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| राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश भारत के नव निर्माण पर खुलकर बोले, सबके साझा प्रयासों से होगा भारत का निर्माण, तकनीक के साथ नहीं चले तो हम गुलाम हो जाएंगे : श्री हरिवंश |
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय और वीर भारत न्यास के आयोजन 'प्रणाम उदन्त मार्त्तण्ड' में हुआ मंथन
तीन दिन का मीडिया महोत्सव 10 मई को लेगा विराम, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की उपस्थिति में होगा समापन
प्रो. पवित्र श्रीवास्तव
नित्य संदेश, भोपाल। भारत भवन में चल रहे राष्ट्रीय संविमर्श 'प्रणाम उदन्त मार्त्तण्ड' में राज्यसभा के उपसभापति हरिवंश ने कहा कि हमने 2014 के बाद यह सपना तय किया है कि 2047 में हम कहाँ पहुंचेंगे? जबकि हमारे पड़ोसी देशों ने इस तरह के लक्ष्य और योजनाएं पहले ही बनाई हुई हैं। अपने देश के विकास का रोडमैप बनाने में हम कई साल पिछड़ गए। हम सब लोगों के साझा प्रयासों से नए भारत का निर्माण होगा, इसमें मीडिया भी शामिल है। बदलते दौर में, नई तकनीक के साथ हमें खुद को प्रासंगिक बनाना होगा। इस समय भारत में बहुत अच्छा काम हो रहा है। पिछले 10-12 वर्षों में भारत में तेजी से आधारभूत संरचनाएं विकसित हुई हैं।
वे माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय और वीर भारत न्यास की संयुक्त पहल पर भारत भवन, भोपाल में आयोजित 'प्रणाम उदन्त मार्त्तण्ड' में बतौर मुख्य वक्ता शामिल हुए। इस अवसर पर वरिष्ठ पत्रकार उदय सिन्हा, विकास मिश्र, प्रत्यूष रंजन और सईद अंसारी ने भी अपने विचार व्यक्त किए। इस सत्र का संचालन वरिष्ठ पत्रकार गिरीश उपाध्याय ने किया।
'नए भारत का निर्माण और हम भारत के लोग' विषय पर अपने विचार व्यक्त करते हुए वरिष्ठ पत्रकार और राजनेता हरिवंश ने कहा कि देश बनाना कठिन होता है, यह कार्य रातों-रात नहीं होता है। एक समय ऐसा था जब देश का सोना गिरवी रख दिया गया था। आज भारत के पास स्वर्ण भंडार है। एक समय में भारत का धन बाहर जाता रहा लेकिन किसी ने इस पर कोई हस्तक्षेप नहीं किया। अब यह दृश्य बदल गया है, लाखों शेल कंपनियां बंद कर दी गई हैं। देश के निर्माण में मजबूत अर्थव्यवस्था की भूमिका को स्पष्ट करते हुए श्री हरिवंश जी ने कहा कि चाणक्य के अनुसार, अर्थ व्यवस्था सुदृढ़ नहीं है तो आपको कोई नहीं पूछेगा। स्वामी विवेकानंद को उन्होंने उधृत किया कि भारत को युवा संन्यासियों से अधिक युवा उद्यमियों की आवश्यकता है। महात्मा गांधी भी भारत को आत्मनिर्भर बनाने की बात करते थे। उन्होंने कहा कि 2014 से पहले भारत में स्टार्टअप की बात नहीं होती थी लेकिन आज स्टार्टअप की एक संस्कृति विकसित हो गई है। उन्होंने बताया कि जब प्रधानमंत्री ने डिजिटल इंडिया की बात की तो कुछ बड़े नेताओं ने उपहास उड़ाया कि गांव में यह कैसे साकार होगा। आज देश के कोने-कोने में यूपीआई से भुगतान किया जा रहा है। 