नित्य संदेश। सुप्रीम कोर्ट देश की सर्वोच्च न्यायिक संस्था है और उसके प्रत्येक निर्णय का सम्मान करना हमारा संवैधानिक दायित्व है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वेच्छा से सेक्स वर्क करने वाले वयस्क व्यक्तियों के संबंध में दिए गए निर्देशों पर देशभर में चर्चा हो रही है। अदालत ने मुख्य रूप से यह कहा है कि केवल स्वेच्छा से सेक्स वर्क करने के कारण किसी वयस्क महिला को अपराधी नहीं माना जा सकता तथा उसके साथ सम्मानजनक व्यवहार किया जाना चाहिए।
इस निर्णय के सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभावों को लेकर समाज के एक बड़े वर्ग में चिंताएँ भी स्वाभाविक हैं। भारत की सभ्यता और संस्कृति परिवार-केंद्रित रही है। हमारे धार्मिक और सामाजिक मूल्यों में विवाह संस्था, पारिवारिक जीवन, नैतिक आचरण तथा सामाजिक मर्यादा को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। यह भी सत्य है कि मानव तस्करी, महिलाओं का शोषण, जबरन देह व्यापार और संगठित अपराध जैसी गतिविधियाँ समाज के लिए गंभीर खतरा हैं। इन पर कठोर कार्रवाई जारी रहनी चाहिए। साथ ही महिलाओं की गरिमा और मानवाधिकारों की रक्षा भी उतनी ही आवश्यक है। एक लोकतांत्रिक समाज में न्यायालय के निर्णयों पर सम्मानपूर्वक चर्चा होना स्वस्थ परंपरा है। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ भारतीय संस्कृति, पारिवारिक मूल्यों और सामाजिक उत्तरदायित्व का संतुलन भी बना रहे। भारत का भविष्य केवल आर्थिक विकास से नहीं, बल्कि मजबूत परिवार व्यवस्था, नैतिक मूल्यों, महिलाओं के सम्मान, युवाओं के चरित्र निर्माण और सांस्कृतिक संरक्षण से भी निर्धारित होगा। इसलिए इस विषय पर व्यापक सामाजिक संवाद की आवश्यकता है, ताकि संविधान की भावना और भारतीय समाज की सांस्कृतिक संवेदनाएँ दोनों सुरक्षित रह सकें।
— शाहीन परवेज़
सामाजिक कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता
अध्यक्ष उम्मीद ट्रस्ट


No comments:
Post a Comment