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Friday, July 24, 2026

देश की आज़ादी के बाद केवल जगन्नाथ आज़ाद ही थे जिन्होंने इक़बाल को जीवंत बनाए रखा : प्रो. क़ुद्दूस जावेद

• सीसीएस विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में "जगन्नाथ आज़ाद की इक़बाल-चेतना" विषय पर ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित


नित्य संदेश ब्यूरो

मेरठ। जगन्नाथ आज़ाद का अल्लामा इक़बाल से पारिवारिक स्तर पर जो गहरा लगाव था, उसका कारण इक़बाल के काव्य की अद्भुत प्रभावशीलता थी। तिलोकचंद महरूम के पुत्र जगन्नाथ आज़ाद को अल्लामा इक़बाल का संपूर्ण काव्य कंठस्थ था। उन्होंने इक़बाल पर लगभग बारह-तेरह पुस्तकें लिखीं, जिनमें से तीन-चार पुस्तकें अत्यंत उच्च कोटि की मानी जाती हैं। इस्लाम के इतिहास के साथ-साथ पाश्चात्य चिंतकों पर उनका कार्य भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। ये विचार अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त आलोचक डॉ. तकी आबदी (कनाडा) ने उर्दू विभाग एवं एवोसा के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित "जगन्नाथ आज़ाद की इक़बाल-चेतना" विषयक ऑनलाइन कार्यक्रम में मुख्य वक्ता के रूप में व्यक्त किए। उन्होंने आगे कहा कि अल्लामा इक़बाल की शायरी में सूफ़ीवाद की सभी विशेषताएँ मौजूद हैं तथा इक़बाल का मानना था कि इस्लाम एक संपूर्ण जीवन-पद्धति है।

कार्यक्रम का शुभारंभ सईद अहमद द्वारा पवित्र क़ुरआन के पाठ से हुआ। कार्यक्रम की संरक्षकता प्रसिद्ध आलोचक, कथाकार एवं उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. असलम जमशेदपुरी ने की। अध्यक्षता प्रसिद्ध साहित्यकार एवं आलोचक प्रो. सगीर अफ़राहीम ने की। मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. क़ुद्दूस जावेद (पूर्व अध्यक्ष, उर्दू विभाग, कश्मीर विश्वविद्यालय) ऑनलाइन जुड़े। विशिष्ट अतिथियों में पाकिस्तान से डॉ. यास्मीन कौसर तथा मुक्ता लाल (जगन्नाथ आज़ाद की पुत्री) शामिल रहीं। मुख्य वक्ता के रूप में डॉ. तकी आबदी (कनाडा) तथा शोध-पत्र प्रस्तुतकर्ता के रूप में जम्मू से इरफ़ान आरिफ़ उपस्थित रहे। लखनऊ से आयुसा की अध्यक्ष प्रो. रेशमा परवीन भी कार्यक्रम में शामिल हुईं। स्वागत भाषण डॉ. इरशाद स्यानवी ने दिया तथा संचालन फ़रहत अख़्तर ने किया। विषय-परिचय प्रस्तुत करते हुए डॉ. इरशाद स्यानवी ने कहा कि प्रो. जगन्नाथ आज़ाद उर्दू साहित्य के ऐसे कर्मयोगी थे जिन्हें एक कवि, साहित्यकार और आलोचक के रूप में जाना जाता है। उन्हें विशेष रूप से इक़बाल अध्ययन से गहरा लगाव था और यही उनकी पहचान बन गया था। उन्होंने इक़बाल पर अनेक संगोष्ठियों और व्याख्यानों में विचार प्रस्तुत किए। इक़बाल के प्रति उनकी सच्ची श्रद्धा थी। उन्होंने अपने व्यावसायिक जीवन की शुरुआत लाहौर से प्रकाशित पत्रिका "अदबी दुनिया" के संपादन से की। बाद में दैनिक "जय हिंद" में उप-संपादक रहे। उनका व्यवहार अत्यंत विनम्र, मधुर और सौम्य था।

