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Thursday, June 11, 2026

नई पीढ़ी में मर्सिये का रुचि-बोध विकसित करने का प्रयास करते रहना चाहिए : प्रो. ज़माँ आज़ुर्दा

सीसीएस विश्वविद्यालय के उर्दू विभाग में "मर्सिये की तहत-उल-लफ़्ज़ ख़्वानी" विषय पर ऑनलाइन कार्यक्रम आयोजित

नित्य संदेश ब्यूरो

मेरठ। भाषाएँ धीरे-धीरे बदलती जा रही हैं। अब न वह हिंदी रही, न उर्दू और न ही अंग्रेज़ी। पता नहीं आजकल कौन-सी भाषा प्रचलन में है। अनेक शब्द ऐसे हैं जो हमारी ज़ुबान पर आते ही नहीं। तहत-उल-लफ़्ज़ ख़्वानी केवल मर्सिये तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें क़सीदा, ग़ज़ल और अन्य साहित्यिक विधाएँ भी शामिल हैं। ये विचार प्रसिद्ध आलोचक तथा कश्मीर विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष, उर्दू विभाग, प्रोफेसर ज़माँ आज़ुर्दा ने उर्दू विभाग एवं एयूएसए के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित "मर्सिये की तहत-उल-लफ़्ज़ ख़्वानी" विषयक ऑनलाइन कार्यक्रम की अध्यक्षीय टिप्पणी में व्यक्त किए। उन्होंने आगे कहा कि नई पीढ़ी में मर्सिये के प्रति रुचि उत्पन्न करने का प्रयास निरंतर किया जाना चाहिए। हमारे पाठ्यक्रम में मर्सिया, क़सीदा आदि शामिल होने चाहिए ताकि हमारी सांस्कृतिक परंपरा जीवित रह सके।


कार्यक्रम का आरंभ सईद अहमद द्वारा पवित्र क़ुरआन के पाठ से हुआ। कार्यक्रम का संरक्षण प्रसिद्ध साहित्यकार एवं आलोचक प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी ने किया तथा अध्यक्षता प्रोफेसर ज़माँ आज़ुर्दा ने की। मुख्य अतिथि के रूप में पंजाबी विश्वविद्यालय, पटियाला के पूर्व अध्यक्ष, उर्दू विभाग, प्रोफेसर नासिर नक़वी उपस्थित रहे। मर्सिया-पाठकों के रूप में सैयद सिराज मेहदी (नोएडा), अशज रज़ा ज़ैदी (नोएडा) तथा ज़िया आलम (नोएडा) ने भाग लिया। इस अवसर पर एयूएसए की अध्यक्ष प्रोफेसर रेशमा परवीन भी उपस्थित थीं। विषय-परिचय डॉ. इरशाद स्यालवी ने प्रस्तुत किया, संचालन आई.एन.पी.जी. महिला कॉलेज की उर्दू विभागाध्यक्ष डॉ. इफ़्फ़त ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन अरीबा सरफ़राज़ ने किया।


विषय का परिचय प्रस्तुत करते हुए डॉ. इरशाद स्यालवी ने कहा कि हम इस तथ्य से भली-भाँति परिचित हैं कि मर्सिया-ख़्वानी किसी दिवंगत व्यक्ति के गुणों, वीरता और उसके जीवन की घटनाओं का वर्णन कर शोक एवं दुःख व्यक्त करने की कला है। तहत-उल-लफ़्ज़ ख़्वानी में मर्सिये को बिना तरन्नुम के, विशेष भावात्मक शैली में पढ़ा जाता है। इसमें शब्दों के सही उच्चारण और शुद्धता पर विशेष ध्यान दिया जाता है। यद्यपि तहत-उल-लफ़्ज़ का जनक मीर मीर को माना जाता है, किंतु इस कला के विकास में मीर अनीस तथा उनके परिजनों के योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता।


कार्यक्रम का स्वागत भाषण देते हुए प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी ने कहा कि मैं आज के कार्यक्रम में उपस्थित सभी अतिथियों का स्वागत करता हूँ। इस कार्यक्रम के माध्यम से हम सीखेंगे कि मर्सिये को तहत-उल-लफ़्ज़ शैली में किस प्रकार पढ़ा जाता है। इस शैली में प्रत्येक बात स्पष्ट रूप से सामने आती है। तहत-उल-लफ़्ज़ का अर्थ है कि आपको कविता पढ़ने की सही समझ हो। हमारा उद्देश्य विद्यार्थियों को मर्सिये की इस पद्धति से परिचित कराना है। मैं सभी अतिथियों का आभार व्यक्त करता हूँ कि वे अपनी बहुमूल्य बातों से विद्यार्थियों के ज्ञान में वृद्धि करेंगे।


मुख्य अतिथि प्रोफेसर नासिर नक़वी ने कहा कि हमारे मर्सिया-पाठकों ने अपने विशिष्ट स्वर और अंदाज़ में मर्सिये प्रस्तुत कर इस विधा का पूरा सम्मान किया है। इस क्षेत्र में प्रोफेसर ज़माँ आज़ुर्दा जैसी महत्वपूर्ण हस्ती हमारा मार्गदर्शन कर रही है। आज के मर्सिया-लेखकों ने भी इस कला के साथ पूरा न्याय किया है। मर्सिये की जड़ें भारत से जुड़ी हुई हैं और नई पीढ़ी भी अब इस विधा में अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन कर रही है।


प्रोफेसर रेशमा परवीन ने कहा कि हमें तहत-उल-लफ़्ज़ ख़्वानी को आगे बढ़ाने के लिए स्वयं आगे आना चाहिए। यदि हम इस विधा में रुचि नहीं लेंगे तो विद्यार्थी इसे कैसे सीखेंगे? मर्सिया हमारी शास्त्रीय साहित्यिक विधा है। मीर अनीस की रचनाओं में भाषिक सौंदर्य, वाक्पटुता और अनेक ऐसी विशेषताएं हैं जिनसे हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है। आज मर्सिया-पाठकों ने जो मर्सिये प्रस्तुत किए, उन्होंने हमारे दिलों पर मानो जादू कर दिया।


इस अवसर पर सिराज मेहदी ने मीर अनीस का मर्सिया प्रस्तुत किया, अशज रज़ा ज़ैदी ने फ़ैज़ भरपूरी का मर्सिया सुनाया तथा डॉ. ज़िया आलम ने नसीम अमरोहवी का मर्सिया प्रस्तुत किया। तीनों मर्सिया-पाठकों ने अपने अत्यंत प्रभावशाली और विशिष्ट अंदाज़ में मर्सिये पढ़कर समाँ बाँध दिया। कार्यक्रम से डॉ. आसिफ अली, मोहम्मद शमशाद, सईद अहमद सहारनपुरी तथा अन्य छात्र-छात्राएँ भी जुड़े रहे। 

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