गुरू जीवन का आधार
किस मुख उपकारी गुरु का मैं करूं वर्णन।
जीवन की सत्यता का गुरु ही दिखाते दर्पण।
संस्कारित शिक्षा से सिंचित कर गुरु बने जीवन आधार।
गुरु बन अवतरे पुण्यधरा पर "उज्जवल भविष्य के कुंभकार।
कर्म अलौकिक जग में गुरु का सुरभित करें जीवन संचार।
संस्कार का दीप करें प्रज्वलित, किया इस जगती का उद्धार।
गुरु बिन इस जगत में छा जाता घोर अंधकार।
तिर गए हम कंटीला जीवन गुरु ही है पतवार।
कच्ची मिट्टी थे हम ना कोई हमारा वजूद था।
कुम्हार बनकर इस मिट्टी को गुरु ने आकार दिया।
शिक्षा की चाक से सींच कर जीवन हमारा संवार दिया।
उम्मीदों को नए पंख देकर बच्चों के मन को गुरु है पढ़ता।
आशा और विकास की अनगिनत नई इबारतें हैं गढ़ता।
कर्तव्य पथ पर अविरत बढ़कर, सन्मार्ग की सीढ़ी चढ़ाता।
रिश्ता मेरा और गुरु का ,जैसे दीपक- ज्योति ,सीप और मोती।
बिन सावन छाए जो पतझड़ गुरु ही सुंदर फूल खिलाए।
ज्ञान ज्योति के सागर से ही धरती से चांद तक पहुंचाएं।
गुरु का क्या गुणगान,
बखान करूं,गुरु चरणों में नित्य शीश धरूं।
अंधकारमय जीवन से ,गुरु ज्ञान से ही मैं इस दुनिया से तरूं।
—प्रिती धीरज जैन 'धीरप्रीत'
इंदौर, मध्यप्रदेश


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