नित्य संदेश
भारत विश्व का सबसे बड़ा और जीवंत लोकतंत्र है, जहां संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी बात रखने और शांतिपूर्ण आंदोलन करने का अधिकार देता है। परंतु, जब जनहित के नाम पर शुरू हुए प्रदर्शनों की आड़ में राजनीतिक स्वार्थ साधे जाने लगें, देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था को अस्थिर करने का प्रयास हो और राष्ट्रीय सुरक्षा को चुनौती मिलने लगे, तो यह गंभीर खतरे का संकेत है। पूर्व में दावा किया गया था कि कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) एक गैर राजनीतिक मंच है और यहां छात्रों के हितों की रक्षा के लिए पूरी तरह से गैर-राजनीतिक और शांतिपूर्ण आंदोलन किया जाएगा। लेकिन समय के साथ इस आंदोलन का असली चेहरा सामने आ गया है। जंतर-मंतर पर एक माह से संचालित गतिविधियां अब केवल छात्रों या नीट जैसी परीक्षा विशेष की चिंताओं तक सीमित नहीं हैं, बल्कि इसकी आड़ में एक सुनियोजित टूलकिट को सक्रिय कर दिया गया है। गैर-राजनीतिक होने का ढोंग ज्यादा न बढ़ाते हुए, अब इसे पूरी तरह राजनीतिक रंग में रंग दिया गया है, जहां नीट परीक्षा की कम और टुकड़े-टुकड़े गैंग के समर्थक बनकर हिंदू और हिंदुत्व विरोधी, भाजपा और आरएसएस पर अनर्गल टिप्पणियां ज्यादा की जा रही हैं।
सभी देख रहे हैं कि अभिजीत दीपके इस आंदोलन को गैर-राजनीतिक कहते हुए मंचों से कितनी गलत बयानबाजी करता है। देश के प्रधानमंत्री, गृह मंत्री और शिक्षा मंत्री पर लगातार अशोभनीय व मिथ्या टिप्पणियां हो रही हैं। हद तो तब हो जाती है जब कानून व्यवस्था संभालने वाले पुलिस कर्मियों पर भी अमर्यादित व झूठे आरोप मढ़े जा रहे हैं और अकारण ही मारपीट की बातें कहकर माहौल बिगाड़ने का प्रयास किया जा रहा है।
अब इस आंदोलन की बुनियाद में छिपे झूठ और राजनीति को सहारा देने के लिए आआपा, सपा, आसपा और टीएमसी जैसे विपक्षी धड़े भी कूद पड़े हैं। आगामी 20 जुलाई को संसद के मानसून सत्र के पहले दिन संसद मार्च करने और व्यवस्था को ठप करने की खुली चुनौती दी जा रही है। जिस आंदोलन का आधार ही सनातन संस्कृति के विरोध और राजनीतिक हठ पर टिका हो, उसके इस कदम पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं किया जा सकता कि यह शांतिपूर्ण होगा। इतिहास गवाह है कि ऐसे छद्म आंदोलनों की परिणति अक्सर अराजकता में होती है। बेहद आपत्तिजनक बात यह है कि इस आंदोलन के रणनीतिकारों और केजरीवाल जैसे विपक्षी नेताओं द्वारा भारत की परिस्थितियों की तुलना बांग्लादेश या नेपाल की भू-राजनीतिक उथल-पुथल से की जा रही है। इन ताकतों को यह समझना होगा कि भारत एक सुदृढ़ संवैधानिक ढांचे वाला देश है, जहां नीतियां सड़कों पर दी जाने वाली धमकियों या भूख हड़ताल की ब्लैकमेलिंग से नहीं, बल्कि संसद के भीतर संविधान की चौखट से तय होती हैं। यह कोई अस्थिर राष्ट्र नहीं है जहां सड़कों पर उपद्रव मचाकर लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार को उखाड़ फेंका जाएगा।
इस पूरे घटनाक्रम में सोनम वांगचुक जैसे व्यक्तित्वों की भूख हड़ताल और गिरते स्वास्थ्य का उपयोग समाज में एक कृत्रिम सहानुभूति और विक्टिम कार्ड खेलने के लिए किया जा रहा है। उनके पक्ष में सहानुभूति बटोरने के लिए बार-बार यह प्रचारित किया जा रहा है कि वे थ्री इडियट्स फिल्म वाले आमिर खान के किरदार की प्रेरणा हैं, बहुत बड़े वैज्ञानिक हैं; लेकिन सोचने वाली बात यह है कि इन झूठे प्रोपेगेंडा वाली बातों से वर्तमान विषय पर क्या फर्क पड़ता है? वास्तविकता यह है कि वे पूर्व से ही एक आंदोलनजीवी रहे हैं, उनका किरदार थ्री इडिय के फुंनसुक वांगडू के समान नहीं है। उनका पारिवारिक जुड़ाव कांग्रेस नेता के पुत्र के रूप में रहा है, और सरकार द्वारा उनकी संदिग्ध फंडिंग बंद किया जाना भी एक बड़ा कारण है जिसके चलते वे इस आंदोलन से जुड़े हैं।