प्रो. असलम जमशेदपुरी ने कहा कि जिस प्रकार अल्लामा इक़बाल ने अपनी कविताओं के माध्यम से इस्लामी विचारधारा का व्यापक प्रचार किया, उसी प्रकार उसे जन-जन तक पहुँचाने में जगन्नाथ आज़ाद की महत्वपूर्ण भूमिका रही। उन्होंने पाश्चात्य साहित्यकारों की तुलना इक़बाल से की और इक़बाल-चेतना पर उल्लेखनीय कार्य किया। उर्दू और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं में उनकी अनेक पुस्तकें अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इक़बाल को समझने और समझाने वालों में जगन्नाथ आज़ाद का विशेष स्थान है। मुख्य अतिथि प्रो. क़ुद्दूस जावेद ने कहा कि जगन्नाथ आज़ाद का सबसे बड़ा योगदान यह है कि देश की स्वतंत्रता के बाद केवल उन्होंने ही अल्लामा इक़बाल की विरासत को जीवित रखा। वे इक़बाल के महान प्रशंसक थे। उन्होंने इक़बाल पर जो कुछ लिखा है, उसे पुनः पढ़ने की आवश्यकता है। इक़बाल द्वारा विश्वामित्र के गायत्री मंत्र का किया गया अनुवाद उनकी भारतीय सांस्कृतिक समझ का प्रमाण है। इक़बाल और कश्मीर का संबंध भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। आल अहमद सुरूर भी जगन्नाथ आज़ाद का अत्यधिक सम्मान करते थे। जम्मू-कश्मीर में उन्हें विशेष आदर मिला। उन्होंने कहा कि उनका लंबा समय जगन्नाथ आज़ाद के साथ बीता है। यदि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में अल्लामा इक़बाल को न पढ़ाया जाए तो यह उनके साथ अन्याय होगा। हमारा दायित्व है कि हम उनके साहित्य को अधिकाधिक लोगों तक पहुँचाएँ।

जम्मू से इरफ़ान आरिफ़ ने अपने शोध-पत्र में जगन्नाथ आज़ाद की इक़बाल-चेतना पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि वे अत्यंत सरल और आत्मसम्मानी व्यक्ति थे। उन्होंने कभी किसी से निजी सेवा नहीं कराई। जम्मू विश्वविद्यालय में उन्हें उनकी पुस्तक "जुस्तजू" के दस खंडों के संपादन का कार्य मिला। उन्होंने कहा कि उनके पास जगन्नाथ आज़ाद की अनेक पुस्तकें हैं, उन्हें सुनने और उनसे बातचीत करने का अवसर भी मिला। वे एक उत्कृष्ट साहित्यकार, जीवनीकार, कवि और शोधकर्ता थे। डॉ. यास्मीन कौसर ने अपने शोध-पत्र "जगन्नाथ आज़ाद : एक इक़बाल-विद्" में कहा कि उन्हें इक़बाल-चेतना अपने पिता से विरासत में मिली थी। जब भी वे लाहौर जाते, उनके पिता उन्हें विशेष रूप से अल्लामा इक़बाल से मिलने की सलाह देते थे।

जगन्नाथ आज़ाद की पुत्री मुक्ता लाल ने कहा कि उनके पिता को अल्लामा इक़बाल के साहित्य से विशेष लगाव था। "शिकवा-जवाबे शिकवा", "बांग-ए-दरा" आदि पढ़कर वे अत्यंत प्रभावित हुए। उन्हें "हाफ़िज़-ए-कलाम-ए-इक़बाल" की उपाधि भी प्राप्त हुई। वर्ष 1935 में जब "बाल-ए-जिब्रील" प्रकाशित हुई तो उन्होंने पूरी पुस्तक अपने पिता को सुनाई। उन्होंने "जावेद इक़बाल" का अंग्रेज़ी अनुवाद भी किया। वर्ष 2006 में उन्हें ऑल इंडिया बहादुर शाह ज़फ़र पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मॉरीशस से डॉ. सकीना रस्म अली ने कहा कि आज का कार्यक्रम अत्यंत महत्वपूर्ण रहा और उन्होंने इससे बहुत कुछ सीखा। जगन्नाथ आज़ाद ने इक़बाल अध्ययन के क्षेत्र में जो कार्य किया है, वह अत्यंत उल्लेखनीय है और वे वास्तव में बधाई के पात्र हैं।

अपने अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. सगीर अफ़राहीम ने कहा कि इक़बाल के संदर्भ में जगन्नाथ आज़ाद की सेवाओं को कभी भुलाया नहीं जा सकता। आज के जटिल सामाजिक परिवेश में जगन्नाथ आज़ाद जैसे साहित्यकार, आलोचक, शोधकर्ता और कवि की अत्यंत आवश्यकता है। उनकी बात को न मंत्री टाल सकता था और न ही कोई अधिकारी। उर्दू मीडिया, सूचना मंत्रालय और रेडियो स्टेशन के विकास में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। अल्लामा इक़बाल के साहित्य में मानवता का संदेश अत्यंत प्रभावशाली रूप में मिलता है। उनकी काव्यात्मक संकेत-योजना (तल्मीहात) पर पूरा उपन्यास लिखा जा सकता है और उस पर पीएच.डी. स्तर का शोध भी संभव है, किंतु जिस प्रकार का कार्य जगन्नाथ आज़ाद ने किया, वह सदैव अविस्मरणीय रहेगा। कार्यक्रम से ढाका से प्रो. गुलाम रब्बानी, डॉ. आसिफ अली, सैयदा मरियम इलाही, शाह-ए-ज़मन, मोहम्मद शमशाद तथा अनेक शोधार्थी एवं छात्र-छात्राएँ ऑनलाइन जुड़े रहे। 

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