नित्य संदेश
आज के दौर में इंसान की ज़िन्दगी जितनी तेज़, चमकदार और आसान दिखाई देती है। उतनी ही उलझी हुई और पेचीदा भी होती जा रही है। रिश्ते, जो कभी भरोसे, मुहब्बत और वफ़ादारी की बुनियाद पर कायम होते थे, अब कई जगहों पर कमज़ोर पड़ते नज़र आते हैं। खास तौर पर शादी जैसे पाक और मजबूत रिश्ते में “एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स” (नाजायज़ ताल्लुकात) का बढ़ता रुझान समाज के लिए एक बेहद गम्भीर मुद्दा बन चुका है।
ये सिर्फ़ एक निजी मामला नहीं रहा, बल्कि एक सामाजिक बीमारी की शक्ल अख़्तियार करता जा रहा है।
सवाल ये है कि आख़िर ऐसा क्यों हो रहा है? और इससे समाज को क्या नुकसान पहुॅंच रहा है?
शादी एक ऐसा पाक रिश्ता है जिसमें पहले मुहब्बत, एहतराम और कुर्बानी का नाम हुआ करता था। लेकिन अब कई जगह ये रिश्ता सिर्फ़ एक “ज़िम्मेदारी” या “सोशल अरेंजमेंट” बनकर रह गया है।
जब रिश्तों में जज़्बात की जगह सिर्फ़ फ़र्ज़ रह जाए, तो दिल खाली हो जाता है। यही खालीपन कहीं न कहीं इंसान को घर से बाहर सुकून तलाशने पर मजबूर करता है।
आज के दौर में जैसे-जैसे इंसान डिजिटल हो रहा है। मोबाइल, सोशल मीडिया और इंटरनेट ने लोगों को एक-दूसरे के बेहद करीब ला दिया है।
जहाँ ये सहूलियतें हैं, वहीं ये “फितना” भी बन गई हैं।
अजनबी लोग दोस्त बनते हैं, बातें शुरू होती हैं, और धीरे-धीरे जज़्बात जुड़ जाते हैं। ओर उन जज़्बात में अपनेपन की बू आने लगती है।
मैंने अक्सर देखा है “ऑनलाइन अफेयर्स” एक आम बात हो चुकी है, कुछ अफेयर्स बाद में हकीकत में भी तब्दील हो जाते हैं।
आज के रिश्तों में सबसे बड़ी कड़वी सच्चाई यह है।
"हद से ज़्यादा उम्मीदें"
बीवी को चाहिए कि शौहर हर वक़्त उसका ख्याल रखे।
और शौहर चाहता है कि बीवी हर बात में उसे समझे।
मगर जब ये उम्मीदें पूरी नहीं होतीं, तो शिकायतें पैदा होती हैं।
और जब ये शिकायतें बढ़ती हैं, तो दिलों के दरमियाॅं दूरी बढ़ने लगती हैं।
मैंने समाज में अक्सर यह देखा है कई शादियाँ कभी नहीं टूटती, बल्कि अंदर से खोखली हो जाती हैं क्योंकि उनमें “बातचीत” ख़त्म हो जाती है। ओर कुछ लोग एक ही घर में रहते हुए भी, दिलों के दरमियाॅं फासला मीलों का बना लेते है।
जब इंसान अपने जज़्बात अपने पार्टनर से शेयर नहीं कर पाता, तो वो किसी और को तलाश करता है,, एक ऐसे साथी की तलाश जो उसे सुने, समझे और अहमियत दे।
मैंने अक्सर यह महसूस किया है रिश्तों में सिर्फ़ जिस्मानी (physical) नहीं, बल्कि जज़्बाती (emotional) जुड़ाव भी बहुत जरूरी होता है।
अगर किसी एक चीज़ की भी कमी हो, तो रिश्ता अधूरा लगने लगता है।
कई लोग दीगर मुल्कों में सिर्फ़ इसलिए जाते हैं क्योंकि उन्हें घर में वो सुकून नहीं मिलता जिसकी उन्हें ज़रूरत होती है। हां एक बात और कहता चलूं आजकल “फ्रीडम” के नाम पर कई लोग अपनी हदें भूलते जा रहे हैं।
रिश्तों में ज़िम्मेदारी और वफ़ादारी को बोझ समझा जाने लगा है।
ये सोच कि “मेरी ज़िन्दगी है, मैं जो चाहूँ वो करूँ” यह सोच बेहद ख़तरनाक है। दरअसल यह एक वक़्त रिश्तों की बुनियाद को हिला देती है। आजकल की फिल्मों और वेब सीरीज़ का असर
