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| साक्षात्कारकर्ता-डाॅ. इंदु जैन व साक्षात्कारदाता-श्री सुबोध कुमार |
नित्य संदेश
प्रश्न 1: सबसे पहले हम आपके व्यक्तिगत और पारिवारिक जीवन के बारे में जानना चाहेंगे। आपके परिवार में कौन-कौन हैं? साथ ही अपने जीवनसाथी के विषय में भी कुछ बताइए।
बहुत बहुत धन्यवाद इंदु जी, आपने अपनी महत्वपूर्ण पत्रिका के लिए इस बार साक्षात्कार के लिए मुझे चुना ।
मेरा व्यक्तिगत जीवन अत्यंत साधारण रहा है। मूल रूप से मैं लखनऊ का रहने वाला हूँ और वर्तमान में महाराष्ट्र प्रदेश के नाशिक में रह रहा हूँ। 12 वी कक्षा में शिक्षण लेते समय ही नेवी में भर्ती हो गया था। परिवार में हम दो हमारे दो । बेटा बहू, बेटी दामाद , नाती पोतियों के साथ एक खुशहाल परिवार है। जीवन संगिनी एक पढ़ी लिखी घरेलू महिला हैं। उनका मानना था कि छोटी मोटी नौकरी करने से बेहतर है बच्चों को पूरा समय देकर उनका जीवन संवारा जाए। परिणाम स्वरूप बच्चे शिक्षित और संस्कारी होने के साथ साथ अच्छे से अपना जीवन यापन कर रहे हैं।
प्रश्न 2: आपके जीवन और करियर की यात्रा अब तक कैसी रही? किन-किन क्षेत्रों में आपने कार्य किया है और उन अनुभवों ने आपको किस प्रकार प्रभावित किया?
जीवन की यात्रा के बारे में मैं जैसा कि बता चुका हूँ कि 16 वर्ष की उम्र में ही नेवी में भर्ती हो गया था। वर्दी में अनुशासित नौकरी करने के कारण हर कार्य में अनुशासन के साथ साथ निष्ठा, ईमानदारी और समर्पण भाव भी जुड़ता गया। नेवी में रहते हुए भारतीय अंटार्कटिका अभियान दल के सदस्य के रूप में दक्षिण ध्रुव जाने का सुअवसर प्राप्त हुआ जो कि जीवन की बहुत बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है। नेवी से बाहर आने के बाद भारतीय जीवन बीमा निगम जैसी प्रतिष्ठित संस्था में कार्य करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। हिद्दी अधिकारी के रूप में कार्य करते हुए कई कीर्तिमान स्थापित किये तथा अनेको ट्राफियाँ प्रदान कर संस्थान और मुझे भी सम्मानित किया गया। एलआईसी की पत्रिका का सम्पादन करते समय हिन्दी भाषा तथा साहित्य की तरफ आकर्षण बढ़ा। पत्रिका के लिए कुछ कविताएं एवं आलेख लिखे, उसके बाद अन्य विभागों की पत्रिकाओं में भी आलेख छपना शुरू हुए।
प्रश्न 3: साहित्य, सामाजिक कार्य या अन्य रचनात्मक क्षेत्रों में आपकी रुचि कैसे विकसित हुई? क्या इसके पीछे कोई विशेष प्रेरणा रही?
जैसे जैसे कविताएं और आलेख छपते गए लेखन में रुचि बढ़ती गई। एलआईसी के प्रशिक्षण केंद्र में प्रेरक वक्ता के रूप में व्याख्यान देने का अवसर मिला तथा एक प्रेरक वक्ता के रूप में पहचान मिली। फिर एलआईसी के अतिरिक्त लगभग सभी सरकारी / अर्धसरकारी कार्यालयों में प्रेरक वक्तव्य देने के लिए आमंत्रण मिलते रहे। इसी श्रंखला में आकाशवाणी में भी कई प्रेरक विषयों पर मेरे व्याख्यान प्रसारित हुए और अच्छी पहचान मिली। विशेष प्रेरणा मुझे मेरे श्रोताओं से ही मिली। श्रोताओं ने ही मेरी हौसला अफजाई करते हुए प्रेरक पुस्तक लिखने के लिए प्रेरित किया। और जीवन जीने की कला पर आधारित मेरी पहली पुस्तक "जियो जी भर के" प्रकाशित हुई जिसे बहुत ही अच्छा प्रतिसाद मिला। इसी श्रंखला में सफलता पर आधारित पुस्तक "लगन से गगन तक" प्रकाशित हुई इस पुस्तक को महाराष्ट्र राज्य हिन्दी साहित्य अकादमी द्वारा पूरस्कृत किया गया।
प्रश्न 4: यदि आपने किसी संस्था, मंच या सामाजिक पहल की शुरुआत की है, तो उसके बारे में कुछ बताना चाहेंगे? उसके पीछे आपका उद्देश्य क्या था?
