नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठः स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय के भाषा विभाग एवं सुभारती नैचुरोपैथी कॉलेज(आयुष संकाय) एवं उत्तर प्रदेश लोक एवं जनजाति संस्कृति संस्थान, संस्कृति विभाग, लखनऊ के संयुक्त तत्त्वावधान में आयोजित एकदिवसीय लोकोत्सवः साहित्यिक संगोष्ठी एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। इस कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रुप में राज्यसभा की पूर्व सांसद व वरिष्ठ नेत्री कांता कर्दम उपस्थित रहीं।
वहीं मुख्य वक्ता के रुप में डॉ. विमलेश कान्ति वर्मा, भाषावैज्ञानिक, दिल्ली तो विशिष्ट वक्ता के रुप में प्रों. कुसुमलता मलिक, दिल्ली विश्वविद्यालय तथा वक्ता के रुप में सुश्री सुनंदा वर्मा ने विभिन्न राज्यों एवं क्षेत्रों से आए लोक कलाकारों के साथ उपस्थित रहे। इनके अतिरिक्त विश्वविद्यालय की मुख्य कार्यकारी अधिकारी प्रो.(डॉ.) शल्या राज, कुलपति प्रो.(डॉ.) पी.के.शर्मा, प्रतिकुलपति डॉ. मुनीश सी. रेड्डी, कुलसचिव ग्रुप कैप्टन एम.याकूब (सेनि.), नैचुरोपैथी कॉलेज के प्रिसिंपल डॉ. धीरेन अजित नायर, भाषा विभाग की विभागाध्यक्ष एवं कार्यक्रम की संयोजिका डॉ. सीमा शर्मा व उत्तर प्रदेश लोक एवं जनजाति संस्कृति संस्थान, संस्कृति विभाग, लखनऊ केनिदेशक अतुल द्विवेदी आदि उपस्थित रहे। कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती के सम्मुख दीप प्रज्ज्वलन एवं सरस्वती वंदना के साथ हुआ।
मुख्य अतिथि पूर्व राज्यसभा सांसद एवं बीजेपी की वरिष्ठ नेत्री कांता कर्दम ने अपने उद्बोधन में कहा कि सुभारती विश्वविद्यालय एवं लोक एवं जनजाति संस्कृति संस्थान लखनऊ के संयुक्त तत्त्वावधान में आयोजित इस लोकोत्सव में आए हुए विभिन्न लोककलाकारों द्वारा जो मनमोहक प्रस्तुतियां दी गईं वे यह बताने के लिए काफी हैं कि क्यों भारत को विविधताओं तथा अनेकता में एकता का देश कहा जाता है। लोक कलाओं के जितने रुप रंग हमारे देश में देखने को मिलते हैं शायद ही विश्व के किसी अन्य देश व संस्कृति में मिलेंगे। आज इन लोककलाओं को संरक्षित व संवर्धित करने की आवश्यकता है। इस आयोजन से यह बात भी सृदृढ़ होती है कि यदि शिक्षण संस्थान एवं सरकारें चाहें तो लोक कलाएं एवं लोक संस्कृतियां कभी भी नहीं मिट सकती हैं।
सुभारती विश्वविद्यालय के इस मनोहारी परिसर एवं प्रेक्षागृह में आयोजित यह विशिष्ट कार्यक्रम यह बतलाता है कि यहां पर कला, संस्कृति एवं लोककला का शिक्षण की विभिन्न विधाओं के द्वारा ना सिर्फ संरक्षण किया जा रहा है बल्कि उसे भविष्य के लिए सहेजा भी जा रहा है। यह इस संस्थान के संस्थापक डॉ. अतुल कृष्ण एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. शल्या राज के अथक एवं सजग प्रयासों की ही देन है।
मुख्य वक्ता डॉ. विमलेश कान्ति वर्मा ने साहित्यिक संगोष्ठी में अपने उद्बोधन में कहा कि ‘लोक’ केवल ग्रामीण जीवन या परंपराओं तक सीमित नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक चेतना, संस्कृति और जीवन मूल्यों का जीवंत स्वरूप है। उन्होंने बताया कि लोक की अभिव्यक्ति साहित्य, संगीत, कला, भाषा और लोकाचार के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी प्रवाहित होती रही है। उन्होंने कहा कि लोक परंपराएं समाज को उसकी जड़ों से जोड़ने का कार्य करती हैं। आधुनिक समय में भी लोक संस्कृति की प्रासंगिकता बनी हुई है। डॉ. वर्मा ने युवाओं से लोक धरोहर के संरक्षण और संवर्धन में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया।
