• वामा साहित्य मंच के गुरु पूर्णिमा पर आयोजित कार्यक्रम में सदस्यों ने याद किए अपने-अपने गुरु
नित्य संदेश, इंदौर। "गुरु एक अक्षर का ज्ञान भी शिष्य को दे दें तो इस पृथ्वी पर ऐसा कोई द्रव्य या वस्तु नहीं जिसे गुरु को समर्पित कर शिष्य ऋणमुक्त हो जाए।" यह बात वरिष्ठ संस्कृति कर्मी विनय उपाध्याय ने अपने वीडियो संदेश में गुरु पूर्णिमा पर आयोजित वामा साहित्य मंच की मासिक गोष्ठी में कही।
उन्होंने कहा कि हमारी भारतीय संस्कृति में वेद व्यास से गुरु परंपरा चली आ रही है। यदि किसी ने गुरु के प्रति अपने भाव-सुमन श्रद्धा से अर्पित कर दिए, तो वे उसी से प्रसन्न हो जाते हैं।
कार्यक्रम का आरंभ रचना चौपड़ा द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना और दीप प्रज्वलन से हुआ। संस्था की अध्यक्ष ज्योति जैन ने सदस्यों का हार्दिक अभिनंदन करते हुए अपने उद्बोधन में स्वयं के गुरु श्रीराम ताम्रकर को याद किया और बताया कि उन्होंने मुझे सिखाया कि लिखते हो तो छपना भी जरूरी है। गुरु का सानिध्य ही मनुष्य के पूरे जीवन को रूपांतरित कर देता है।
कार्यक्रम में मृदुला गर्ग, कविता अर्गल, नीरजा जैन, भावना दामले, एकता कश्मीरे, नेहा जैन, दिव्या मंडलोई, वैजयंती दाते, अवंति श्रीवास्तव, उषा गुप्ता, प्रतिमा जाट, माधुरी कनल, संगीता परमार, रूपाली पाटनी, अंजना सक्सेना, विभा भटोरे, विभा जैन, शांता पारेख, कोमल रामचंदानी, रजनी भारतीय, डॉ. सुशीला सालगिया, इंदु पाराशर आदि सदस्यों ने अपने गुरुओं को स्मरण करते हुए रोचक एवं प्रेरणास्पद संस्मरण साझा किए।
कार्यक्रम की संयोजक थीं डॉ. रागिनी सिंह एवं रश्मि चौधरी। डॉ. प्रगति जैन ने पूरे आयोजन को एक सूत्र में पिरोकर सामंजस्य बनाए रखा। खास बात यह थी कि संस्था की उन सदस्यों को प्राथमिकता दी गई जो किसी न किसी रूप में शिक्षण से जुड़ी हैं।
संस्था की वरिष्ठ मार्गदर्शक डॉ. प्रेम कुमारी नाहटा और डॉ. शारदा मंडलोई को जन्मदिन की बधाई दी गई।
सचिव स्मृति आदित्य ने अतिथियों के प्रति आभार व्यक्त किया। इस अवसर पर बड़ी संख्या में संस्था की सदस्याएं मौजूद थीं।



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