नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। कथाव्यास प्रो. सुधाकराचार्य त्रिपाठी ने मयूर विहार में अपने आवास पर सामवेद की षष्ठकथा में सामवेद में मृत्यु के बाद द्युलोक में सोमराजा से जन्म लेने तक की यात्रा के रहस्यों को समझाया।
कथा के 21 ऋषियों का परिचय देते हुए चार वाणियों का महत्त्व बताया गया। कथा के प्रारम्भ में इन्द्र, पवमान और सोम की स्तुति हुई।
त्रिपाठी जी ने बताया कि पवमान सोमराजा की प्रथम आहुति क्यों कही गई है? पूर्वजन्म की एकत्रित अवियों के प्रारब्ध के रूप में मेधा के बल पर जीव द्युलोक में पहुँचता है। जीव पहली आहुति करता है द्युलोक में , उससे राजा सोम पैदा होता है। दूसरी आहुति पर्जन्य में होती है तो जल पैदा होता है। तीसरी आहुति होती है पृथ्वी में तो अन्न पैदा होता है। चौथाई आहुति होती है पुरुष में तो शुक्र पैदा होता है। पाँचवीं आहुति होती है स्त्री में तो शिशु पैदा होता है।
वैखरी से पूर्व तीन वाणियाँ हैं - परा पश्यन्ती मध्यमा। ये चारों वाणियाँ सोम, पर्जन्य, पृथ्वी, पुरुष और स्त्री में दिखती हैं। पाँचों कर्मेन्द्रियों और पाँचों ज्ञानेन्द्रियों की वाणियाँ गोपति के लिए पूछती हुई सोम के लिए जाती हैं। पुरुहूत इन्द्र संतरण करता हुआ स्त्री के साथ जोड़ा बनाकर चलता है। हर द्युलोक में अलग सृष्टि है। द्युलोक अनन्त हैं। आज की कथा में बताया कि हम द्युलोक के मध्य में हैं, मृत्यु के बाद जीव द्युलोक के पृष्ठभाग में जाकर द्युलोक से सोम, पर्जन्य, पृथ्वी, पुरुष और स्त्री के माध्यम से नीचे आता है। इन्द्र उनको सही जगह पर लगा देता है। इसलिए हम उसकी स्तुति करते हैं।

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