-कारगिल विजय की यादों के
साथ ताजा हुआ शहीद का बलिदान, मां बोलीं— "अम्मी, दुश्मन ने हमला किया है... अब देश पहले है"
वसीम अहमद
नित्य संदेश, किठौर। कारगिल विजय दिवस की स्मृतियां जैसे ही ताजा होती हैं, क्षेत्र के गांव ललियाना
के वीर सपूत ग्रेनेडियर नायक जुबैर अहमद की शहादत की गौरवगाथा एक बार फिर लोगों की
आंखें नम कर देती है। मातृभूमि की रक्षा करते हुए टाइगर हिल पर अदम्य साहस का
परिचय देने वाले जुबैर अहमद ने दुश्मन के बंकरों को ध्वस्त करते हुए अपने सीने पर
करीब 40 गोलियां खाईं, लेकिन अंतिम सांस तक पीछे हटना स्वीकार नहीं किया।
आज भी जब उनकी मां मुन्नी बेगम बेटे को याद करती हैं तो आंखें छलक उठती हैं।
हालांकि बेटे की शहादत का गम उनके चेहरे पर साफ दिखाई देता है, लेकिन उससे कहीं अधिक
उनके दिल में इस बात का गर्व है कि उनका बेटा देश की रक्षा करते हुए वीरगति को
प्राप्त हुआ। मुन्नी बेगम बताती हैं कि वर्ष 1999 में जुबैर अहमद का तबादला
22 ग्रेनेडियर हैदराबाद से जम्मू हुआ था। जून माह में वह छुट्टी लेकर घर आए हुए
थे। इसी दौरान रेडियो पर कारगिल युद्ध की खबर प्रसारित हुई। खबर सुनते ही जुबैर ने
अपना बैग उठाया और मां से कहा, "अम्मी, दुश्मन देश ने हम पर हमला कर दिया है। अब मुझे जाना
होगा।" 17 जून 1999 को वह घर से ड्यूटी पर रवाना हो गए। इसके बाद 3 जुलाई को किठौर पुलिस
गांव ललियाना पहुंची और उनके पिता जर्रार अहमद को सूचना दी कि उनका बेटा कारगिल
युद्ध में देश की रक्षा करते हुए शहीद हो गया है। यह खबर सुनते ही पूरे गांव में
मातम पसर गया, लेकिन हर आंख में अपने वीर सपूत पर गर्व भी झलक रहा था। शहीद के भाई जफर बताते
हैं कि कारगिल की टाइगर हिल पर दुश्मन की मजबूत चौकियों को ध्वस्त करने का अभियान
चल रहा था। हालात बेहद कठिन थे। वरिष्ठ अधिकारियों ने भी जोखिम को देखते हुए
सावधानी बरतने को कहा, लेकिन जुबैर अहमद और उनके साथियों ने पीछे हटने से इनकार कर दिया। वह सीधे
पाकिस्तानी बंकरों की ओर बढ़े और दुश्मनों पर कहर बनकर टूट पड़े। बंकरों को तबाह
करते हुए उन्होंने अदम्य वीरता का परिचय दिया। इसी दौरान दुश्मन की गोलियों की
बौछार में उनके सीने पर करीब 40 गोलियां लगीं और वह मातृभूमि की रक्षा करते हुए
वीरगति को प्राप्त हो गए।
सरकारी घोषणाएं कागजों तक सीमित रहीं
10 जुलाई 1999 को सैन्य सम्मान के साथ
शहीद जुबैर अहमद का पार्थिव शरीर गांव ललियाना पहुंचा। हजारों लोगों ने नम आंखों
से अपने वीर सपूत को अंतिम विदाई दी। उस समय तत्कालीन जिलाधिकारी संजय अग्रवाल भी
सैन्य अधिकारियों के साथ गांव पहुंचे थे। उन्होंने शहीद के सम्मान में
राधना-ललियाना मार्ग का नामकरण, गांव के बाहरी छोर पर शहीद द्वार का निर्माण, भव्य समाधि स्थल विकसित
कराने, आश्रित परिवार को खादर क्षेत्र में कृषि भूमि उपलब्ध कराने सहित कई घोषणाएं की
थीं। परिजनों का आरोप है कि समय बीतता गया, सरकारें बदलती रहीं, लेकिन अधिकांश घोषणाएं आज
तक धरातल पर नहीं उतर सकीं। न तो शहीद द्वार बन सका, न ही मार्ग का नामकरण हुआ
और न ही उनकी स्मृति के अनुरूप भव्य समाधि स्थल का निर्माण कराया गया। इससे परिवार
और ग्रामीणों में निराशा है।
मुन्नी बेगम बताती हैं कि शहीद होने के बाद सरकार की ओर से 10 लाख रुपये की आर्थिक
सहायता और एक पेट्रोल पंप दिया गया था, जिसे शहीद की पत्नी इमराना उर्फ रानी अपने साथ ले गईं।
वर्तमान में वह मेरठ के जैदी फार्म क्षेत्र में अपनी बेटियों सना, निशा और बेटे खालिद जुबैर
के साथ रहती हैं। बड़ी बेटी की शादी हो चुकी है। शहीद जुबैर अहमद के भाई जफर बताते
हैं कि उनके परिवार का सेना से पुराना रिश्ता रहा है। उनके दादा शराफतउल्ला भी
भारतीय सेना में रहकर कई युद्धों में हिस्सा ले चुके थे। उन्हीं से प्रेरणा लेकर
जुबैर ने भी सेना की वर्दी पहनी और देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। अब शहीद
जुबैर की छोटी बेटी निशा भी अपने पिता के पदचिह्नों पर चलते हुए भारतीय सेना में
अधिकारी बनने की तैयारी कर रही हैं।
आज भी गांव को है अपने वीर सपूत पर नाज़
कारगिल विजय दिवस पर गांव ललियाना के लोग अपने शहीद बेटे को श्रद्धा और गर्व
के साथ याद करते हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जुबैर अहमद जैसे वीर सपूतों की
बदौलत देश की सीमाएं सुरक्षित हैं। उनका बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए देशभक्ति, साहस और राष्ट्रसेवा की
अमिट प्रेरणा बना रहेगा। उनकी शहादत केवल ललियाना ही नहीं, बल्कि पूरे मेरठ जनपद और
देश के लिए गौरव का विषय है।
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