हल्के-फुल्के मनोरंजन के साथ पारिवारिक रिश्तों की गर्माहट इसका सबसे मजबूत पक्ष है। दिग्दर्शक राहुल भराडे की प्रशंसा करनी होगी कि उन्होंने नाटक की गति बनाए रखी और कलाकारों के अभिनय में टाइमिंग का ध्यान रखा। सभी कलाकारों ने अच्छा अभिनय किया है। संस्था रंगायन के इस सफल मंचन में बैकस्टेज आर्टिस्ट्स ने भी अच्छा साथ निभाया।
कलाकार
अभिजीत निमगावकर, सौ. हीना शेगावकर, अबीर भाटे, आद्या कचेश्वर, अमेय नेमावरकर, प्रसन्न गोरे, श्रुती आढे पुरोहित, संहिता पाल हरदास, आरोही शास्त्री, राहुल भराडे, आर्यन भराडे, अन्वी जैन, विजय तोतरे, अपेक्षा खोचे, हर्षल पाटणकर
बैकस्टेज आर्टिस्ट्स
दिग्दर्शक : राहुल भराडे
ध्वनि संकलन : आर्यन भराडे
ध्वनि सहायक : ईशान भराडे
रंगभूषा योजना : सौ. हर्षिता भराडे
वेषभूषा योजना : अमेय नेमावरकर
नेपथ्य योजना : राहुल भराडे
प्रकाश योजना : आकाश कस्तुरे

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