57 करोड़ से अधिक सक्रिय बैंक खाते हैं। 10 में से 6 इंटरनेट उपयोगकर्ता ग्रामवासी हैं। उन्होंने कहा कि जो देश तकनीक में पिछड़ जाता है, उसके सामने गुलाम होने के अलावा कोई विकल्प नहीं रह जाता। हमें नई तकनीक को सीखना होगा और उसका विकास भी करना होगा। उन्होंने हाल के वर्षों में 5जी से लेकर रेल निर्माण तक में हो रहे अच्छे कार्यों का तथ्यात्मक विवरण प्रस्तुत किया।
वर्षों पहले पहचान ली गई थी सूचना की ताकत :
उपसभापति श्री हरिवंश ने कहा कि उदन्त मार्त्तण्ड के शीर्षक के नीचे एक श्लोक प्रकाशित होता था, उसका आशय था- सूर्य के प्रकाश के बिना जैसे अंधकार नहीं मिटता, उसी प्रकार जो लोग नहीं जानते, उनको समाचारपत्र के बिना जानकारी नहीं मिल सकती। यह श्लोक समाचार पत्र की भूमिका को स्पष्ट करता है। हम कह सकते हैं कि सूचना की ताकत को वर्षों पहले पहचान लिया गया था। उन्होंने कवि वचन सुधा, प्रताप और आज जैसे समाचार पत्रों की पत्रकारिता का उल्लेख कर पत्रकारिता के उद्देश्य एवं समाज में उसकी भूमिका को स्पष्ट किया।
वरिष्ठ पत्रकार विकास मिश्र ने कहा कि हमें नागरिक अनुशासन का पालन करना चाहिए। कितने ही लोग हैं जो बिना हेलमेट वाहन चलाते हैं? सरकार की अच्छी योजनाओं का दुरुपयोग करते हैं। भारत के निर्माण में हमें नियमों और अनुशासन का पालन करना चाहिए। वहीं, वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रत्यूष रंजन ने एआई की उपयोगिता पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि हम इस तकनीक से बच नहीं सकते इसलिए हमें एआई को अच्छी प्रकार समझना चाहिए। उन्होंने कहा कि एआई हमें डिक्टेट न करे, हम एआई को डिक्टेट करें।कृत्रिम बुद्धिमता से ऊपर मनुष्य की बुद्धिमता है, यह बात हमें नहीं भूलना चाहिए।
टीवी पत्रकार श्री सईद अंसारी ने कहा कि आज पत्रकार नोट्स बनाना भूल गए हैं। अच्छा पत्रकार बनने के लिए विद्यार्थियों से आग्रह करता हूँ कि नोट्स बनान सीखें। उन्होंने कहा कि आज पत्रकारिता की साख पर बहुत बड़ा संकट है। इसकी साख को बचाकर रखना बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा कि नए भारत निर्माण के निर्माण के लिए जरूरी है कि हम पीछे जाएं और रामराज्य को वर्तमान में ले आएं, हमारी सब समस्याओं का समाधान हो जाएगा।
वरिष्ठ पत्रकार श्री उदय कुमार ने कहा कि विदेश में नागरिकों में सिविक सेंस दिखाई देता है। वहां के लोग अपने कर्तव्यों का स्वाभाविक ही पालन करते हैं। अगर हमें अपने देश को बनाना है तो कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। अपनी मातृभाषा को सीखना चाहिए और उस पर गौरव की अनुभूति करनी चाहिए।
पत्रकारिता में विचार महत्वपूर्ण, भाषा केवल माध्यम :
