नित्य संदेश। भारत देश में स्वच्छ भारत मिशन को 10 साल पूरे हो गए। आंकड़े बताते हैं देश में 11.72 करोड़ शौचालय बन चुके हैं। जिसमें 82% शहर उत्कृष्ट घोषित हो चुके हैं। लेकिन जमीनी हकीकत अब भी अलग तस्वीर दिखाती है। देश में कई जगह आज भी खुले में लोगों को शौच करते देखा जा सकता है। सिंगापुर एयरपोर्ट पर शौचालय फ्री, चमकदार और 24 घंटे खुले रहते हैं। जापान में स्मार्ट टॉयलेट और जर्मनी में पार्क की बेंच जितनी आम बात है सार्वजनिक शौचालय। वहीं दिल्ली में आज भी सुबह 5 बजे यमुना किनारे और निजामुद्दीन रेलवे ट्रैक पर लोगों की लाइन लगती है। वजह सिर्फ ₹10 की वसूली है। सेवा नहीं,देश में शौचालय मानो व्यापार बन गया है।
देश के जागरूक लोगों का मानना है कि दुनिया शौचालय को स्वास्थ्य का हिस्सा मानती है। उनका तर्क है बीमारी होने के बाद लाखों रुपये दवा और अस्पताल पर खर्च करने से अच्छा है, पहले ही थोड़ा खर्च करके बीमारी को रोक लिया जाए। एक शौचालय पर 15 लाख रुपये खर्च करो, वरना 500 लोगों के डायरिया-टाइफाइड के इलाज पर 24 लाख रुपये सरकार को खर्च करने पड़ेंगे। लेकिन भारत में स्वच्छ भारत मिशन-शहरी 2.0 के तहत अधिकांश शौचालय ढढढ मॉडल पर चल रहे हैं। ठेकेदार को मेंटेनेंस के लिए फीस चाहिए। नतीजा: एक मजदूर को महीने के ₹500-₹600 सिर्फ शौचालय के लिए देने पड़ते हैं। जो नहीं दे पाता वो आज भी खुले में शौच को मजबूर है।आंकड़े पूरे, उपयोग आधा
सरकार के आंकड़े झूठे नहीं हैं, पर अधूरे हैं। डब्लूएचओ की रिपोर्ट कहती है यदि शुल्क ₹2 से ऊपर चला जाए तो गरीबों का शौचालय उपयोग 40% तक घट जाता है। हिमाचल हाईकोर्ट ने हाल ही में शिमला में महिलाओं से शुल्क वसूलने पर रोक लगाई।
सरकार के आंकड़े झूठे नहीं हैं, पर अधूरे हैं। डब्लूएचओ की रिपोर्ट कहती है यदि शुल्क ₹2 से ऊपर चला जाए तो गरीबों का शौचालय उपयोग 40% तक घट जाता है। हिमाचल हाईकोर्ट ने हाल ही में शिमला में महिलाओं से शुल्क वसूलने पर रोक लगाई।
सुप्रीम कोर्ट भी 2016 में कह चुका है कि स्वच्छता अनुच्छेद 21 के तहत "गरिमा से जीने का अधिकार" है। फिर सार्वजनिक शौचालयों में वसूली क्यों?क्या है समाधान पर्यावरणविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने 4 सूत्री समाधान सुझाया है। जिसमें वित्तीय मॉडल: 15वें वित्त आयोग का पैसा और स्वास्थ्य बजट से शौचालयों की फंडिंग हो। सीएसआर भागीदारी: कंपनियां शौचालय गोद लें और बदले में दीवार पर विज्ञापन का अधिकार पाएं। सभी के लिए मुफ्त: महिला, बच्चा, दिव्यांग और इढछ परिवारों के लिए शौचालय 100% निशुल्क हो। स्मार्ट मैनेजमेंट: एलओटी ऑटो सफाई और शिकायत ऐप के साथ "एक शहर-एक एसपीवी मॉडल डीएमआरसी की तर्ज पर लागू हो। सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं कि स्वच्छ भारत का पहला चरण ईंट-सीमेंट का था। अब दूसरा चरण इंसानियत का होना चाहिए। जब तक शौचालय "सेवा" नहीं बनेगा, "सामान" बना रहेगा, तब तक यमुना किनारे की लाइन नहीं टूटेगी।विश्व गुरु बनने के लिए पहले विश्व जैसा शौचालय तो दें।
अशोक सोम
लेखक दैनिक भास्कर में वरिष्ठ संवाददाता है


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