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Wednesday, April 22, 2026

“सुकून की तलाश”, लेखक साजिद अली 'सतरंगी' की कहानी


नित्य संदेश 

शहर मेरठ की हलचल, शोर, और रौनक के बीच एक शख़्स था। "साहिल" पेशे से  इंटिरियर डिजाइनर,, मगर दिल से शायर। लोगों के घरों को खूबसूरत बनाने की जितनी लग्न थी उससे भी कहीं ज़्यादा, रूमानी अंदाज में शेर लिखने का बेहतरीन फन अल्लाह ने उसे अता किया।

उम्र के पैंतीस बरस उसने यूँ ही तन्हाई की चादर ओढ़े गुज़ार दिए। उसकी ज़िंदगी में काम की कोई कमी न थी, मगर दिल के किसी कोने में एक अजीब सी वीरानी बसी रहती थी।

"साहिल" का दिन नक्शों, पुलों, इमारतों और सीमेंट के दरमियाॅं गुजरता,, और रातें शेर-ओ-शायरी के नाम होतीं।

"वह अक्सर कहता था,,,,

"मैंने इमारतें तो बहुत बड़ी-बड़ी खड़ी की हैं,

मगर दिल में कोई घर आज तक ना बना सका..."

उसके दोस्त अक्सर उसे समझाते,,

"साहिल,, अब तो शादी कर लो, उम्र भी हो रही है।"

वह मुस्कुरा देता, मगर दिल के अंदर एक खालीपन की आवाज़ गूंजती रहती थी।

एक दिन की बात है "साहिल" के एक करीबी दोस्त को यह मालूम हुआ कि "साहिल" की शादी नहीं हुई,, जब उन्हें इस बात की ख़बर मिली तो उन्होंने "साहिल" से पूछा,, बात बिल्कुल सच थी। उन्होंने उनके वालिद साहब से राब्ता किया जो बेहद शानदार किरदार के धनी इंसान थे। ओर चंद रोज़ के बाद ही "साहिल" का रिश्ता लेकर उनके घर पहुंच गए।

उसी दिन, "साहिल" की अम्मी ने बड़े सलीके से उसे एक तस्वीर दिखाई। तस्वीर में एक लड़की थी "माहिरा"।

गोरी रंगत, बड़ी-बड़ी आंखें, चेहरे पर सादगी और मुस्कुराहट में अजीब सी कशिश।

"साहिल" ने तस्वीर को कुछ देर तक देखा, फिर नज़रें झुका लीं।

"क्या सोच रहे हो?" अम्मी ने पूछा।

"कुछ नहीं अम्मी... बस यूँ ही," उसने हल्की सी मुस्कान के साथ जवाब दिया।

मगर उस रात, "साहिल" ने पहली बार किसी अनजान चेहरे पर शेर कहा:

"किसी तस्वीर में बसने का सीखा है हुनर मैंने

यूं दिल ने इक नज़र में कर लिया इकरार तुम से,

कुछ ही हफ्तों में बात आगे बढ़ी, और फिर वो दिन भी आ गया जब  "साहिल" और "माहिरा" के  निकाह का दिन भी मुकर्रर कर दिया गया।

निकाह का माहौल बेहद खुशनुमा था। घर रोशनी से जगमगा रहा था, हर तरफ खुशियों की बहार थी।

जब "साहिल" ने "क़ुबूल है" कहा, तो उसकी आवाज़ में एक अजीब सा सुकून था-- मानो जैसे बरसों की तलाश को मंज़िल मिल गई हो।

"माहिरा" ने भी जब "क़ुबूल है" कहा, तो उसकी आवाज़ में लिहाज और मुहब्बत की मिठास थी।

शादी के बाद "साहिल" की ज़िंदगी जैसे पूरी तरह बदल गई।

जहाँ पहले उसके कमरे में किताबें और बिल्डिंगों के नक्शे बिखरे रहते थे, अब वहाँ "माहिरा" की मौजूदगी से एक नया रंग बिखर गया। कमरे की हर दीवार ने इस खूबसूरत मंज़र की तस्वीर को अपनी ऑंखों में पोशीदा कर लिया।

"माहिरा" बहुत समझदार और सलीकेदार लड़की थी। उसने "साहिल" की जिंदगी में न सिर्फ मुहब्बत भरी, बल्कि एक अजीब सा सुकून भी मिला। जिसकी तलाश उसे मुद्दतो से थी।

एक शाम, "साहिल" ऑफिस से लौटा तो देखा कि "माहिरा" बालकनी में खड़ी चाय पी रही है। "माहिरा" को चाय बेहद पसंद थी। हल्की-हल्की हवा उसकी जुल्फों को छू कर निकल रही थी। उसकी  हवा में लहलहाती हुई जुल्फें उसके रूख़ पर मखमली अंदाज में बिखर रही थी। मानों कोई आसमान से परी उतर आई हो।

"साहिल" कुछ पल उसे देखता रहा,,,,

"फिर धीरे से बोला:

"माहिरा..."

