नित्य संदेश। किसी भी जीवंत लोकतंत्र की धड़कन उसकी युवा आबादी होती है। भारत आज दुनिया का सबसे युवा देश है, जिसके पास जनसांख्यिकीय लाभांश की अद्भुत ताकत है। सैद्धांतिक रूप से यह स्थिति बेहद गौरवमयी लगती है, परंतु जब हम धरातल की कड़वी हकीकत से रूबरू होते हैं, तो एक भयावह तस्वीर सामने आती है। आज देश और विशेष रूप से उत्तर प्रदेश का युवा चौतरफा संकटों से घिरा हुआ है। एक तरफ जहां वह दिशाहीनता और आभासी दुनिया के भटकाव का शिकार हो रहा है, वहीं दूसरी तरफ प्रशासनिक तंत्र की विफलताओं ने उसके भविष्य को अंधकार में धकेल दिया है। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि यदि देश का युवा ही संकट में है, तो भारत का लोकतांत्रिक भविष्य कैसा होगा?
आज की युवा पीढ़ी के सामने सबसे बड़ी चुनौती 'डिजिटल भटकाव' की है। जिस सोशल मीडिया और इंटरनेट को ज्ञान, कौशल और राष्ट्र निर्माण का जरिया बनना चाहिए था, वह आज युवाओं की ऊर्जा को सोखने वाला एक आत्मघाती टूल बन चुका है। रील संस्कृति, सतही संवाद और भ्रामक नैरेटिव्स के जाल में फंसकर हमारी युवा पीढ़ी वास्तविक शिक्षा, गंभीर अध्ययन और वैचारिक विमर्श से दूर होती जा रही है। विश्वविद्यालयों और पुस्तकालयों में जो समय बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर, महान राष्ट्रनायकों के विचारों को पढ़ने और अपनी तार्किक क्षमता को बढ़ाने में बीतना चाहिए था, वह समय आज स्क्रीन स्क्रॉल करने में नष्ट हो रहा है। शिक्षा के स्तर में आ रही यह गिरावट सीधे तौर पर युवाओं की नेतृत्व क्षमता को पंगु बना रही है।
परंतु इस भटकाव की एक दूसरी और सबसे बड़ी वजह व्यवस्था की नाकामी भी है। आज पूरे भारत और उत्तर प्रदेश के भीतर बेरोजगारी अपने चरम पर है। यह कोई राजनीतिक आरोप नहीं, बल्कि हर घर की कड़वी हकीकत है। आज ऐसा कोई घर नहीं है, जहां डिग्री धारक योग्य युवा रोजगार के लिए दर-दर की ठोकरें न खा रहा हो। भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक होना, वर्षों तक नियुक्तियां अटकना और रोजगार के अवसरों का लगातार सिकुड़ना युवाओं के सीने पर पत्थर जैसा है।
दिन-रात मेहनत करने के बाद भी जब युवाओं को कोई भविष्य नजर नहीं आता, तो वे गहरे अवसाद के दलदल में धंस जाते हैं। जब देश का युवा चौबीस घंटे आर्थिक तंगी, मानसिक तनाव और असुरक्षा की भावना से जूझेगा, तो उसका भविष्य अंधकारमय होना निश्चित है। हताशा का यह माहौल देश की रीढ़ को कमजोर कर रहा है।
युवाओं की इन मूलभूत समस्याओं का सीधा संबंध हमारे लोकतंत्र के अस्तित्व से है। जब युवा बेरोजगारी और अवसाद से घिर जाता है, तो सत्तासीन ताकतों के लिए उसे असली मुद्दों (शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार) से भटकाकर नफरत और विभाजन की राजनीति का मोहरा बनाना आसान हो जाता है। लोकतंत्र केवल वोट देने का नाम नहीं है; लोकतंत्र का मतलब है एक जागरूक नागरिकता, जो सरकार से सवाल पूछ सके। लेकिन आज जब स्वतंत्र आवाज उठाने वाले युवाओं, छात्रों और वकीलों को शांतिपूर्ण प्रदर्शन करने पर भी पुलिसिया दमन और लाठीचार्ज का सामना करना पड़ता है, तो लोकतांत्रिक मूल्य लहूलुहान होते हैं।
यदि देश का युवा अपने अधिकारों के प्रति उदासीन हो जाएगा या दमन के डर से चुप बैठ जाएगा, तो लोकतंत्र का पतन निश्चित है। आज हमारा लोकतंत्र जिस नाजुक मोड़ पर खड़ा है, वहां से इसे केवल और केवल एक सशक्त, शिक्षित और सचेत युवा नेतृत्व ही बाहर निकाल सकता है।
'बहुजन जनता दल'(खोड़ावाल) पार्टी का यह स्पष्ट मानना है कि यदि हमें भारत के लोकतांत्रिक भविष्य को सुरक्षित और समृद्ध बनाना है, तो हमें सबसे पहले अपने युवाओं को बचाना होगा। सरकारों को खोखले दावों से ऊपर उठकर हर हाथ को काम और हर युवा को सम्मानजनक रोजगार देना होगा। साथ ही, युवाओं को भी सोशल मीडिया के छलावे को छोड़कर शिक्षा, आत्म-सम्मान और अपने अधिकारों की लड़ाई की ओर लौटना होगा।
आइए, हम सब मिलकर एक ऐसे भारत का निर्माण करें जहां युवाओं का भविष्य अंधकार में नहीं, बल्कि स्वाभिमान और तरक्की के उजाले से रोशन हो। क्योंकि युवा बदलेगा, तभी नेतृत्व बदलेगा और तभी देश का लोकतंत्र बचेगा।
लेखक
- अतुल खोड़ावाल
राष्ट्रीय अध्यक्ष, बहुजन जनता दल(खोड़ावाल )
सम्पर्क सूत्र - 8279996482
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