नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। आज कथाव्यास प्रो. पूनम लखनपाल ने प्रो. सुधाकराचार्य त्रिपाठी की प्रेरणा से शास्त्रीनगर में निजनिवास पर सामवेद की नवमी कथा के पाँचवे दिन सामवेद के अष्टम प्रपाठक के द्वितीयार्धक की कथा की।
सामवेद की कथा में आज 12 आदित्यों में से अंशु और भृगु से सम्बद्ध दिनचर्या का वर्णन हुआ। आज की कथा के एकाधिक देवता हैं - अग्नि, इन्द्र, इन्द्राग्नी, विष्णु और सोम।डॉ पूनम ने आज 12:00 से 13:30 तक अंशु और 13:30 से 15:00 तक भृगु - दोनों आदित्यों का परिचय तथा उनके गणों ऋषि, यक्ष, गन्धर्व, नाग, राक्षस और अप्सरा के विषय में बताया। इस आदित्य के अंशु, अंशुमान्, अंशुमाली, अंशुधर, अंशुबाण आदि नाम हैं। भृगु भ्रस्ज् पाके धातु से बना है- पकाने वाला, तपाने वाला।
डॉ पूनम ने भृगु का परिचय देते हुए उनके पौराणिक आख्यानों का वर्णन किया। ऋषि याजकों से कहते हैं कि आप आनन्दमय, शूरवीर इन्द्र के लिए सोम अर्पित कीजिये जिसका पान कर वह अत्यधिक पराक्रमी बनते हैं। उनके जठर में सोम भी प्रशंसनीय है। यहाँ उन्होंने उदर के विभिन्न अंगों में बनने वाले एन्जाइम्स का उल्लेख किया और उसका वैज्ञानिक रूप प्रस्तुत किया।
ऋषि अग्नि से प्रार्थना करते हैं कि आप हमारी बुद्धियों को ज्ञान और वैभव की ओर प्रेरित कीजिये। इन्द्राग्नी इन्द्र की शक्ति है, जो हमें विद्युत् के रूप में दृष्टिगत होती है। यह उनके शौर्य का प्रतीक है, जो एक ही प्रहार से सबको कम्पित करने की सामर्थ्य रखती है।
ऋषि सोम को सम्बोधित करते हुए कहते हैं कि हे सोम आप उज्ज्वल, विकारों का शमन करने वाले और तीव्रगति से सुपात्र में अवतरित होते हैं। इन्द्र को बल प्रदान करते हैं। डॉ पूनम ने व्यक्ति और समष्टि के प्रसंग में मनुष्य और प्रकृति में इन्द्र और सोम को स्पष्ट किया। उन्होंने गीता आदि के उद्धरण और भजन की पंक्तियाँ भी प्रस्तुत कीं। आदित्य के अंशु और भृगु स्वरूप के आधार पर दिनचर्या और उसके कार्यविभाजन पर प्रकाश डाला।
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