मीडिया का असर भी कम नहीं है।
फिल्में और वेब सीरीज़ कई बार एक्स्ट्रा मैरिटल रिलेशन को “रोमांटिक” या “नॉर्मल” दिखाती हैं।
जब बार-बार ऐसा कंटेंट देखा जाता है, तो लोगों के ज़हन में ये चीज़ आम लगने लगती है। ओर लोग इसकी तरफ़ मुतवज्जह होने लगते हैं ओर बाद में नतीजे-सिर्फ़ दो लोगों तक महदूद नहीं रहते।"एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स"(नाजायज़ ताल्लुकात) का असर सिर्फ़ पति-पत्नी तक नहीं रहता,बल्कि पूरे परिवार पर पड़ता है। बच्चों की परवरिश पर असर पड़ता है घर का माहौल खराब हो जाता है।
भरोसा हमेशा के लिए टूट जाता है।कई बार रिश्ते तलाक तक पहुँच जाते हैं ऐसे मामलों में सबसे बड़ा नुकसान ये होता है कि इंसान “यकीन” खो देता है,,,
और जब यकीन टूटता है, तो हर रिश्ता कमजोर पड़ जाता है।
"क्या ये सिर्फ़ गुनाह है या एक अलार्म"?
हमें ये समझना होगा कि हर एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर(नाजायज़ ताल्लुकात) सिर्फ़ “गुनाह” नहीं,
बल्कि कई बार ये एक “अलार्म” होता है,,,,,
हर रिश्ते में कहीं न कहीं बड़ी कमी है।
अगर हम सिर्फ़ सज़ा देने की सोचेंगे और वजह को नहीं समझेंगे,,
तो ये सिलसिला कभी ख़त्म नहीं होगा।
आख़िर हल क्या है?
मैं तो सिर्फ़ यह कहता हूॅं समाज को इस मसले पर इल्ज़ाम लगाने की बजाय सुधार की तरफ़ बढ़ना होगा।
1. रिश्तों में बातचीत बढ़ाएं
खामोशी को खत्म करें, दिल की बात कहें और सुनें।
2. छोटी-छोटी खुशियों को अहमियत दें
रिश्ते बड़े कामों से नहीं, छोटी बातों से मजबूत होते हैं।
3. वफ़ादारी को समझें
वफ़ा सिर्फ़ जिस्म से नहीं, दिल से भी होती है।
4. सोशल मीडिया का सही इस्तेमाल करें
हर चीज़ की एक हद होती है, उसे पार करना नुकसानदायक है।
5. शादी से पहले और बाद में काउंसलिंग को बढ़ावा दें
ताकि लोग रिश्तों को बेहतर तरीके से समझ सकें।
समाज के लिए पैग़ाम - रिश्ते “खेल” नहीं होते कि जब चाहा बदल लिए जाए।
ये वो अमानत हैं जो भरोसे से बनते हैं और एक छोटी सी गलती से टूट जाते हैं।
हमें ये समझना होगा कि मुहब्बत सिर्फ़ पाने का नाम नहीं, बल्कि निभाने का नाम है।
अगर हर इंसान अपने रिश्ते को ईमानदारी से निभाएं,
तो एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स(नाजायज़ ताल्लुकात) जैसी बुराईयाँ समाज से अपने आप ख़त्म हो जाएंगी।
"बस आख़िरी में यही कहूंगा:-,,
आज समाज को आईना दिखाने की ज़रूरत है ,,,,,,
और वो आईना ये कह रहा है कि
“हम बाहर नहीं, अंदर से टूट रहे हैं।”
जब तक हम अपने रिश्तों को वक़्त, मुहब्बत और तवज्जो नहीं देंगे,
तब तक ये दरारें बढ़ती रहेंगी।
इसलिए वक़्त रहते संभल जाएं,
क्योंकि हर रिश्ता दोबारा नहीं बनता।
“वफ़ा का रास्ता मुश्किल ज़रूर है, मगर यही वो रास्ता है जो इंसान को सुकून देता है।”
शे'र
बिगड़ जाते हैं रिश्ते भी पुराने इस लिए साजिद
बना तो लेते हैं लेकिन निभाना किसको आता है।
लेखक - साजिद अली सतरंगी
फ़ोन - 9457530339


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