नित्य संदेश। मेरठ में जो वीडियो पूरे देश ने देखा, उसने अनेक लोगों को झकझोर दिया है। लोकतंत्र में अपनी बात कहने आए नागरिकों—जिनमें महिलाएँ, बुज़ुर्ग और युवा भी शामिल थे—के साथ जिस प्रकार बल प्रयोग के आरोप सामने आए, उसने गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
इतिहास हमें 1919 के जलियांवाला बाग की याद दिलाता है, जहाँ निहत्थे लोगों पर गोलियाँ चलाकर उनकी आवाज़ दबाने की कोशिश की गई थी। आज का भारत उस दौर से बिल्कुल अलग है। हमारा संविधान हर नागरिक को शांतिपूर्ण ढंग से अपनी बात रखने का अधिकार देता है। इसलिए यदि किसी शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर अनावश्यक या असंगत बल प्रयोग हुआ है, तो उसकी निष्पक्ष जाँच और जवाबदेही तय होना आवश्यक है।
इसी संदर्भ में मैं कहना चाहता हूँ कि यदि किसी पुलिस अधिकारी ने कानून की सीमाओं से बाहर जाकर नागरिकों के साथ ऐसा व्यवहार किया है, तो जनता की नज़र में वह उसी मानसिकता का प्रतीक दिखाई देता है, जिसकी पहचान इतिहास में जनरल डायर के नाम से होती है। लोकतांत्रिक भारत में किसी भी अधिकारी से अपेक्षा संविधान के अनुरूप आचरण की होती है, न कि भय का वातावरण बनाने की।
हम उत्तर प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री से माँग करते हैं कि वायरल वीडियो की निष्पक्ष न्यायिक जाँच कराई जाए, दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों के विरुद्ध सख्त कार्रवाई की जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि भविष्य में किसी भी शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी के साथ ऐसा व्यवहार न हो।
हमारा संघर्ष संविधान की रक्षा का संघर्ष है। हम हिंसा नहीं, न्याय चाहते हैं; टकराव नहीं, जवाबदेही चाहते हैं; दमन नहीं, लोकतांत्रिक अधिकारों का सम्मान चाहते हैं। आइए, हम सभी लोकतंत्र, संविधान और न्याय के पक्ष में अपनी आवाज़ बुलंद करें।
शैंकी वर्मा, व्यापारी नेता
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