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| ऐसे ही बीत गया 'मई दिवस', मजदूरों का कोई पुरसाने हाल नहीं, न जाने कितने ही मई दिवस बीते, लेकिन नहीं बदल पाई श्रमिकों की किस्मत |
सलीम सिद्दीकी
नित्य संदेश, मेरठ। 'हमारे जिस्म की रूहू हो तुम, बेख्याली में भी ख्याल हो तुम, नींद में सपना हो तुम दिल की हर धड़कन हो तुम, कभी हंसाते हो तुम कभी रुलाते हो तुम, लेकिन हर पल बहुत याद आते हो तुम'। जिंदगी की जद्दोजहद के बीच यह पंक्तियां एक परिवार द्वारा अपने उस मुखिया को उसकी हौंसला अफजाई के लिए समर्पित हैं जो अपने परिवार के भरण पोषण के लिए जंग का मैदान बन चुके इजरायल तक जाने के लिए तैयार बैठे थे। मजबूरी की यह सिर्फ एक बानगी भर है।
कहा जाता है कि मजदूर को उसकी मजदूरी उसका पसीना सूखने से पहले दे देनी चाहिए लेकिन आज सबसे ज्यादा मजबूर मजदूर ही है। न उसकी मजदूरी की किसी को परवाह है और न ही उसकी इज्जत की। तभी तो शुक्रवार को मजदूर का दिन 'मई दिवस' भी रुखा सुखा ही बीत गया। मई दिवस पर शासन स्तर से मजदूरों के लिए योजनाएं तो तमाम बनी होंगी, लेकिन इन योजनाओं को धरातल पर उतारना खुद किसी चुनौती से कम न होगा। कहने को तो शुक्रवार को अंतर्राष्ट्रीय मजदूर दिवस था। दुनिया भर में मई दिवस पर भरी दुपहरी में काम करने वालों के लिए एसी रूम में बैठकर स्कीमें बनाई गईं। कई जगह मजदूरों को वीआईपी ट्रीटमेंट भी मिला होगा, लेकिन सवाल यह है कि बाकी के 364 दिन क्या इन बनने वाली स्कीमों का इंप्लीमेंट (कार्यान्वयन) कराया जाएगा। पहले इजरायल और फलस्तीन तथा अब इजरायल-अमेरिका एवं ईरान के बीच के हालातों से दुनिया वाकिफ है।
इन सब के बावजूद भारतीय मजदूर अपनी जान की परवाह किए बिना अपने परिवार की परवरिश के उद्देश्य से इजरायल तक जाने को तैयार बैठा था, जबकि वह जानता था कि वहां जाना मौत को दावत देने से कम नहीं था। बावजूद इसके बड़ी संख्या में भारतीय श्रमिकों ने इजरायल जाने के लिए अपने-अपने पंजीकरण तक करवाए। यदि यह कह दिया जाए की एक दिन (मई दिवस) के वीआईपी के लिए बाकी के 364 दिन तो अंधेरा ही है, तो कुछ गलत न होगा।
आंकड़ों के अनुसार भारत में मजदूर दिवस पहली बार 1 मई 1923 को मनाया गया। 100 साल से अधिक हो गए लेकिन आप यकीन मानिए कि मजदूरों की स्थिति आज भी जस की तस है। जो योजनाएं पिछले 100 सालों में बनाई गई, उनमें से अधिकतर का क्या हुआ, शायद योजनाएं बनाने वाले भी इससे अंजान होंगे।

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