लेखन के साथ साथ सामाजिक कार्यों में भी मेरा रुझान शुरू से ही रहा है। कवि एक संवेदनशील व्यक्ति होता है। संवेदनशील व्यक्ति किसी की पीड़ा को देख उसे नजर अंदाज नहीं कर सकता वह उसके निदान के लिए हर संभव कोशिश करता है। सामाजिक एवं साहित्यिक गतिविधियों के चलते साहित्यिक संस्थाओं से जुड़ाव हुआ। एक संस्था अध्यक्ष के रूप में चलाई और राष्ट्रीय स्तर पर उसे पहचान दिलाई । उसके बाद २०२० में खुद की संस्था विद्योततमा फाउंडेशन की स्थापना की। संस्था की की प्रमुख शहरों में शाखाएं भी खोली गई,,, लखनऊ, कानपुर, नागपूर,इंदौर वाराणसी में इसकी शाखाएं हैं। संस्था का मुख्य उद्देश्य भारतीय साहित्य को बढ़ावा देना, सामाजिक कार्यों को प्रधानता देना तथा भारतीय पुरातन संस्कृति को बचाए रखना और युवा पीढ़ी को सही दिशा देना था। आज हमारी संस्था इन सभी पहलुओं पर अत्यंत सक्रियता से कार्य कर रही है।
प्रश्न 5: आपकी अब तक की उपलब्धियों और अनुभवों में कौन-सा पड़ाव आपके लिए सबसे अधिक यादगार रहा?
अगर अब तक की उपलब्धियों की बात करें तो जीवन उपलब्धियों से भरा पड़ा है। यादगार उपलबधिया भी कई हैं,,, आकाशवाणी से जब पहली बार पुस्तक दिवस पर मेरे विचार प्रसारित हुआ तो उसने मुझे एकदम से बहुत ही लोकप्रिय इंसान बना दिया, बोलने के अंदाज की काफी सराहना हुई फिर तो कई विषयों पर प्रसारण हुए। दक्षिण ध्रुव की यात्रा का प्रसारण बीसियों बार हो चुका है। आकाशवाणी से सबसे अधिक बार प्रसारण होने वाले साक्षात्कार का रिकार्ड बन चुका है। इसी तरह एलआईसी नासिक में हिन्दी अधिकारी का पद संभालने के समय जहां एक भी ट्रॉफी नहीं थी वहीं रिटायरमेंट तक १२ वर्षों के मेरे कार्यकाल के अंदर २५ से अधिक ट्रॉफिया, कार्य के प्रति मेरी लगन और समर्पण की गवाही दे रही है।
प्रश्न 6: जीवन में मिले सम्मान, सराहना या लोगों के प्रेम को आप किस रूप में देखते हैं? क्या कोई ऐसा क्षण है जो आज भी आपके दिल के करीब हो?
जीवन में सबसे बड़ा सम्मान लोगों का प्रेम होता है,,, रिटायरमेंट के १० साल बाद भी अगर विभाग में आपको आदर और सम्मान के साथ बुलाया जाता है, देखा जाता है तो यह बहुत बड़ा सम्मान है। साहित्य अकादमी द्वारा सम्मानित होने का क्षण भी खास था क्योंकि नेवी में इंजीनियर पद पर काम करने वाला व्यक्ति साहित्य में सम्मानित हो ऐसा बहुत ही कम देखने को मिलता है। ऐसा ही एक क्षण है २६ जनवरी १९८७ का जब आन्टाकर्टीका में भारतीय ध्वज फहराने का अवसर प्राप्त हुआ! एक साधारण परिवार के बालक का यह सफर साधारण सफर नहीं कहा जा सकता।
प्रश्न 7: अंत में, हमारे श्रोताओं और पाठकों के लिए आप क्या संदेश देना चाहेंगे? आज के समय में एक सामान्य व्यक्ति को बेहतर और संतुलित जीवन जीने के लिए किन बातों का ध्यान रखना चाहिए?
श्रोताओं से सिर्फ इतना ही कहना चाहूँगा कि सही दिशा में अपनी ऊर्जा का इस्तेमाल कर अपनी मंजिल की तरफ बढ़ते रहो। बीच राह में अपने लक्ष्य को बदलो मत, छोड़ो मत,, हारने के पहले हार मत मानो, सफलता मिलना निश्चित है। जीवन में सदा सकारात्मक रहो। जीवन क्षणभंगुर है, जीवन को जीना सीखो,, जिंदगी आपकी है, जीना भी आपको ही है तो फिर इसे जी भर के जियो, क्योंकि जिंदगी मिलेगी ना दोबारा।
प्रश्न 8: आपकी आने वाली पुस्तक कौनसी है?
मेरी आने वाली पुस्तक उपन्यास है पर वह भी प्रेरक उपन्यास है। पुस्तक का नाम है "बँटवारा" - यह पुस्तक अनेकों अनछुए पहलुओं को आपके सामने लेकर आएगी और सफलता अर्जित करने के नए द्वार खोलेगी ऐसा मुझे विश्वास है।
पुनः बहुत-बहुत धन्यवाद आपको इंदु जी!

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