Breaking

Your Ads Here

Wednesday, July 8, 2026

आस्था की विजय: जब पंढरपुर में एक बालक के रक्षक बने स्वयं विट्ठल

नित्य संदेश 

•​एक सत्य घटना पर आधारित संस्मरण

​एक पारिवारिक संस्मरण, जो बताता है कि श्रद्धा का सबसे बड़ा प्रमाण अनुभव होता है। भारत की सांस्कृतिक परंपरा में कुछ पर्व केवल तिथियाँ नहीं होते, वे लोकजीवन की आत्मा बन जाते हैं। आषाढ़ी एकादशी ऐसा ही एक महापर्व है, जो महाराष्ट्र ही नहीं, पूरे देश के करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। इस दिन "पंढरपुर" स्थित भगवान श्री विट्ठल-रुक्मिणी मंदिर में दर्शन के लिए लाखों श्रद्धालु पहुँचते हैं। चंद्रभागा नदी में स्नान, हरिनाम संकीर्तन, वारकरी परंपरा की पदयात्राएँ और "जय जय राम कृष्ण हरी" का अखंड घोष इस तीर्थ को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर देता है। सदियों से यह विश्वास जीवित है कि पांडुरंग विट्ठल अपने भक्तों की पुकार अवश्य सुनते हैं।

ऐसी ही आस्था से जुड़ा एक सत्य संस्मरण मध्य प्रदेश के देवास स्थित "पवार परिवार" में आज भी श्रद्धापूर्वक सुनाया जाता है। यह घटना लगभग "एक शताब्दी पूर्व की है," किंतु परिवार की स्मृतियों में आज भी उतनी ही जीवंत है, मानो कल की बात हो। मध्य प्रदेश के मालवा अंचल के देवास निवासी श्रीमती मंजुलाबाई अमृतराव पवार साहेब अपने पाँच से सात वर्षीय पुत्र के साथ आषाढ़ी एकादशी के अवसर पर पंढरपुर पहुँची थीं। उस समय न आधुनिक परिवहन था, न यात्रियों के लिए आज जैसी सुविधाएँ। फिर भी श्रद्धा के बल पर लोग कठिन यात्राएँ करते थे। पंढरपुर पहुँचकर उन्होंने पहले अपने पुत्र को चंद्रभागा नदी में स्नान कराया और फिर मंदिर की सीढ़ियों पर बैठाकर मराठी में स्नेहपूर्वक कहा—"बाळा, इथेच बस. मी आंघोळ करून लगेच येते." अर्थात, "बेटा, यहीं बैठे रहना। मैं स्नान करके अभी आती हूँ।" किन्तु नियति ने उस दिन उनके विश्वास की एक कठिन परीक्षा लेनी थी। जब मंजुलाबाई साहेब स्नान कर लौटीं, तो उनका पुत्र वहाँ नहीं था। देखते ही देखते उनका हृदय आशंका से भर उठा। अपार भीड़ में वे व्याकुल होकर अपने पुत्र को खोजने लगीं। दूसरी ओर नन्हा बालक भी अपनी माँ को ढूँढ़ते-ढूँढ़ते रोने लगा। माँ और पुत्र दोनों एक-दूसरे को पुकार रहे थे, पर लाखों श्रद्धालुओं के शोर में उनकी आवाज़ें कहीं विलीन हो गईं।

