नित्य संदेश
मां-बाबा की "प्रीत"
बसर करता है गुलशन में जब तलक बागबान,
दुआओं से उनकी रहता है आबाद सबका जहान।
सच है उनका रोकना,टोकना हमें लगती है बंदिश,
जाने के बाद उनके मगर, ज़िंदगी में रहती खलिश।
उनके होने से बहार-ए-रौनक,रहती खूब चहल-पहल,
चाहे मिले आज़ादी लाख, तुम बिन सूना सूना महल।
वो मायूस दर-ओ-दीवारें, चुपके से करती सरगोशी,
हुआ करती थी उनके आसपास भीड़,अब छाई रहती खामोशी।
सबको आता याद बहोत, जादुई स्वाद मां के हाथ का,
ज़ोरों की भूख नहीं लगती अब,मज़ा खाने में आपके साथ का।
आवाज़ में तल्खी की तपिश,बुरी लगती थी पापा की डांट,
उपर सख्ती,दिल में नरमी, उनके लाड़ दुलार से हमारे ठाठ।
कभी ना आना खाली हाथ, दिल चाहे कितना भी भरा,
दरवाजे पर दस्तक सुनकर, याद आता वो पल सुनहरा।
बागबान की सख्ती से ही महकते हैं गुल और उपवन,
कभी उजड़ते नहीं वो बाग, बागबान ने जो सींचे मधुबन।
कभी डांट,कभी लाड़ से सीखाते जीवन के अनमोल सबक,
मेरे संग मौजूद हरपल, महसूस करते हैं आपकी महक।
बेटी तनहा नहीं होती कभी,बनी दुनिया की प्यारी रीत,
मायके का आंगन छुटते ही, मिलती दूजे मां-बाबा की "प्रीत"।
—प्रीति धीरज जैन "धीरप्रीत"
इंदौर मध्यप्रदेश


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