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Thursday, July 9, 2026

राष्ट्रीय एकता और स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में पत्रिका 'ज़माना' ने अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य किया। : प्रो. सगीर अफ़राहीम

सीसीएस विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में "दयानारायण निगम और ज़माना" विषय पर ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित


नित्य संदेश ब्यूरो

मेरठ। पत्रिका 'ज़माना' का प्रकाशन पहले बरेली से प्रारंभ हुआ था, बाद में इसका प्रकाशन कानपुर से होने लगा। उस समय कानपुर में तेरह प्रेस थीं, जो अन्य शहरों की तुलना में अधिक थीं। एक समय इसकी प्रेस एक मस्जिद के तहखाने में भी संचालित होती थी। उस दौर में कानपुर से 54 समाचार-पत्र और पत्रिकाएँ प्रकाशित होती थीं। वहाँ ऐसी अनेक सुविधाएँ उपलब्ध थीं, जिनके कारण पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन अपेक्षाकृत सरल था। इसमें कोई संदेह नहीं कि उस समय 'ज़माना' एक अत्यंत प्रतिष्ठित पत्रिका थी, जिसमें समाज के सभी विषयों पर लेख प्रकाशित होते थे। इस पत्रिका के प्रकाशन में राय बहादुर का भी विशेष सहयोग रहता था।

ये विचार हलीम पीजी कॉलेज, कानपुर के उर्दू विभागाध्यक्ष डॉ. खान फारूक ने सीसीएस विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग एवं आयुसा  (IYUSA) के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित "दयानारायण निगम और ज़माना" विषयक ऑनलाइन कार्यक्रम में मुख्य अतिथि के रूप में व्यक्त किए। उन्होंने आगे कहा कि दयानारायण निगम संपादकीय नहीं लिखते थे, किंतु राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक तथा अन्य अनेक विषयों पर गंभीर लेख लिखते थे। उन्होंने कहा कि दयानारायण निगम और पत्रिका 'ज़माना' पर अनेक नए दृष्टिकोणों से व्यापक शोध किया जा सकता है।

कार्यक्रम का शुभारंभ सईद अहमद ने पवित्र कुरआन के पाठ से किया। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध साहित्यकार एवं आलोचक प्रो. सगीर अफ़राहीम ने की, जबकि संरक्षण उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. असलम जमशेदपुरी का रहा। मुख्य अतिथि के रूप में डॉ. खान फारूक (अध्यक्ष, उर्दू विभाग, हलीम पीजी कॉलेज, कानपुर) ऑनलाइन जुड़े। विशिष्ट अतिथियों के रूप में एजुकेशन अवेयरनेस कमेटी, लखनऊ के संस्थापक डॉ. मसीहुद्दीन तथा डॉ. हिना अफ़्शाँ (दयानंद गर्ल्स पीजी कॉलेज, कानपुर) उपस्थित रहीं। शोधपत्र प्रस्तुत करने के लिए अलीगढ़ के प्रसिद्ध शायर डॉ. मुजीब शहरज़र ने भाग लिया। कार्यक्रम में आयुसा की अध्यक्ष प्रो. रेशमा परवीन भी उपस्थित रहीं। स्वागत भाषण डॉ. अरशा सियानवी ने दिया तथा संचालन डॉ. ओवैस जमाल शम्सी ने किया।

उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. असलम जमशेदपुरी ने कहा कि दयानारायण निगम ने पत्रिका 'ज़माना' की गुणवत्ता से कभी समझौता नहीं किया। उस समय साहित्यिक पत्रिका निकालना अत्यंत कठिन कार्य था। उस दौर के बड़े साहित्यकार—अल्लामा इक़बाल, प्रेमचंद, अब्दुल माजिद दरियाबादी आदि—अपनी श्रेष्ठ रचनाएँ प्रस्तुत कर रहे थे और उनकी रचनाएँ 'ज़माना' में प्रकाशित होती थीं। उन्होंने कहा कि बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक काल में जिन पत्रिकाओं ने उर्दू साहित्य की उल्लेखनीय सेवा की, उनमें 'ज़माना' का विशिष्ट स्थान है। दयानारायण निगम उन गैर-मुस्लिम पत्रकारों में थे जिन्होंने उर्दू भाषा को जीवित रखने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

डॉ. हिना अफ़्शाँ ने कहा कि यह हमारे लिए गर्व का विषय है कि हम महान साहित्यकार, पत्रकार और उच्च व्यक्तित्व के धनी दयानारायण निगम की सेवाओं पर कार्यक्रम आयोजित कर रहे हैं। उन्होंने अपने मार्ग स्वयं बनाए और साहित्य पर उनके महान उपकार हैं। प्रेमचंद को "मुंशी प्रेमचंद" बनाने का श्रेय भी दयानारायण निगम को जाता है। डॉ. मसीहुद्दीन ने कहा कि दयानारायण निगम का निधन मात्र साठ वर्ष की आयु में हो गया था, किंतु उन्होंने अपने अल्प जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण साहित्यिक कार्य किए। मुंशी प्रेमचंद का नाम तथा उनकी पहली कहानी "दुनिया का सबसे अनमोल रत्न" पहली बार पत्रिका 'ज़माना' में प्रकाशित हुई थी। उन्होंने कहा कि दयानारायण निगम राष्ट्रीय एकता के सशक्त समर्थक थे। वे समाजसेवी, कवि, प्रगतिशील चिंतक और साहित्यकार थे।

प्रो. रेशमा परवीन ने कहा कि ऐसे कार्यक्रम आयोजित करने का उद्देश्य शोधार्थियों और विद्यार्थियों को लाभान्वित करना है। आज का कार्यक्रम उर्दू की एक अत्यंत महत्वपूर्ण पत्रिका 'ज़माना' पर केंद्रित है। इस कार्यक्रम से अनेक शंकाओं का समाधान हुआ। निस्संदेह 'ज़माना' ने अनेक महत्वपूर्ण साहित्यकारों को विशिष्ट पहचान दिलाई। इस अवसर पर डॉ. मुजीब शहरज़र ने अपना शोधपत्र प्रस्तुत करते हुए कहा कि इक़बाल, प्रेमचंद आदि के समय जो पत्रिकाएँ प्रकाशित होती थीं, उनमें 'ज़माना' की विशेषता यह थी कि उसमें अपने समय के सभी प्रमुख विषयों और समस्याओं पर गंभीर लेख प्रकाशित होते थे। 

कार्यक्रम के अंत में अध्यक्षीय वक्तव्य देते हुए प्रो. सगीर अफ़राहीम ने कहा कि स्वयं प्रेमचंद ने अनेक समीक्षाएँ लिखीं, जो 'ज़माना' में प्रकाशित हुईं। राष्ट्रीय एकता और स्वतंत्रता संग्राम के संदर्भ में 'ज़माना' ने अत्यंत महत्वपूर्ण और व्यापक कार्य किया। उन्होंने यह भी कहा कि कानपुर में मुद्रण कार्य हमेशा गुणवत्तापूर्ण, किफायती और व्यवस्थित रहा है। कार्यक्रम से डॉ. अली मोहम्मद आसिफ (मॉरीशस), नाज़िया बेगम जफ़ूखान (मॉरीशस), प्रो. सरवत खान, डॉ. शादाब अलीम, डॉ. अलका वशिष्ठ, मोहम्मद आबिद, मोहम्मद शमशाद, वाजिद मेरठी, फरहत अख्तर, सैयदा मरियम इलाही तथा बड़ी संख्या में शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएँ ऑनलाइन जुड़े रहे।

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