नित्य संदेश
"पहली बरखा,आनंदित वसुंधरा"
आनंदित हो रही वसुंधरा,
जलध बरखा बरस रही है।
बादलों की घनघोर घटा से,
मानो आकाश गंगा उतर रही हैं।
अब तक तपती धरती से,
मिट्टी की महक बिखर रही है।
गरज रहे है मेघ राज कभी ,
तो कभी बिजली चमक रही है।
करने को नव श्रृंगार प्रकृति,
देखो कैसे मचल रही है।
गीत गा रहे मोर- पिपुहा,
कोयल राग सुना रही है।
काली बदरी छाई अंबर पर,
मेघा, मल्हार गुनगुना रही है।
उत्सव छाया नव निर्माण का,
सुखी नदिया मुस्कुरा रही है।
आनंदित हो रही वसुन्धरा,
जलध बरखा बरस रही है।
रविंद्र तंवर सूर्योदय
बड़वाह (म. प्र.)


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