"जी?" उसने मुस्कुराकर जवाब दिया।

"तुम आई हो तो लगता है जैसे जिंदगी अब सच में शुरू हुई है।"

"माहिरा" ने हल्की सी झिझक के साथ कहा,,,

"और मुझे लगता है कि मैं हमेशा से यहीं थी... बस आप तक पहुँचने में थोड़ी देर हो गई।"

दिन बीतते गए, और दोनों की मुहब्बत और गहरी होती गई।

"साहिल" अब सिर्फ इंजीनियर नहीं रहा, बल्कि एक अच्छा शायर भी बन गया। उसका हर शेर "माहिरा" के नाम हो गया।

"तेरे होने से हर सुब्हा मुकम्मल हो गई मेरी

वगरना शाम तन्हा कट रही थी रोज़ ही अक्सर,,,

---------

शेर- तुम ही सुब्हा मेरी तुम मेरी शाम हो

चैन तुम हो मेरा तुम ही आराम हो।,,,,,,

"माहिरा" उसकी शायरी सुनकर मुस्कुरा देती, और कहती,

"आपकी शायरी में अब दर्द कम और मुहब्बत ज्यादा है।"

"साहिल" हंसकर जवाब देता,

"क्योंकि अब जिंदगी में (मुहब्बत) तुम हो।" कुछ इसी तरह खट्टी मीठी गुफ्तगू का दौर चलता रहा।

दोनों ने मिलकर अपने परिवार की जिम्मेदारियों को बखूबी निभाना शुरू कर दिया।

"साहिल" अपने काम में और भी मेहनत करने लगा, और "माहिरा" घर को इस तरह संभालती कि हर चीज़ में सुकून झलकता।

दोनों के घरवाले भी इस जोड़ी से बेहद खुश थे।

"साहिल" की अम्मी अक्सर कहतीं,,

"माहिरा" ने हमारे घर को जन्नत बना दिया।"

और "माहिरा" की अम्मी कहतीं,

"साहिल" जैसा समझदार और मुहब्बत करने वाला शौहर हर लड़की को मिले।"

"साहिल" ने अपने कुछ पुराने प्रोजेक्ट में काम करना शुरू कर दिया। काम का दबाव इतना बढ़ गया कि वह परेशान रहने लगा।

वह देर रात तक काम करता,, और अक्सर खामोश रहता।

"माहिरा" ने उसकी हालत महसूस की, मगर उसने कभी शिकायत नहीं की।

एक रात, जब "साहिल" बेहद थका हुआ घर आया, तो उसने देखा कि "माहिरा" ने उसके लिए उसकी पसंद का लजीज खाना बनाया है, और एक छोटा सा नोट टेबल पर रखा।

"आप थक गए होंगे...

"मगर याद रखिए, आप अकेले नहीं हैं।",,,

"साहिल" की ऑंखें नम हो गईं।

उसने "माहिरा" को पास बुलाया उसकी पेशानी को चुमा और कहा,,,

"मैं शायद तुम्हें वक़्त नहीं दे पा रहा..."

"माहिरा" ने "साहिल" का हाथ थामकर कहा,,

"मुझे वक़्त नहीं,, आपका साथ चाहिए... और वो हमेशा मेरे पास है।"

वक़्त के साथ-साथ सभी परेशानी भी ख़त्म हो गई, और उनकी जिंदगी में फिर से खुशियों के रंग भर गए।

एक शाम की बात है,,दोनों छत पर बैठे थे। आसमान पर सितारे चमक रहे थे।

"साहिल" ने "माहिरा" से कहा:-

"मैंने बहुत साल तन्हाई में गुज़ारे हैं,,

मगर अब समझ आया कि सुकून किसी जगह में नहीं,, बल्कि 

किसी इंसान में होता है..."

