हमारा खून सड़कों पर नहीं, इंसानियत बचाने के लिए बहना चाहिए: अशरफ़ हुसैनी
इकराम चौधरी
नित्य संदेश, मेरठ। ऐसे दौर में जब समाज को छोटी-छोटी बातों पर
बांटने की कोशिशें हो रही हैं, नफरत और हिंसा की खबरें अक्सर
सुर्खियां बनती हैं, वहीं मेरठ के जड़ौदा गांव ने एक ऐसी
मिसाल पेश की जिसने यह साबित कर दिया कि यदि नीयत नेक हो तो समाज को जोड़ने के लिए
किसी बड़े मंच की नहीं, बल्कि बड़े दिल की जरूरत होती है।
समाजसेवी हाजी फरमान की ओर से आयोजित भव्य आम पार्टी (मैंगो फेस्ट) और विशाल
रक्तदान शिविर केवल एक सामाजिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि
इंसानियत, भाईचारे और जनसेवा का जीवंत संदेश था।
कार्यक्रम में गांव के लोगों के साथ-साथ आसपास के क्षेत्रों और दूर-दराज़ से
आए मेहमानों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। आम की मिठास ने जहां रिश्तों में अपनापन
घोला, वहीं रक्तदान शिविर ने यह संदेश दिया कि किसी अनजान इंसान की जिंदगी बचाने
से बड़ा कोई धर्म और कोई इबादत नहीं हो सकती। इस भव्य आयोजन को सफल बनाने में
मुंशी आरिफ जमील, मुंशी आले अहमद, तारिक
जमील, फरमान अहमद और फैजान जैदी की महत्वपूर्ण भूमिका रही।
सभी आयोजकों ने मेहमानों का पूरे सम्मान और आत्मीयता के साथ स्वागत किया।
कार्यक्रम की व्यवस्था और अनुशासन की सभी ने मुक्तकंठ से सराहना की। कार्यक्रम में
पूर्व कैबिनेट मंत्री शाहिद मंजूर मौलाना सिराज कासमी दारुल उलूम देवबंद मौलाना
मुजीब डॉक्टर शादाब अली वरिष्ठ पत्रकार इकराम चौधरी बसपा नेता साजिद अली, आतिर आरिफ मंजूर, डॉ. तारिक हमीद (सर्जन, सफदरजंग अस्पताल, नई दिल्ली), डॉ.
गोपाल (एलएलआरएम मेडिकल कॉलेज, मेरठ), भाटी
जी (मैनेजर, वेदांत हॉस्पिटल), राजू
भड़ाना (भाजपा किसान प्रकोष्ठ), नितिन भड़ाना, नौशाद अहमद, शान मोहम्मद (मवाना) सहित अनेक सामाजिक,
राजनीतिक एवं चिकित्सा जगत से जुड़े गणमान्य लोग मौजूद रहे। सभी
अतिथियों ने आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि समाज को ऐसे कार्यक्रमों की आज सबसे
अधिक आवश्यकता है, जो लोगों को जोड़ें और सेवा का भाव जगाएं।
रक्तदान शिविर में युवाओं ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। कई युवाओं ने पहली बार
रक्तदान किया और कहा कि उन्हें इस बात की खुशी है कि उनका रक्त किसी जरूरतमंद की
जिंदगी बचाने में काम आएगा। डॉक्टरों की टीम ने रक्तदाताओं का स्वास्थ्य परीक्षण
कर सुरक्षित तरीके से रक्त संग्रह किया। कार्यक्रम के दौरान लगातार यही संदेश दिया
जाता रहा कि "रक्तदान महादान है, क्योंकि इससे किसी की सांसें लौट सकती हैं।"
इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक चिंतक अशरफ़ हुसैनी ने अत्यंत भावुक शब्दों में कहा "आज हमें यह तय करना होगा कि हमारा खून आखिर बहे तो किसलिए? क्या वह नफरत की आग में सड़कों पर बहे, या किसी मां की गोद उजड़ने से बचाने के लिए अस्पताल की बोतल में पहुंचे? मैं सरकार और समाज दोनों से कहना चाहता हूं कि हमारा खून सड़कों पर बहाने की नौबत कभी न आने दें। यदि हमारे खून की जरूरत है, तो उसे रक्तदान के रूप में लिया जाए, ताकि यही खून देश की सीमाओं पर डटे हमारे जवानों की जिंदगी बचा सके, अस्पतालों में जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहे मरीजों के काम आ सके, किसी गरीब की मां की आंखों में उम्मीद लौटा सके और किसी मजलूम की सांसों को नई जिंदगी दे सके। इंसान का सबसे बड़ा मजहब इंसानियत है, और रक्तदान उसी इंसानियत का सबसे खूबसूरत रूप है।" उन्होंने आगे कहा कि समाज की असली पहचान उसके ऊंचे भवनों या बड़ी-बड़ी बातों से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि वहां के लोग एक-दूसरे के दुख-दर्द में कितने काम आते हैं। जड़ौदा गांव का यह आयोजन आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा है कि मोहब्बत बांटने वाले हाथ हमेशा नफरत फैलाने वालों से ज्यादा मजबूत होते हैं।
कार्यक्रम के अंत में आयोजक हाजी फरमान ने सभी अतिथियों, रक्तदाताओं,
चिकित्सकों और सहयोगियों का दिल से आभार व्यक्त करते हुए कहा कि
उनका उद्देश्य केवल आम पार्टी आयोजित करना नहीं था, बल्कि
समाज को यह संदेश देना था कि मिठास केवल आम में नहीं, बल्कि
इंसान के व्यवहार और उसके कर्मों में भी होनी चाहिए।
जड़ौदा गांव का यह आयोजन एक बार फिर यह साबित कर गया कि जब समाज सेवा, भाईचारा और
इंसानियत एक साथ खड़े हो जाते हैं, तब हर आयोजन एक उत्सव
नहीं, बल्कि एक आंदोलन बन जाता है। ऐसी पहलें समाज को नई
दिशा देती हैं और यह संदेश छोड़ जाती हैं कि धर्म, जाति और
राजनीति से ऊपर उठकर यदि किसी चीज़ की सबसे अधिक जरूरत है, तो
वह है इंसानियत, मोहब्बत और एक-दूसरे के लिए जीने का जज़्बा।


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