'भारतीय पत्रकारिता के वैचारिक अधिष्ठान' पर विमर्श करते हुए वरिष्ठ पत्रकारों एवं विचारकों ने कहा कि स्वबोध से ही भारत बोध हो सकता है। हमारी पत्रकारिता के वैचारिक अधिष्ठान- स्वत्व, स्वाभिमान, भारत बोध, राष्ट्र निर्माण, लोक जागरण और अभिव्यक्ति की शक्ति पर केंद्रित होना चाहिए। वरिष्ठ पत्रकार प्रफुल्ल केतकर ने कहा कि पत्रकारिता में विचार महत्वपूर्ण है, भाषा तो केवल माध्यम है। पत्रकारिता-पत्रकारिता है, हिंदी या अंग्रेजी की पत्रकारिता नहीं। श्री केतकर ने कहा कि पंडित युगलकिशोर शुक्ल ने 'उदन्त मार्त्तण्ड' का प्रकाशन भारत के विचार के साथ किया, इसलिए उसके 200 वर्ष पूर्ण होने का महत्व है। स्वधर्म, स्वभाषा और स्वदेशी की लड़ाई को हमने कम्युनल मान लिया, यह विडंबना है। इसी नैरेटिव का शिकार 'वन्देमातरम' हुआ।
वरिष्ठ पत्रकार विष्णु प्रकाश त्रिपाठी ने कहा कि हमें वर्षों तक उन लोगों ने यह सिखाया कि पत्रकारिता निष्पक्ष होती है, जो जीवन भर पक्षपात करते रहे। पत्रकार को देश-समाज के प्रति पक्षपाती होना ही चाहिए। संवादी होने के कारण हम देश, समाज और प्रकृति के प्रति समर्पित हैं। 'देश हमें देता है सबकुछ हम भी कुछ देना सीखें' यह भाव हमारा होना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि हम न वादी हैं और न प्रतिवादी हैं, हम तो संवादी हैं। संवाद में विश्वास करते हैं।
वहीं, पुदुचेरी विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. सी. जयशंकर बाबू ने कहा कि पत्रकारिता सेवा है और सेवा धर्म है। भारत की पत्रकारिता स्वाधीनता की चेतना के साथ शुरू हुई है। यदि यह स्व का बोध नहीं होता तो पत्रकारिता शुरू ही नहीं होती। उन्होंने कहा कि भाषा नहीं, लिपि कभी-कभी बंधन बन जाती है लेकिन उस भाषा को वहां की परंपरा-संस्कृति के साथ जोड़कर देखेंगे तो लिपि भी बंधन नहीं रहेगी। उन्होंने कहा कि हमारी राष्ट्रीयता में एकत्व का भाव है, जो हमें जोड़ता है।
पश्चिम बंगाल से आईं साहित्यकार प्रो. सोमा बंद्योपाध्याय ने कहा कि बंगाली होने के बाद भी मैंने भारत को भारत के रूप में जाना है। बंगाली अस्मिता या अन्य भाषायी अस्मिता की बात जो उठाते हैं, उससे झूठी बात कुछ नहीं। उन्होंने कहा कि कुछ लोगों ने योजनापूर्वक हमारे बच्चों को अपने मूल से काटने के प्रयास किए।
यह पत्रकारिता का सबसे अच्छा दौर, सभी प्रकार के बंधन से मुक्त है सूचना :
'भूमंडलीकरण के बाद का भारत और मीडिया' विषय पर परिचर्चा में वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ अग्निहोत्री ने कहा कि पहले सूचना को बाधित करने का अधिकार एक विशेष वर्ग के पास रहता था। सरकारें सूचना को दबा देती थीं, लेकिन अब पत्रकारिता इस बंधन से मुक्त हो गई है। भूमंडलीकरण के बाद यह इस समय का सबसे अच्छा दौर है जब मीडिया सब प्रकार से मुक्त हो गई है। आज हर व्यक्ति सूचना के प्रवाह में शामिल है। आज के दौर में नई पीढ़ी के सामने आकाश जितनी संभावनाएं हैं।
