नित्य संदेश
क्यों बदल रही हूं मैं ?
हर एक की बात मानने वाली,
सर को झुका के सब सहन करने वाली,
न जाने अब इस मोड़ पर ऐसी हो रही हूं मैं,
दिल घबरा जाता है खुद पर,
क्यों बदल रही हूं मैं ?
परसों से आंखों में नमी लिए,
अपनों के अपनेपन को तरसती,
अब शायद खुद से ही लड़ रही हूं मैं,
क्यों बदल रही हूं मैं ?
परछाइयों के पीछे भागते-दौड़ते,
शायद थक गई हूं मैं,
पापा ने न जाने क्यों कहां था,
बोलों जो गलत लगे,
बेटियां न जाने क्यों प्यारी होती है बाप को ?
खुद से ज्यादा प्यारी होती है।
शहजादियों की तरह रहती है।
फिर क्यों बेसहारा होती है ?
उनके जाने के बाद समझ आया,
छांव नहीं है अब।
नंगे पांव धूप में खड़ी हूं मैं,
इसलिए अब खुद से भी लडी हूं मैं,
मुझको पता है बदली नहीं,
बस अंदर से अकेली डरी हुई हूं मैं।
—डॉ शबनम सुल्ताना
(लेखिका फिजियोथेरेपिस्ट हैं।)


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