"माहिरा" मुस्कुराई और बोली,,

"और वो इंसान आपको मिल गया" जनाब,,

"साहिल" ने उसकी ऑंखों में देखते हुए कहा,,,

"हाँ... और वो सुकून तुम हो।"

रात अपने शबनमी आँचल में धीरे- धीरे चाँद को समेट रही थी। हल्की-हल्की ठंडी हवा छत पर रखे दीयों की लौ को सहला रही थी।

"साहिल" और "माहिरा" साथ बैठे बिल्कुल खामोश, मगर उस खामोशी में भी एक मुकम्मल गुफ़्तगू चल रही थी।

"साहिल" ने धीरे से "माहिरा" का हाथ थामा। उसकी उँगलियों की हरारत में उसे वही सुकून मिला, जिसकी तलाश में उसने उम्र का एक लंबा सफ़र तन्हाई में काटा था।

"माहिरा…" उसने नर्म लहज़े में पुकारा।

"जी…" उसने शर्माती हुई नज़रें झुकाकर जवाब दिया।,,,

"साहिल" मुस्कुराया, फिर आसमान की तरफ देखकर बोला,

"ये जो चाँद है ना… ये भी आज कुछ फीका-फीका सा लग रहा है।"

माहिरा" ने हैरानी से पूछा "क्यों?

"साहिल" ने उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा,,

"क्योंकि आज इसकी रौशनी भी तुम्हारे रुखसार के सामने फीकी पड़ गई है…"

"माहिरा" की पलकों पर हल्की सी झिझक ठहर गई,, होंठों पर मुस्कान सिमट आई। उसने धीरे से कहा,,

"आप भी ना… हर बात को शायरी बना देते हैं।"

"साहिल" ने उसका हाथ अपने दिल पर रख लिया,,

"क्योंकि अब मेरा हर एहसास, हर धड़कन… तुम्हारे नाम हो चुकी है।"

मानों कुछ लम्हों के लिए वक़्त बिल्कुल ठहर सा गया। हवा भी उनकी मुहब्बत की गवाह बनकर कोई संगीत बजा रही थी।

"साहिल" ने धीमे से कहा:-

"मैंने अपनी तन्हाई के हर लम्हें को तुमसे पहले जिया है,,

मगर अब जो भी पल है… वो सिर्फ तुम्हारे साथ जीना चाहता हूँ।"

"साहिल" का यह रुमानियत भरा अंदाज देख कर,,

"माहिरा" की आँखें नम हो गईं,, मगर ये आँसू ग़म के नहीं,, मुकम्मल मुहब्बत के थे। जिस मुहब्बत के लिए उसने भी एक अरसे तलक इंतज़ार किया।

"माहिरा" ने अपना सिर उसके कंधे पर रख दिया और धीरे से फुसफुसाई:-

"आपके साथ… हर लम्हा जन्नत जैसा लगता है।"

"साहिल" ने उसे अपनी बाहों में भर लिया,, जैसे अब उसे दुनिया की हर तकलीफ़ से बचा लेना चाहता हो।

और फिर उसने आख़िरी बार, बेहद मुहब्बत से कहा:-

"तुम सिर्फ मेरी बीवी नहीं हो "माहिरा",,

तुम मेरा वो सुकून हो… जो मुझे मेरी सारी उम्र ढूँढने के बाद मिला है।"

"माहिरा" ने हल्का सा मुस्कुराकर आँखें बंद कर लीं:-

जैसे उसने अपनी पूरी दुनिया उसी एक लम्हें में पा ली हो। नीचे "माहिरा" ऊपर आसमान पर चाँद मुस्कुरा रहा था,,

सितारे झिलमिला रहे थे,

और ज़मीन पर,,

दो दिल एक ही धड़कन में धड़क रहे थे।उनकी मुहब्बत किसी कहानी का अंत नहीं… बल्कि हमेशा के लिए एक खूबसूरत शुरुआत बन गई।

"साहिल" और "माहिरा" का यह रिश्ता कोई फिल्मी अफसाना नहीं था, बल्कि एक सच्ची मुहब्बत की मिसाल था।

जहाँ इश्क सिर्फ लफ़्ज़ों में नहीं, बल्कि एहसासों में जिया जाता है।

जहाँ दो लोग एक-दूसरे की कमियों को अपनाकर, एक मुकम्मल जहां बना लेते हैं।

"साहिल" ने अपनी जिंदगी में बहुत कुछ हासिल किया था, मगर सबसे बड़ी कामयाबी उसे "माहिरा" के रूप में मिली।

और वह अक्सर कहा करता,,

"मैंने शहर बनाए, कोठियां बनाई, रास्ते बनाए,

मगर तुमने मेरी जिंदगी को घर बना दिया..."माहिरा"




लेखक - साजिद अली 'सतरंगी'

फ़ोन - 9457530339

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