नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। कथा व्यास प्रो. सुधाकराचार्य त्रिपाठी ने मयूर विहार में अपने आवास पर सामवेद की पञ्चम कथा में सातवें और अन्तिम दिन की अद्भुत कथा की। त्रिपाठी जी ने आज बताया कि अरण्यपर्व के अनुसार, ईश्वर क्या है? ब्रह्म क्या है? आत्मा का उससे क्या सम्बन्ध है? जीव उसमें जीवन कैसे बिताता है?
उन्होंने सहस्र पद को स्पष्ट किया। सहस्र का लौकिक अर्थ है हजार। वास्तविक अर्थ है हास से युक्त। प्रसन्नता से युक्त। पुर गमने जो हमेशा आगे चलता है। पुरुष प्राइम नम्बर है जहांँ तक गिन सकते हैं, पुरुष उससे आगे चलता है। जो हर चीज़ को सह जाए, वही इन्द्र है, वही अग्नि है , वही वृत्र बना, उसी ने संसार बनाया। वह सभी अशनानशन को जानता है। ब्रह्म के घूर्णन और अतन का स्वरूप है आत्मा जो दशांगुल पर जाकर बैठ जाता है। सृष्टि में प्राणियों और सभी की नाल से जुड़ाव को समझाया। पुरुष के तीन चौथाई भाग से ब्रह्माण्ड बना, जो इन्द्रियातीत है। एक चौथाई भाग के फैलने से वह बना जो हमें दिखाई देता है। आत्मा की रोचना भीतर चलती है। उन्होंने 30 धाम को भी स्पष्ट किया।
भाष्यकारों ने जिन्हें इन्द्र के सात हरे घोड़े कहा, त्रिपाठी जी ने उसे शब्द, स्पर्श, रूप, रस,गन्ध के सात प्रकारों का इन्द्र (आत्मा) द्वारा उसका सेवन/ गति बताया। उन्होंने बताया कि हमें दिखाई देने वाला सविता है। सूर्य आत्मा है। उसका अभिषव ही उसके केश हैं। महानाम्नी पर्व में सम्पूर्ण सामवेद के सारे महत्त्व को समेट दिया। यह सामवेद का सार है। इसमें शचीनां पद के रहस्य को बताया।
आत्मा के स्वरूप को समझाते हुए त्रिपाठी जी ने कहा कि षड् उर्मियाँ आत्मा के हथियार, ईश्वर के यन्त्र हैं जिनसे जीवन चलता है। विराट पुरुष,आत्मा सुशेव सुन्दर सेवा करने वाला है। उसी के बल पर ही अग्नि, इन्द्र, पूषन् आदि सेवा करने वाले हैं। इस पर्व का भी सार है कि न दूसरों को दबाओ,न दूसरों को अपनी आत्मा को दबाने दो। यही है षड् ऊर्मियों को बलवान बनाने का मार्ग न दबो न दबाओ।

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