इसी बीच एक वृद्ध, संतस्वरूप बाबा उस रोते हुए बालक के पास आए। उन्होंने बड़े स्नेह से उसके आँसू पोंछे और मराठी में पूछा, "बाळा, का रडतोस?" बालक ने मासूमियत से उत्तर दिया, "माझी आई दिसत नाही." अर्थात, "मेरी आई दिखाई नहीं दे रही है।" वृद्ध ने प्रेमपूर्वक उसे प्रसाद के दो लड्डू दिए, उसका भय दूर किया और मंदिर के समीप एक चबूतरे पर बैठाकर कहा, "इथेच बस. तुझी आई नक्की येईल।" यानी, "यहीं बैठे रहो, तुम्हारी माँ अवश्य आ जाएगी।" कुछ समय बाद पुत्र की खोज में व्याकुल मंजुलाबाई साहेब की दृष्टि उसी चबूतरे पर बैठे अपने पुत्र पर पड़ी। वे भावविह्वल होकर "बाळा... बाळा..." पुकारती हुई उसके पास दौड़ीं और उसे अपने हृदय से लगा लिया। उस क्षण शब्द गौण हो गए; माँ और पुत्र दोनों की आँखों से बहते आँसू ही उनके मिलन की भाषा बन गए। बालक ने शांत होने पर पूरी घटना अपनी माँ को सुनाई। मंजुलाबाई साहेब ने चारों ओर उस वृद्ध संत को खोजा, पर वे कहीं दिखाई नहीं दिए। उसी क्षण उनके अंतर्मन में यह अनुभूति जागी कि वह कोई सामान्य वृद्ध नहीं थे, बल्कि स्वयं पांडुरंग विट्ठल थे, जिन्होंने भक्त की पुकार सुनकर उसके पुत्र की रक्षा की।

​यह अनुभूति किसी तर्क का विषय नहीं थी। यह एक माँ के विश्वास और उसके अनुभव का सत्य था। वे श्रद्धा से अभिभूत होकर भगवान विट्ठल के दर्शन करने पहुँचीं और कृतज्ञ मन से देवास लौट आईं। समय बीतता गया। वही बालक आगे चलकर देवास के प्रथम फोटोग्राफर एवं आर्टिस्ट श्री गणपतराव पवार साहेब के रूप में प्रतिष्ठित हुए। उन्होंने अपने परिवार के साथ-साथ तत्कालीन देवास रियासत का भी नाम गौरवान्वित किया। आज उनकी चौथी पीढ़ी तक परिवार कला, संस्कृति और सामाजिक योगदान के क्षेत्र में अपनी विशिष्ट पहचान बनाए हुए है। परिवार के सदस्यों के अनुसार, स्व. श्री गणपतराव साहेब जब भी इस घटना का स्मरण करते थे, उनकी आँखें स्वतः भर आती थीं। उन्होंने यह संस्मरण दशकों पूर्व एकादशी के अवसर पर अपनी चौथी पुत्रवधु श्रीमती ज्योति प्रेमराव पवार जी को सुनाया था। उस समय भी वे भावुक हो उठे थे। तभी से यह प्रसंग परिवार की अमूल्य धरोहर के रूप में पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुरक्षित है। ऐसे संस्मरणों को केवल चमत्कार की दृष्टि से नहीं देखना चाहिए। भारतीय समाज में परिवारों के भीतर पीढ़ियों से संजोई गई स्मृतियाँ हमारी सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। वे यह बताती हैं कि कठिन परिस्थितियों में मनुष्य को संबल देने वाली सबसे बड़ी शक्ति उसका विश्वास होता है। आस्था का अर्थ अंधविश्वास नहीं, बल्कि वह आत्मिक आश्रय है जो विपत्ति के क्षणों में मनुष्य को टूटने नहीं देता।

पंढरपुर की परंपरा भी यही कहती है कि भगवान विट्ठल केवल मंदिर के गर्भगृह तक सीमित नहीं हैं। वे अपने भक्त के विश्वास, करुणा और जीवन के अनुभवों में उपस्थित रहते हैं। संभव है कि किसी के लिए यह एक संयोग हो, किसी के लिए एक आध्यात्मिक अनुभव; किंतु जिन लोगों ने इसे जिया है, उनके लिए यह ईश्वर की कृपा का सजीव प्रमाण है। आषाढ़ी एकादशी का संदेश भी यही है कि निष्कलुष श्रद्धा मनुष्य को भीतर से दृढ़ बनाती है। जब विश्वास निर्मल हो और भक्ति निष्कपट, तब ईश्वर किसी न किसी रूप में अपने भक्त का हाथ थाम ही लेते हैं। शायद इसी विश्वास ने पंढरपुर को केवल एक तीर्थ नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों के हृदय का आध्यात्मिक आश्रय बना दिया है।

​“जय जय राम कृष्ण हरी।

पांडुरंग विट्ठल महाराज की जय।।”


अमित राव पवार, देवास (म.प्र.)

युवा लेखक-साहित्यकार


No comments:

Post a Comment

Your Ads Here

Your Ads Here