वरिष्ठ पत्रकार डॉ. ब्रजेश कुमार सिंह ने कहा कि देश में पहला संविधान संशोधन अभिव्यक्ति की स्वतंत्र को बाधित करने के लिए लाया गया। यह स्पष्टता होनी चाहिए कि आज पत्रकारिता मिशनरी नहीं, प्रोफेशनल है। लेकिन प्रोफेशनल होने से पत्रकारिता के बुनियादी उत्तरदायित्व कम नहीं हो जाते हैं। ग्लोबलाइजेशन ने समाज के प्रति हमारी प्रतिबद्धता को प्रभावित नहीं किया है। बल्कि हमें समाज के लिए और अधिक करने की स्वतंत्रता एवं अवसर दिए हैं। उन्होंने कहा कि आज केवल वही पत्रकारिता लाभ में है जो भारतीय भाषाओं में हो रही है, जिसका नेतृत्व हिंदी कर रही है।
वरिष्ठ पत्रकार नगमा सहर ने कहा कि पत्रकारिता के विद्यार्थियों को यह याद रखना चाहिए कि पढ़ने का कोई विकल्प नहीं है। इसलिए खूब पढ़िए। मीडिया में इतना नकारात्मक वातावरण नहीं है कि जिससे हम डरें। उन्होंने कहा कि मीडिया में प्रतिस्पर्धा है। इस प्रतिस्पर्धा में विश्वसनीयता को बनाये रखना जरूरी है। उन्होंने कहा कि भाषा पर पकड़ होना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि दुनिया में कई मीडिया संस्थान सब्सक्रिप्शन मोड़ पर जा रहे हैं। क्या हम समाचार का मूल्य देने के लिए तैयार हैं?
वरिष्ठ पत्रकार दिलीप कुमार शर्मा ने पूर्वोत्तर की परिस्थितियों पर प्रकाश डाला। उन्होंने यह भी कहा कि पूर्वोत्तर के लोगों को यह शिकायत रहती है कि मुख्यधारा के मीडिया में उनकी आवाज को जगह नहीं मिलती है। भूमंडलीकरण के दौर में इन राज्यों में बदलाव तो आया लेकिन उसकी गति धीमी है। उन्होंने बताया कि पूर्वोत्तर के एक बड़े राज्य असम में ही 2003 में पहला सेटेलाइट चैनल आया। अभी भी यहां 7-8 सेटेलाइट चैनल ही हैं।
इस दौरान लाइव कार्टून शो एवं कार्टून कार्यशाला में पधारे 9 कार्टूनिस्ट श्री सुभानी शेख, माधव जोशी, हरि मोहन बाजपेई, देवेंद्र शर्मा, त्रयम्बक शर्मा, अभिषेक शर्मा, चंद्रशेखर हाड़ा, हरिओम तिवारी तथा शिरीष श्रीवास्तव ने विद्यार्थियों के समक्ष हिंदुस्तानियों के हित के हेतु विषय पर लाइव कार्टून बनाए। वरिष्ठ कार्टूनिस्ट श्री सुभानी ने विद्यार्थियों के साथ कार्टून मेकिंग कार्यशाला का आयोजन भी किया।
10 मई को होगा संगोष्ठी का समापन
संगोष्ठी के तीसरे दिन मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की उपस्थिति में सायं 6 बजे समापन कार्यक्रम होगा| समापन से पूर्व "स्वाभिमानी भारत" सत्र में प्रख्यात निर्देशक एवं अभिनेता डॉ. चन्द्र प्रकाश द्विवेदी एवं पत्रकार हितेश शंकर उपस्थित रहेंगे। "भारतीय भाषाओं का राष्ट्रीय स्वर" विषयक सत्र में प्रो. कृपाशंकर चौबे, शैलेश पाण्डेय, हर्षवर्धन त्रिपाठी, जयंती रंगनाथन उपथित रहेंगी। अन्य सत्रों में पत्रकार प्रतीक त्रिवेदी, राशिद किदवई, अनिल पाण्डेय, अनुज खरे एवं शरद गुप्ता शामिल होंगे।
— समाचार प्रदाता विभागाध्यक्ष, जनसंपर्क











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