नित्य संदेश, देश वर्तमान समय में संकट के दौर से गुजर रहा है। देश की जनता दोहरी मार झेलने को मजबूर हो रही है, लेकिन देश की विभिन्न पार्टियों के नेता उसमें सत्ता पक्ष के हों या विपक्ष के जोकि इस संकट की घडी में भी एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगाते हुए हमलावर हो रहे हैं।
सत्ता एवं विपक्ष के आरोप-प्रत्यारोपों के बीच देश की बेचारी भोली भाली जनता पिस रही है। जिसमें एक तो घर की रसोई के जरूरी सामान की किल्लत एवं दूसरे चारो तरफ से महंगाई की मार। ऐसे में सत्ता एवं विपक्षी पार्टियों के बीच जो एक दूसरे के खिलाफ हमलावर होकर राजनीति जमकाने में जुटे हैं, उन्हें देश की जनता को राहत देने के लिए उन उपायों पर संयुक्त रूप से मिलकर फोकस करना होगा, जिससे देश की जनता को जरूरी सामान की किल्लत न हो ओर लगातार बढती महंगाई पर कुछ कंट्रोल किया जा सके। ताकि देश की जनता को कुछ राहत मिल सके। जब देश मुसीबत में होता है, तब नेताओं की जिम्मेदारी सबसे ज्यादा बढ़ जाती है। पर हो इसका उल्टा रहा है।
संकट का मतलब क्या है?
संकट मतलब सिर्फ बॉर्डर पर युद्ध नहीं
देश में संकट का एक ही मानक नहीं होता कि विदेश से कोई युद्ध छिड जाए ओर उस समय को संकटकाल घोषित किया जाये। देश में संकट के लिए किसान का सूखा,नौजवान की बेरोजगारी,अस्पताल में बेड की कमी,महंगाई से टूटता घर का बजट,ये सब देश का संकट है। संकट के वक्त सत्ता और विपक्ष को कंधे से कंधा मिलाकर काम करना चाहिए। लेकिन यहां खेल दूसरा चल रहा है। सत्त पक्ष हर समस्या पर पर्दा डालने में लगा है। आंकड़े घुमाता है, नई योजना लॉन्च करता है, पुरानी का हिसाब नहीं देता। विपक्ष हर बात पर राजनीति खोजता है। कैमरे के सामने छाती पीटता है, पर जमीन पर समाधान लेकर नहीं आता। जनता त्राहिमाम करती रहती है, और नेताजी अखबार एवं टीवी डिबेट में एक दूसरे पर देश के हालात खराब करने एवं देश की छवि को धूमिल करने का आरोप लगाते हैँ।
नेता अपनी राजनीति चमकाने के लिए समाज को बांट देते हैं। हिंदू-मुस्लिम, जाति, इलाका। संकट की आग में नफरत का पेट्रोल डालने का काम करने से गुरेज नहीं करते। वर्तमान समय में देश की सभी पार्टियों के जन प्रतिनिधि एवं नेताओं को चाहिए की वह देश में आए इस संकट की घड़ी से उबारने के लिए सुझाव दें एक दूसरे का सहयोग करें। एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप न लगाए। जब देश संकट के दौर से गुजर जाए तब राजनीति करना ठीक होगा। देश की जनता मूलभूत सुविधाओं से वंचित होती जा रही है, लगातार जरूरी सामान की किल्लत बढ़ती जा रही है, महंगाई आसमान छू रही है। ऐसे में दूषित नहीं बल्कि साफ-सुथरी राजनीति की देश को आवश्यकता है।
—अशोक सोम
लेखक दैनिक भास्कर में वरिष्ठ संवाददाता हैं


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