यहां सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यह उठता है कि उनके आंदोलन में भूख हड़ताल करने पर वहां पूर्व में दीपके, और बाद में पहुंचे केजरीवाल, सोनम वांगचुक को सीधे देश का शिक्षा मंत्री या नीति-निर्माता बनाने को कहते है। यह मांग भी पूरी तरह अतार्किक है। समझना होगा यदि कल को कोई राष्ट्र विरोधी तत्व, आतंकवादी या अपराधी अपनी अनुचित मांगों को मनवाने के लिए जेल के भीतर अनशन पर बैठ जाए, तो क्या राज्य उसके आगे घुटने टेक देगा? बिल्कुल नहीं। प्रशासनिक पदों के लिए योग्यता, दृष्टिकोण (विजन) और राष्ट्र के प्रति बिना किसी एजेंडे के समर्पण आवश्यक है, न कि लोकतंत्र को पंगु करने की हठधर्मिता।
इसी आंदोलन के पीछे सक्रिय कुणाल कामरा, अरुंधति रॉय, प्रकाश राज और विजेता दहिया जैसे चेहरों का अतीत गवाह है कि इनका वास्तविक एजेंडा राष्ट्र निर्माण कभी नहीं रहा, बल्कि समाज में जातिवादी भ्रम और विभाजन पैदा करना रहा है। मंचों से प्रभु श्री राम और माता सीता जैसे पवित्र सांस्कृतिक प्रतीकों की आड़ लेकर ओछी बयानबाजी करना और पूज्य संतों की परंपराओं का मजाक उड़ाना, मंचासीन लोगो का हंसना, चुप्पी साधना बहुसंख्यक समाज की आस्था को आहत करने की सोची-समझी रणनीति है।
दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि विपक्षी दलों द्वारा पुलिस विरोधी गतिविधियों और देश विरोधी नैरेटिव पर मौन रहना और गलत बातों का समर्थन करना यह प्रमाणित करता है कि वे इस असंतोष का लाभ उठाकर वैश्विक स्तर पर भारत की छवि धूमिल करना चाहते हैं। विदेशी फंडिंग और डिजिटल माध्यमों के सहारे युवाओं की आड़ में वैचारिक अस्थिरता पैदा करने की यह कोशिश एक नए प्रकार के छद्म आतंकवाद का रूप लेती जा रही है। लेकिन इस तथाकथित जनआंदोलन की असलियत तब सामने आ जाती है जब हम जंतर-मंतर की जमीनी हकीकत देखते हैं। भीड़ जुटाने के लिए स्वरा भास्कर, संजय सिंह, आतिशी, प्रकाश राज, डिम्पल यादव, अरविंद केजरीवाल, कुणाल कामरा, कम्युनिस्ट नेता, रूपम सरोज से लेकर अजीत अंजुम तक तमाम बड़े चेहरे पहुंच गए, लेकिन आज तक एक सवाल फिर भी अनुत्तरित ही है कि इस आंदोलन में जनता कहां है? नीट संबंधित छात्र कहां हैं? पीड़ित परिवार कहां हैं?
धरना, प्रदर्शन और भूख हड़ताल लोकतांत्रिक अधिकार जरूर हैं, लेकिन जब जनसमर्थन ही गायब हो, तो केवल बड़े चेहरों की मौजूदगी से कोई प्रदर्शन जनआंदोलन नहीं बन जाता। आज का युवा और जेन जी अपनी प्राथमिकताएं खुद तय कर रहे हैं। वे राजनीतिक रोटियां सेकने वालों के बहकावे में आने के बजाय अपना अच्छा बुरा समझते हैं, वे प्रतियोगी परीक्षाओं की पढ़ाई में जुटे हैं या अपने करियर को संवार रहे हैं। देश की प्रबुद्ध जनता अब केवल खोखले नारों से नहीं, बल्कि मुद्दों और सकारात्मक परिणामों से प्रभावित होती है, क्योंकि यह जनता है, जो सब जानती है।
वर्तमान परिस्थितियों को देखते हुए सरकार को तत्काल एक सख्त और दोतरफा रणनीति पर काम करना होगा। पहली तरफ, आंदोलन की आड़ में विदेशी एजेंडा चलाने वाले, 20 जुलाई को संसद मार्च के नाम पर अशांति फैलाने की कोशिश करने वाले और सनातन संस्कृति का अपमान करने वाले तत्वों पर कानून का कड़ा चाबुक चलना चाहिए। दूसरी तरफ, पेपर लीक करने वाले माफियाओं के खिलाफ गैर-जमानती धाराओं, संपत्तियों की जब्ती और उम्रकैद जैसे कठोरतम कानूनों को पूरी कड़ाई से लागू किया जाए। साथ ही, छात्रों की वास्तविक शिकायतों के निपटारे के लिए एक पारदर्शी और स्वतंत्र निकाय का गठन भी हो, ताकि किसी भी जायज मांग का राजनीतिकरण न हो सके।
व्यक्ति, दल और विचारधाराएं समय के साथ बदलती रहती हैं, परंतु राष्ट्र की एकता, अखंडता, संस्कृति और संविधान हमेशा सर्वोपरि रहने चाहिए। लोकतंत्र में असहमति का स्वागत है, लेकिन जब यह देश को अस्थिर करने के षड्यंत्र में बदल जाए, तो उसे कानून सम्मत तरीके से संभालना ही राष्ट्रहित में सर्वोचित कदम है।
- सपना सी.पी. साहू 'स्वप्निल'
नित्य संदेश, समाचार संपादक


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