सलीम सिद्दीकी
नित्य संदेश, मेरठ। एक समय था जब मेला नौचंदी के दौरान पूरा शहर रात भर गुलजार रहता था। शहर की सड़कों पर रात भर घोड़ा तांगे की टप टप सुनाई देती थी। सरहद पार तक से लोग मेले का लुत्फ उठाने मेरठ आते थे। सांस्कृतिक गतिविधियों के केंद्र पटेल मंडप में होने वाले कार्यक्रमों का लोगों को बेसब्री से इंतजार रहता था। पानी में तैरते स्टीमर पर सवार होने के लिए लोग लंबी लाइनों में लगकर टिकट लेते थे, पर आज सब कुछ बदल चुका है। अब न वह दौर रहा न वो शौकीन। न मेले की कद्र है न ही कद्रदान। पूरे मेले का आज एक तरह से व्यवसायीकरण हो गया है।
कहने को तो यह मेला उत्तर भारत के प्रसिद्ध मेलों में शुमार है। और तो और इसे अब प्रांतीय मेले की पदवी भी मिल चुकी है, लेकिन इसके बावजूद आज भी यह मेला अपनी बदहाली पर जार जार है। मेले का एक दौर वह भी था जब पाकिस्तान तक से बड़ी संख्या में लोग हर साल मेले का लुत्फ उठाने मेरठ आया करते थे। पटेल मंडप के कार्यक्रमों में बड़ी बड़ी हस्तियां अपने जलवे बिखरने को तैयार रहते थे। इंडो-पाक मुशायरा और अखिल भारतीय कवि सम्मेलन पटेल मंडप की पहचान के साथ साथ उसकी आन, बान और शान हुआ करते थे।
इसके अलावा कव्वाली का लुत्फ उठाने के लिए तो दर्शकों में मारामारी का जबरदस्त आलम हुआ करता था। पंजाबी कवि दरबार भी खास हुआ करता था। नौचंदी मेले में रुकने तक की व्यवस्था होती थी और रात भर लोग मेले का लुत्फ उठाते थे। दिन में बाहर से आने वाले लोग खरीदारी करते थे और रात में मेला घूमते थे। शहर भर के सिनेमा हॉल भी पूरी रात खुले रहते थे। इन सबसे परे आज मेले का व्यवसायीकरण हो गया है, जिसके चलते मेले का वजूद ही दांव पर लग गया है।

No comments:
Post a Comment