नित्य संदेश। 80 साल पहले जब लाल किले से पहला तिरंगा लहराया था, तो एक कौम ने सिर्फ अंग्रेजों से आज़ादी नहीं ली थी, उसने अपने आप से वादा किया था कि अब हम गुलाम नहीं रहेंगे। पर आज 80 साल बाद, आईने के सामने खड़े होकर एक सवाल पूछना जरूरी है - क्या हम सच में आज़ाद हैं?
हम आज़ाद हैं, क्योंकि हम वोट दे सकते हैं। पर क्या हम आज़ाद हैं नफरत से? क्या हम आज़ाद हैं भ्रष्टाचार से? क्या हम आज़ाद हैं इस डर से कि सच बोलेंगे तो नौकरी चली जाएगी, ट्रोल हो जाएंगे? भगत सिंह ने 23 साल की उम्र में फांसी का फंदा चूमा था ताकि आने वाली पीढ़ी खुली हवा में सांस ले सके। चंद्रशेखर आज़ाद ने खुद को गोली मार ली, पर अंग्रेजों के हाथ नहीं आए। अशफाक उल्ला खां और रामप्रसाद बिस्मिल जैसे दोस्तों ने साबित किया था कि हिंदू-मुसलमान का फर्क सिर्फ सियासत में है, शहादत में नहीं।
और हम? मेरठ की धरती से तो 1857 की पहली क्रांति शुरू हुई थी। इसी मिट्टी ने अंग्रेजों को बताया था कि हिन्दुस्तानी झुकता नहीं। आज उसी मेरठ में, उसी देश में हम 5 किलो अनाज और एक फ्री के वादे पर अपना ज़मीर बेच देते हैं।
80 साल की आज़ादी का मतलब क्या होना चाहिए?
1. पहली क्रांति - सोच की: आज़ादी का मतलब सिर्फ अंग्रेजों को भगाना नहीं था। आज़ादी का मतलब था गुलाम सोच को भगाना। जाति देखकर इंसान को परखना बंद करो। धर्म देखकर देशभक्ति नापना बंद करो।
2. दूसरी क्रांति - ईमानदारी की: शहीदों ने खून दिया था, हमने क्या दिया? एक ईमानदार दिन? एक बार रिश्वत लेने से मना करना भी एक क्रांति है। अपना काम ईमानदारी से करना भी देशभक्ति है।
3. तीसरी क्रांति - सवाल की: भगत सिंह ने कहा था - "बहरों को जगाने के लिए धमाके की जरूरत होती है।" आज बम की जरूरत नहीं, सवाल की जरूरत है। जो गलत है, उसे गलत कहो। चाहे वो सरकार हो, समाज हो या तुम्हारा अपना परिवार।
आजादी 15 अगस्त को एक दिन की छुट्टी नहीं है। आजादी एक जिम्मेदारी है। 80 साल पहले हमारे पुरखों ने हमें एक आज़ाद देश दिया था, अब हमारी बारी है कि हम अपने बच्चों को एक महान देश देकर जाएं।
जश्न मनाओ, पर नाच-गाने से नहीं, एक प्रण लेकर।
प्रण ये कि -
हम लडेंगे नहीं, लड़ाएंगे नहीं।
हम बिकेंगे नहीं, झुकेंगे नहीं।
हम भारत को फिर से विश्वगुरु नहीं, विश्व-मिसाल बनाएंगे।
इंकलाब जिंदाबाद! जय हिंद!
लियाकत मंसूरी
लेखक नित्य संदेश में संपादक है
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