नित्य संदेश
पश्चिम बंगाल की पावन धरा, जो कभी भारतीय पुनर्जागरण की जननी और कला, साहित्य एवं बौद्धिक चेतना का केंद्र रही है, आज एक जटिल प्रशासनिक और संवैधानिक संक्रमण काल से गुजर रही है।
किसी भी परिपक्व लोकतंत्र में सत्ता का हस्तांतरण केवल एक वैधानिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि जनमत के प्रति सम्मान और नैतिक शुचिता का परिचायक होता है। किंतु वर्तमान परिदृश्य में ममता बेनर्जी के सत्ता के प्रति मोह और पद छोड़ने में दिखाई जा रही हठधर्मिता यह सोचने पर विवश करती है कि क्या व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाएं अब संवैधानिक मर्यादाओं से ऊपर हो गई हैं?
जब सत्ता के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति जनमत के स्पष्ट संदेश को स्वीकार करने के बजाय राजभवन जाने से कतराने लगें, तो यह केवल राजनीतिक गतिरोध नहीं, बल्कि लोकतंत्र की मूल आत्मा पर कड़ा प्रहार है।
यदि चुनावी परिणामों के बाद का दृश्य इतना चुनौतीपूर्ण है, तो कल्पना की जा सकती है कि चुनाव पूर्व की शासन व्यवस्था में 'राजनैतिक रौबदारी' और वर्चस्व का स्तर क्या रहा होगा? चुनावी हिंसा, बूथों पर कब्जे की खबरें और विरोधी स्वर को कुचलने की प्रवृत्ति इसी अनियंत्रित सत्ताबोध का परिणाम प्रतीत होती हैं।
इतिहास की दृष्टि से देखें तो बंगाल की प्रशासनिक सुव्यवस्था और उसकी भव्यता की तुलना प्राचीन गौरवशाली सभ्यताओं से की जाती थी। यह वह भूमि है जिसने रवींद्रनाथ टैगोर और सुभाष चंद्र बोस जैसे महापुरुषों को जन्म दिया, जिनके विचार 'मस्तक ऊंचा' रखने की प्रेरणा देते थे। आज उसी बंगाल को नारों और प्रतीकों की राजनीति से आगे निकलकर यथार्थ के धरातल पर आने की आवश्यकता है।
बंगाल की पहचान को केवल लोक-संस्कृति के छोटे प्रतीकों तक सीमित रखना इसकी मेधा के साथ न्याय नहीं होगा। इसे एक अंतरराष्ट्रीय औद्योगिक केंद्र के रूप में पुनर्जीवित करना समय की मांग है। इसके लिए सर्वप्रथम राजनीति में 'शत्रुता' के भाव को त्यागकर 'सहयोग' की भावना लानी होगी।
शांति और सद्भाव की स्थापना तभी संभव है जब कानून का शासन केवल कागजों पर न होकर धरातल पर सक्रिय दिखे और हिंसा को राजनीतिक संरक्षण मिलना पूर्णतः बंद हो जाए। बंगाल को आज 'हठ' की नहीं, बल्कि विकासोन्मुख 'हल' की प्रतीक्षा है।
ममता बेनर्जी को जनादेश सहर्ष स्वीकारना चाहिए और वे ऐसे ही आनाकानी करती है तो भी संवैधानिक दृष्टिकोण से भारतीय संविधान का ढांचा तो अत्यंत सुदृढ़ है, जो ऐसी किसी भी विषम परिस्थिति से निपटने में सक्षम है जहां शासन 'तंत्र' के बजाय व्यक्ति की 'इच्छा' से चलने लगे।
अनुच्छेद 164(2) स्पष्ट रूप से मंत्रिपरिषद की सामूहिक उत्तरदायित्वता को परिभाषित करता है। यदि कोई मुख्यमंत्री अपनी निर्वाचन सीट हार जाता है, तो अनुच्छेद 164(4) के तहत उसे केवल छह माह की संवैधानिक छूट मिलती है, लेकिन बहुमत खोने या हार के बाद भी पद पर बने रहना स्पष्ट रूप से असंवैधानिक है।
राज्यपाल की शक्तियां यहां 'रक्षक' की भूमिका में आती हैं; क्योंकि मुख्यमंत्री राज्यपाल के 'प्रसादपर्यंत' पद धारण करते हैं। अतः बहुमत के अभाव में बर्खास्तगी एक अनिवार्य संवैधानिक विकल्प बन जाता है।
अंततः, यदि राज्य की मशीनरी पूरी तरह विफल हो जाए और संवैधानिक ढांचे के भीतर शासन करना असंभव हो, तो अनुच्छेद 356 के तहत राष्ट्रपति शासन ही लोकतंत्र की पुनर्स्थापना का अंतिम और प्रभावी मार्ग शेष रह जाता है।
अतः यह अनिवार्य है कि सत्ता की गरिमा को समझते हुए त्याग और शुचिता का परिचय दिया जाए, ताकि बंगाल अपने पुराने गौरव को पुनः प्राप्त कर सके।
- सपना सी.पी. साहू 'स्वप्निल'
मध्य प्रदेश संपादक, नित्य संदेश


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