नवीन मौर्य
नित्य संदेश, इंदौर। श्री स्वामी समर्थ की विचारधारा को समृद्ध करती मराठी फिल्म 'देऊळबंद 2' का प्रदर्शन सानंद न्यास के पांच दर्शक समूहों के लिए यूनिवर्सिटी ऑडिटोरियम में शनिवार से प्रारंभ हुआ। मराठी सिनेमा की सबसे बड़ी ताकत यह रही है कि उसने मनोरंजन को केवल हंसी-ठिठोली तक सीमित नहीं रखा, बल्कि समाज के सबसे कठिन प्रश्नों को भी संवेदनशीलता और ईमानदारी के साथ पर्दे पर उतारा। निर्देशक प्रवीण तरडे की 'देऊळबंद 2' इसी सशक्त परंपरा की अगली कड़ी है। यह फिल्म श्रद्धा और सामाजिक यथार्थ के बीच एक ऐसा सेतु बनाती है, जहां किसान की पीड़ा, व्यवस्था की संवेदनहीनता और मनुष्य के भीतर जीवित विश्वास की लौ एक साथ दिखाई देती है।
वर्ष 2015 में आई 'देऊळ बंद' विज्ञान और अध्यात्म के वैचारिक संघर्ष पर आधारित थी। उसके विपरीत 'देऊळ बंद 2' उसी शीर्षक को आगे बढ़ाते हुए बिल्कुल अलग धरातल पर खड़ी दिखाई देती है। इस बार कथा का केंद्र विचारों का टकराव नहीं, बल्कि खेतों में पसीना बहाने वाले उस किसान का जीवन है, जो प्रकृति की मार और व्यवस्था की उपेक्षा के बीच अपनी उम्मीदों को बचाए रखने का संघर्ष करता है।
फिल्म की शुरुआत ही दर्शक को भीतर तक झकझोर देती है। नदी किनारे श्मशान के पास बैठी संगीता पायगुडे अपने पति की आत्महत्या के बाद शोक, क्रोध और असहायता के चरम पर है। प्रकृति की बेरुखी और प्रशासन की निष्क्रियता ने उसका संसार उजाड़ दिया है। वह ईश्वर के अस्तित्व को चुनौती देती है और श्री स्वामी समर्थ से प्रश्न करती है। यहीं से कथा केवल धार्मिक आस्था की नहीं, बल्कि टूटे हुए मनुष्य के भीतर आशा की पुनर्स्थापना की यात्रा बन जाती है।
स्नेहल तरडे ने संगीता के चरित्र को असाधारण संवेदनशीलता के साथ निभाया है। उनके चेहरे के भाव, मौन और संवाद,तीनों मिलकर उस किसान स्त्री की वेदना को जीवंत कर देते हैं, जो परिस्थितियों से लड़ते-लड़ते भीतर से टूट चुकी है, लेकिन हार मानने को तैयार नहीं। लंबे अंतराल के बाद पर्दे पर लौटे मोहन जोशी ने श्री स्वामी समर्थ के रूप में अत्यंत संयमित और प्रभावशाली अभिनय किया है। उनके व्यक्तित्व में नाटकीयता नहीं, बल्कि सहज आध्यात्मिक गरिमा दिखाई देती है।
फिल्म की सबसे बड़ी शक्ति इसके संवाद हैं। विशेषकर एक नास्तिक स्त्री और ईश्वर के बीच होने वाले प्रश्नोत्तर केवल धार्मिक विमर्श नहीं रह जाते, बल्कि वे जीवन, पीड़ा, विश्वास और मनुष्य की सीमाओं पर गहन चिंतन का अवसर बनते हैं। कई दृश्य दर्शक को भावुक कर देते हैं और मन में लंबे समय तक गूंजते रहते हैं।
निर्देशक प्रवीण तरडे ने किसान आत्महत्या जैसे अत्यंत संवेदनशील विषय को सनसनीखेज बनाने के बजाय मानवीय दृष्टि से प्रस्तुत किया है। फिल्म यह स्वीकार करती है कि श्रद्धा समस्याओं का तात्कालिक समाधान नहीं होती, लेकिन वह निराशा के अंधकार में संघर्ष करने का मानसिक संबल अवश्य बन सकती है। यही संदेश फिल्म को विशिष्ट बनाता है।
तकनीकी दृष्टि से भी फिल्म सधी हुई है। ग्रामीण परिवेश का चित्रण, कैमरे की भाषा, पार्श्व संगीत और दृश्य संयोजन कथा के भावों को प्रभावी ढंग से उभारते हैं। फिल्म कहीं भी अनावश्यक मेलोड्रामा का सहारा नहीं लेती, बल्कि अपनी संवेदनाओं को स्वाभाविक प्रवाह में व्यक्त करती है।जो दर्शक पहले भाग की तरह विज्ञान और अध्यात्म के बीच गहरे वैचारिक विमर्श की अपेक्षा लेकर आएंगे, उन्हें यह फिल्म अलग अनुभव देगी। यह बौद्धिक बहस की बजाय भावनात्मक और सामाजिक सरोकारों पर अधिक केंद्रित है। किंतु यही इसकी मौलिकता भी है।
'देऊळबंद 2' केवल एक धार्मिक फिल्म नहीं, बल्कि भारतीय किसान के जीवन, उसके संघर्ष, उसकी पीड़ा और उसके भीतर बची हुई आशा का मार्मिक दस्तावेज है। यह दर्शक को केवल
भावुक नहीं करती, बल्कि यह प्रश्न भी छोड़ जाती है कि जिस किसान के श्रम पर समाज का जीवन टिका है, उसके जीवन को सुरक्षित और सम्मानजनक बनाने की जिम्मेदारी आखिर किसकी है ? दरअसल,यह फिल्म श्रद्धा, संवेदना और सामाजिक चेतना का ऐसा संगम प्रस्तुत करती है, जो मनोरंजन से आगे बढ़कर आत्ममंथन का अवसर देता है। यही इसकी सबसे बड़ी सफलता है।
रविवार को 3 शो
सानंद न्यास के अध्यक्ष जयंत भिसे और मानद सचिव संजीव वावीकर ने बताया कि फिल्म के तीन शो रविवार, को होंगे। 'मामा मुजुमदार' समूह – प्रातः 10 बजे, 'वसंत' समूह – दोपहर 4 बजे, और 'बहार' समूह के लिए सायं 7:30 बजे।





No comments:
Post a Comment