वहीं प्रो. कुसुमलता मलिक ने अपने विशिष्ट व्याख्यान में कहा कि उत्तर प्रदेश की संस्कृति भारतीय सभ्यता की आत्मा है, जिसने विश्व संस्कृति को गहराई से प्रभावित किया है। उन्होंने बताया कि यहां की लोक परंपराएं, साहित्य, अध्यात्म और सांस्कृतिक विविधता वैश्विक समाज के लिए प्रेरणास्रोत हैं। उन्होंने कहा कि काशी, मथुरा, अयोध्या और प्रयागराज जैसे तीर्थ स्थल विश्व को शांति, ज्ञान और मानवता का संदेश देते हैं। प्रो. मलिक ने युवाओं से अपनी सांस्कृतिक विरासत को समझने और संरक्षित करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर केवल भारत ही नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के लिए गौरव का विषय है।
इस अवसर पर बोलते हुए वरिष्ठ पत्रकार एवं फिल्ममेकर सुश्री सुनंदा वर्मा ने “लोक संस्कृति द स्टोरी ऑफ ‘अज़’” विषय पर अपने वक्तव्य में कहा कि लोक संस्कृति हमारी सामूहिक पहचान, परंपराओं और जीवन मूल्यों की जीवंत अभिव्यक्ति है। उन्होंने बताया कि लोकगीत, लोक कथाएं, रीति-रिवाज और पारंपरिक कलाएं समाज को अपनी जड़ों से जोड़ने का कार्य करती हैं। उन्होंने कहा कि आधुनिकता के दौर में लोक संस्कृति का संरक्षण और संवर्धन अत्यंत आवश्यक है। लोक संस्कृति हमें एकता, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक गौरव का संदेश देती है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपनी विरासत को समझें और उसे आगे बढ़ाने में सक्रिय भूमिका निभाएं।
इस कार्यक्रम के दूसरे सत्र में गौरव साहा एवं उनके समूह द्वारा “लोक में राम” विषय पर नृत्य प्रस्तुति, मथुरा से आए लोककलाकार सुखबीर सिंह एवं साथी द्वारा अलगोझा वादन (लुप्तप्राय लोक वाद्य), सहारनपुर की सुश्री रंजना नेब एवं उनके समूह द्वारा “लोक में कृष्ण” नृत्य प्रस्तुति, मेरठ की लोकगायिका सुश्री नीता गुप्ता एवं उनके समूह द्वारा लोक संगीत गायन (संस्कार गीत) तथा रोहतक हरियाणा के लोकगायक शीशपाल एवं उनके समूह द्वारा हरियाणवी लोक नृत्य एवं घूमर तथा दिल्ली के अब्दुल हामिद एवं टीम के द्वारा नट प्रस्तुति की गईं।
कार्यक्रम में बोलते हुए कुलपति प्रो. (डॉ.) पी.के.शर्मा ने कहा कि लोक संस्कृतियां अगर जीवित रहेंगी तो ही लोक रहेगा बिना लोक संस्कृति एवं लोक कला के लोक का कोई औचित्य नहीं रहता है। अतः हमें विल्प्त हो रही इन लोक कलाओं को संरक्षित एवं संवर्धित करना होगा, जिसके लिए सुभारती विश्वविद्यालय तथा इसके सभी सदस्य चाहे वे विद्यार्थी हों या यहां के शिक्षक व कर्मचारी सभी एकजूट एवं कंधे से कंधा मिलाकर चलने के लिए सदैव तत्पर हैं।
इस दौरान सभी अतिथियों एवं कलाकारों को विश्वविद्यालय तथा लोक एवं जनजाति संस्कृति संस्थान, संस्कृति विभाग, लखनऊ की ओर से प्रतिक चिह्न पादप एवं अंग वस्त्र देकर सम्मानित किया गया। आधिकारिक रुप से सभी का स्वागत भाषा विभाग की विभागाध्यक्षा डॉ. सीमा शर्मा एवं कार्यक्रम के विषय में परिचय लोक एवं जनजाति संस्कृति संस्थान, संस्कृति विभाग, लखनऊ के निदेशक अतुल द्विवेदी के द्वारा दिया गया। कार्यक्रम का सफल संचालन भाषा विभाग की शिक्षिकाओं डॉ. सोनी एवं भावना ने किया।
इस अवसर पर पत्रकारिता विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. ऋतेष चौधरी, डॉ. चंपालाल मंडरेले, डॉ. पिंटू मिश्रा, डॉ. आर. के. जैन, डॉ. रेणु मावी, डॉ. धीरेन अजित नायर, डॉ. रफत खानम, डॉ. आशीष दीपांकर, डॉ. निशि, डॉ. अंकित, डॉ. यशपाल, डॉ. नीरज नयन ऋषि, डॉ. ज्योति मधुर, डॉ. मनीषा, डॉ. प्रीति, प्रज्ञा शर्मा आदि उपस्थित रहे।
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