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Thursday, July 16, 2026

मॉरीशस में हिंदी और उर्दू अलग नहीं हैं : प्रो. सगीर अफ़राहीम



नित्य संदेश ब्यूरो

मेरठ। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग एवं आयुसा के संयुक्त तत्वावधान में "मॉरीशस में उर्दू साहित्य" विषय पर एक ऑनलाइन संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में भारत, मॉरीशस, कनाडा, नेपाल, सऊदी अरब और कश्मीर सहित विभिन्न देशों एवं क्षेत्रों के विद्वानों ने सहभागिता की।

अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रसिद्ध साहित्यकार एवं आलोचक प्रो. सगीर अफ़राहीम ने कहा कि यदि उर्दू साहित्य का सबसे बड़ा केंद्र कहीं विकसित हुआ है तो वह मॉरीशस है। वहाँ हिंदी और उर्दू अलग नहीं हैं तथा हिंदू और मुसलमान मिल-जुलकर रहते हैं। उन्होंने कहा कि हिंदी और उर्दू के शिक्षक मिलकर भाषा और साहित्य के विकास में योगदान दे रहे हैं।
कार्यक्रम के संरक्षक एवं उर्दू विभागाध्यक्ष प्रो. असलम जमशेदपुरी ने कहा कि विभाग के कार्यक्रमों को अनेक देशों में देखा जा रहा है। उन्होंने बताया कि इस संगोष्ठी में प्रस्तुत शोध-पत्र प्रकाशित भी किए जाएंगे। उन्होंने कहा कि इस आयोजन का उद्देश्य मॉरीशस में उर्दू भाषा एवं साहित्य के विकास की यात्रा को समझना है। प्रसिद्ध दास्तानगो जावेद दानिश ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि मॉरीशस में उर्दू के प्रति लोगों का उत्साह अत्यंत प्रेरणादायक है। वहाँ बच्चों ने अल्प समय में नाटक तैयार कर मंचित किया, जिसे स्थानीय टेलीविजन पर भी प्रसारित किया गया। उन्होंने उच्चारण पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता बताई।

प्रो. मोहम्मद काज़िम ने कहा कि मॉरीशस के प्रत्येक विद्यालय में उर्दू पढ़ाई जाती है तथा पीएच.डी. स्तर तक इसकी शिक्षा उपलब्ध है। वहाँ के मुसलमान उर्दू को अपनी धार्मिक भाषा के रूप में देखते हैं और भारतीय भाषा एवं संस्कृति को विशेष सम्मान देते हैं। प्रो. अनवर पाशा ने कहा कि मॉरीशस साझा संस्कृति का सुंदर उदाहरण है। वहाँ के लोगों का उर्दू से गहरा भावनात्मक लगाव है। उन्होंने कहा कि भाषा और संस्कृति एक-दूसरे की पूरक हैं तथा मॉरीशस में उर्दू की मजबूत परंपरा विकसित हुई है। मुख्य अतिथि डॉ. आसिफ अली आदिल अली मोहम्मद ने कहा कि सभी शोध-पत्र उच्च स्तर के थे। उन्होंने कहा कि मॉरीशस में उर्दू धार्मिक और सांस्कृतिक जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है तथा वहाँ उर्दू शिक्षण सुव्यवस्थित ढंग से संचालित किया जा रहा है।

प्रो. रेशमा परवीन ने कहा कि इस संगोष्ठी से मॉरीशस में उर्दू साहित्य के विकास में योगदान देने वाले विद्वानों के कार्यों को जानने का अवसर मिला। उन्होंने कहा कि मॉरीशस की धरती उर्दू भाषा और साहित्य के लिए अत्यंत उर्वर है। इस अवसर पर डॉ. नाज़िया बेगम जाफ़ो ख़ान, डॉ. महरीन क़ादिर हुसैन तथा डॉ. सकीना बहादुर ने शोध-पत्र प्रस्तुत किए। मॉरीशस द्वीप की खोज 11वीं शताब्दी में हुई तथा 1560 के आसपास पुर्तगाली यहाँ आने लगे। महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट में शिक्षकों के लिए नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं। प्राथमिक और माध्यमिक स्तर के शिक्षकों को प्रोत्साहित किया जाता है। प्रशिक्षण कार्यक्रम इस प्रकार तैयार किए गए हैं कि वे शिक्षण के साथ-साथ सामाजिक दायित्वों के निर्वहन में भी सहायक हों।  उन्होंने बताया कि मॉरीशस में प्रत्येक व्यक्ति कम से कम तीन भाषाएँ बोलता है। महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट में शिक्षकों के लिए नियमित प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं तथा प्राथमिक से लेकर उच्च शिक्षा तक उर्दू का शिक्षण सुव्यवस्थित रूप से किया जाता है।

कार्यक्रम का शुभारंभ सईद अहमद द्वारा पवित्र कुरआन के पाठ से हुआ। स्वागत भाषण फरहत अख्तर, संचालन डॉ. इरशाद स्यानवी तथा धन्यवाद ज्ञापन एम.ए. उर्दू की छात्रा महविश ने किया। कार्यक्रम से डॉ. ज़ैन रामेश, डॉ. साक़िब हारून (नेपाल), मोहिउद्दीन (कश्मीर), अब्दुस्समीअ, डॉ. आसिफ अली, डॉ. अलका वशिष्ठ, डॉ. शादाब अलीम, डॉ. इफ़्फ़त ज़किया, शाह ज़मन, नायाब, सैयदा मरियम इलाही तथा अन्य छात्र-छात्राएँ भी ऑनलाइन जुड़े रहे। 

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