नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। कथाव्यास प्रो. सुधाकराचार्य त्रिपाठी ने मयूर विहार में अपने आवास पर सामवेद की षष्ठकथा में सामवेद में वर्णित सोम के रहस्यों को समझाया।
आज की कथा सोम की स्तुति से प्रारम्भ हुई। ऋषि प्रार्थना करते हैं कि हे सोम हमें अपनी धारा से पवित्र करो। अन्नों में से अन्न और शक्तियों में से शक्ति को प्रदान कीजिए। जैसे शरीर के अंग खाए हुए पदार्थों में से आवश्यक तत्त्व ग्रहण करता है, उसी प्रकार जितना ले सकते हों,उतना ही लें। सोम मदिर है,जो रस में किण्वन् डाल कर शरीर के बहुत सारे मल को बाहर भेज देता है। हमारे शरीर में किण्वन करने वाली ग्रन्थियां और अंग हैं ।सोम उदग्राभ है जो बाहरी साधनों से नहीं, सहज साधनों से बल और शक्ति देता है। सोम पोषण करने वाला, वेग-गति, शक्ति-सौन्दर्य देने वाला है। वह विश्व को फैलाने वाला है। सोम ब्रह्म की शक्ति है, इसी के बल पर सृष्टि होती है।
पञ्चचर्षणी पाँच इन्द्रियाँ हैं,पञ्चजन नहीं। सात चक्रों से सत्त्व, रजस् और तमस् रूप ब्रह्म से हरण करके लाया गया आत्मा का रूप ही सोम है। सोम आशिर है, जो हृदय को मजबूत बनाता है।अपने सातों चक्रों को अनुकूल बनाना चाहिये।

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