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Tuesday, August 11, 2026

‘कालचक्र’ : बदलते रिश्तों और वृद्धावस्था के अकेलेपन का मार्मिक दस्तावेज


नवीन मौर्य

नित्य संदेश, इंदौर। 21वीं सानंद नाट्य स्पर्धा अब अपने अंतिम सोपान पर है। मंगलवार को संस्था प्रयास ने जयवंत दळवी लिखित और मुकुंद तेलंग निर्देशित नाटक ‘कालचक्र’ का अत्यंत हृदयस्पर्शी मंचन किया।


सानंद नाट्य स्पर्धा मे आज महाराजा तुकोजीराव क्लॉथ मार्केट मर्चेंट एसोसिएशन के अध्यक्ष श्री रजनीश चोरडिया ने दीप प्रचलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया।


अतिथि स्वागत किया जयंत भिसे, संजीव वावीकर ने। औपचारिक कार्यक्रम का सूत्रसंचालन किया सानंद मित्र  कु. उर्वी भालेराव एव कु. श्रेया देशमुख ने।

दरअसल, ‘कालचक्र’ केवल एक मध्यमवर्गीय परिवार की कहानी नहीं, बल्कि बदलती मानवीय संवेदनाओं, पारिवारिक मूल्यों और पीढ़ियों के बीच बढ़ती दूरी पर किया गया तीखा और अंतर्मुखी भाष्य है। वृद्धावस्था का अकेलापन, परिवार में बुजुर्गों का घटता महत्व और उससे उपजता मानसिक संघर्ष इस नाटक के केंद्रीय सरोकार हैं।


नाटक की मूल संवेदना परावलंबन और स्वाभिमान के द्वंद्व से आकार लेती है। जिन माता-पिता ने अपना पूरा जीवन और सामर्थ्य बच्चों के भविष्य को संवारने में लगा दिया, वही उम्र के पड़ाव पर बच्चों पर निर्भर होने लगते हैं तो उनके प्रति ‘बोझ’ जैसा व्यवहार क्यों होने लगता है, दळवी इसी कड़वी सच्चाई को बेहद सहजता से सामने रखते हैं। रोजमर्रा के छोटे-छोटे ताने, उपेक्षा, रूखापन और अपने ही घर में पराए होने का एहसास रिश्तों में आई दरार को प्रभावी ढंग से व्यक्त करते हैं।

‘कालचक्र’ शीर्षक ही नाटक की पूरी अवधारणा को समेटे हुए है। समय का चक्र निरंतर घूमता रहता है। आज जो युवा अपने बुजुर्ग माता-पिता की जरूरतों और भावनाओं को नजरअंदाज कर रहे हैं, उन्हें भी एक दिन उसी उम्र और परिस्थिति से गुजरना होगा। यही विचार दर्शक को अपने व्यवहार और रिश्तों के प्रति आत्ममंथन के लिए विवश करता है।


दळवी की सबसे बड़ी खूबी उनकी जीवंत चरित्र-रचना है। ‘बाबा’ के माध्यम से वृद्धावस्था की विवशता, बच्चों से जुड़ी अपेक्षाएं और आहत स्वाभिमान का मार्मिक संसार उभरता है। संवाद सहज, मितव्ययी और धारदार हैं, जिनमें मध्यमवर्गीय जीवन की स्वाभाविक भाषा दिखाई देती है। यह नाटक एक नया विचार देता है कि क्या वृध्द दंपति को गोद लिया जा सकता है ?


कुछ दशक पहले लिखा गया यह नाटक आज के एकल परिवारों और व्यस्त जीवनशैली के दौर में और अधिक प्रासंगिक हो उठा है। घर में रहते हुए भी बुजुर्गों का अकेलापन आज गंभीर सामाजिक प्रश्न है और ‘कालचक्र’ इसी प्रश्न को संवेदना के साथ सामने लाता है।

मंच पर कलाकारों ने कथा और चरित्रों को पूरी आत्मीयता से जीवंत किया। विशेष रूप से बाबा की भूमिका में वरिष्ठ अभिनेता मुकुंद तेलंग ने वृद्धावस्था की विवशता, अकेलेपन और आहत स्वाभिमान को अपने सधे हुए अभिनय से प्रभावी अभिव्यक्ति दी। राघव की भूमिका में दिलीप खोपकर और आई की भूमिका में वैशाली पिंगळे भी प्रभावित करती हैं। अन्य कलाकारों ने भी अपने-अपने किरदारों को स्वाभाविकता के साथ निभाते हुए नाटक के प्रभाव को गहराया।


मंच सज्जा, प्रकाश, ध्वनि, रंगभूषा और वेशभूषा के साथ नेपथ्य टीम का योगदान भी उल्लेखनीय रहा। सभी के सामूहिक प्रयासों से ‘कालचक्र’ ऐसा रंगानुभव बन सका, जो मंच से उतरने के बाद भी दर्शक के मन में देर तक अपने सवाल और संवेदनाएं छोड़ जाता है।

कलाकार :

मुकुंद तेलंग, परेश जोशी, शुभम लोकरे, वैशाली पिंगळे, रेणुका पिंगळे, कीर्ति तपस्वी, मनीष भालेराव, पयोधी अग्रवाल, विजय तेलंग, राम घोडगांवकर, समीर चितळे, हेमा क्षीरसागर।


बैकस्टेज :

लेखक : जयवंत दळवी।

निर्देशक एवं नेपथ्य योजना : मुकुंद तेलंग।

ध्वनि संकलन : परिधी अग्रवाल।

रंगभूषा योजना : सुषमा अवधूत।

वेशभूषा योजना : सौ. कल्पना तेलंग।

प्रकाश योजना : स्वप्नील मुकादम, हर्षवर्धन बंसल।

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