- इन विरासतों को पुरातत्व विभाग की नजर-ए-इनायत का इंतजार
सलीम सिद्दीकी
नित्य संदेश, मेरठ। वैसे तो दिल्ली की कई इमारतें मुगल शासन की न जाने कितनी ही यादें समेटे हैं, लेकिन इन यादों से अपना शहर भी वाबस्ता है। यहां भी मुगलकालीन यादों की कुछ निशानियां अभी भी बाकी हैं। हालांकि यह निशानियां अब अंतिम सांसे गिन रहीं हैं। इन इमारतों के संरक्षण की ओर यदि पुरातत्व विभाग अपनी नजर ए इनायत कर ले तो शहर की बची हुई मुगल कालीन इमारतों का वजूद कायम रह सकता है। आज हम अपने पाठकों को शहर के उस बाजार (खैरनगर बाजार) में ले चलेंगे जहां मुगल शासन की यादें अभी भी जिंदा है। हालांकि मुगलकालीन यह बाजार आज व्यावसायिक मंडी में तब्दील हो चुका है।
400 सालों से ज़्यादा पुराना इतिहास .......आज का खैरनगर बाजार भले ही शहर की प्रमुख व्यावसायिक मंडी बन चुका हो लेकिन 400 साल पहले यह किला खैरनगर हुआ करता था। इस किले को शाहजहां और औरंगजेब के वजीर रहे मुहम्मद खां उर्फ़ नवाब खैरंदेश खां ने बसाया था। नवाब खैरंदेश खां के वंशजों की 13वीं पीढ़ी के नवाब अफजाल अहमद खां के परिजनों के अनुसार इस किले में प्रवेश के दो मुख्य द्वार थे। इनमें एक दरवाजा अहमद रोड स्थित जिला अस्पताल के सामने था जबकि दूसरा दरवाजा छतरी वाले पीर से बुढ़ाना गेट की ओर जाने वाले मार्ग पर था। अहमद रोड वाले दरवाजे का तो नामोनिशान मिट चुका है लेकिन छतरी वाले पीर से बुढ़ाना गेट जाने वाले मार्ग पर दूसरे दरवाजे का वजूद थोड़ा बहुत बाकी है। हालांकि वह भी अब हिचकोले ले रहा है। लगभग 100 फीट ऊंचे इस दरवाजे पर यदि अब भी पुरातत्व विभाग की नजर ए इनायत हो जाए तो शहर वासियों को एक ऐतिहासिक धरोहर के रूप में शानदार दरवाजा नसीब हो सकता है। दरअसल खैरंदेश खां ने यह खैरनगर किला अपने रहने के लिए बनवाया था। इस विशाल किले में शीश महल से लेकर शाही मस्जिद तक की तामीर कराई गई थी। शीश महल का वजूद तो सिर्फ नाम का रह गया है लेकिन शाही मस्जिद आज भी मौजूद है जो अब हौज़ वाली मस्जिद के नाम से जानी जाती है।
➡️ खैरनगर 400 साल बाद ........
खैर नगर किला आज शहर की प्रमुख व्यावसायिक मंडी के रूप में विकसित हो चुका है। पान और पतंग से लेकर यह दवाओं का प्रमुख बाजार है। हर साल बसंत पंचमी पर यहां पतंग का बड़ा बाजार सजता है। मेरठ के आसपास के जनपदों तक से यहां लोग पतंगों की खरीदारी करने पहुंचते हैं। इसके अलावा यह दवाओं की प्रमुख मंडी है।
मेरठ में ही सुपुर्द ए खाक हैं खैरंदेश खां ........ नवाब खैरंदेश खां का निधन 120 साल की उम्र में 1710 में हुआ था। निधन के बाद उनका दफ़ीना (अंतिम संस्कार) मेरठ में ही किया गया। मेरठ में आज भी उनके मकबरे की कुछ निशानी बाकी हैं। इस निशानी पर यदि अभी भी ध्यान न दिया गया तो यह भी इतिहास के पन्नों में सिमट कर रह जाएगी। नवाब खैरंदेश खां का मकबरा पटेल नगर स्थित हिंदी भवन के पास है जहां इस मकबरे की टूटी-फूटी गुंबद ही बची है।



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