तरुण आहुजा
नित्य संदेश, मेरठ। साल 1965 में आई वक्त फिल्म में बलराज साहनी द्वारा निभाया गया किरदार आज भी दर्शकों के दिलों में गहरा असर छोड़ता है—एक ऐसा पिता, जो समय के एक निर्मम वार से अपने परिवार से बिछड़ जाता है। वह दर्द, वह असहायता और बिखरते रिश्तों की पीड़ा, आज भी उतनी ही सजीव लगती है।
कुछ ऐसा ही दृश्य वर्ष 2026 में मेरठ के सेंटर मार्केट में देखने को मिला, जहां अचानक घटी एक घटना ने कई परिवारों और व्यापारियों की ज़िंदगी को झकझोर कर रख दिया। जो लोग कल तक अपने कारोबार और परिवार के साथ स्थिर जीवन जी रहे थे, वे आज अनिश्चितता और चिंता के दौर से गुजर रहे हैं।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, हालात इतनी तेजी से बदले कि किसी को संभलने का मौका तक नहीं मिला। कुछ ही पलों में खुशहाल माहौल तनाव और भावनात्मक उथल-पुथल में बदल गया। व्यापारियों की आँखों में भविष्य को लेकर डर साफ देखा जा सकता है, वहीं परिवारों में चिंता और असुरक्षा का माहौल है।
यह घटना मानो उसी ‘वक्त’ की याद दिला गई, जिसमें दिखाया गया था कि इंसान कितना भी मजबूत क्यों न हो, समय के सामने वह कितना छोटा पड़ जाता है। फर्क सिर्फ इतना है कि उस समय यह एक फिल्म की कहानी थी, और आज यह कड़वी हकीकत बनकर सामने आई है।
यह घटनाक्रम हमें एक बार फिर सोचने पर मजबूर करता है कि जीवन में सबसे अहम क्या है—धन और व्यापार या रिश्ते, धैर्य और संवेदनाएं। क्योंकि जब समय करवट लेता है, तो इंसान के पास सिर्फ उसका साहस और उसके अपने लोग ही सहारा बनते हैं।
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