नित्य संदेश ब्यूरो
नई दिल्ली। मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, पटपड़गंज के डॉक्टरों ने उज़्बेकिस्तान के 3-वर्षीय बच्चे, प्रिंस, का सफलतापूर्वक इलाज एक कॉम्प्लेक्स बोन मैरो ट्रांसप्लांट (BMT) प्रक्रिया के माध्यम से किया। प्रिंस एक गंभीर जेनेटिक ब्लड डिसऑर्डर ‘सिकल सेल डिजीज’ से पीड़ित था, जो एक जानलेवा स्थिति है। इस बीमारी में रेड ब्लड सेल्स असामान्य और कठोर हो जाते हैं, जिससे शरीर में कई गंभीर कॉम्प्लीकेशन्स जैसे अंगों को नुकसान और स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है। सिकल सेल डिजीज खासकर छोटे बच्चों के जीवन की गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित करती है। प्रिंस पहले ही स्ट्रोक का शिकार हो चुका था और उसे बार-बार असहनीय दर्द के दौरे पड़ते थे। जैसे-जैसे उसकी स्थिति बिगड़ती गई और सामान्य इलाज से राहत नहीं मिली, उसके परिवार ने स्थायी इलाज की तलाश शुरू की। इसी उम्मीद में वे उज़्बेकिस्तान से भारत आए और एडवांस व स्पेशलाइज्ड इलाज के लिए मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, पटपड़गंज का चयन किया। विस्तृत जांच के बाद डॉक्टरों ने स्टेम सेल ट्रांसप्लांट की सलाह दी, जो इस बीमारी का एकमात्र स्थायी इलाज माना जाता है।
इस केस के बारे में बताते हुए, मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल, पटपड़गंज, के पीडियाट्रिक ऑन्कोलॉजी, हेमाटो-ऑन्कोलॉजी एवं बोन मैरो ट्रांसप्लांट विभाग के सीनियर डायरेक्टर - डॉ. सत्येंद्र कटेवा, ने बताया, “प्रिंस की स्थिति बेहद गंभीर थी, क्योंकि उसे पहले स्ट्रोक हो चुका था और वह बार-बार दर्द के गंभीर दौरों से गुजर रहा था। सिकल सेल डिजीज में रेड ब्लड सेल्स का असामान्य आकार ब्लड फ्लो को बाधित करता है और महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंचाता है। आदर्श रूप से पूरी तरह मैच करने वाला डोनर सबसे बेहतर होता है, लेकिन इस केस में ऐसा डोनर उपलब्ध नहीं था। विस्तृत काउंसलिंग और सावधानीपूर्वक योजना के बाद हमने हाफ-मैच सिबलिंग डोनर के साथ हैप्लोआइडेंटिकल ट्रांसप्लांट का विकल्प चुना, जो खासकर बच्चों में सुरक्षित और प्रभावी साबित हो रहा है।” पूरी तरह मैच करने वाला डोनर न मिलने पर प्रिंस की बहन को हाफ-मैच डोनर के रूप में चुना गया, जिससे वह हैप्लोआइडेंटिकल स्टेम सेल ट्रांसप्लांट के लिए योग्य बनीं। प्रक्रिया से पहले प्रिंस को कंडीशनिंग थेरेपी दी गई, जिसमें कीमोथेरेपी और विशेष दवाएं शामिल थीं, ताकि उसका शरीर डोनर स्टेम सेल्स को स्वीकार कर सके। ट्रांसप्लांट सफलतापूर्वक किया गया और ऑपरेशन के बाद की स्थिति स्थिर रही, जिसमें कोई बड़ी कॉम्प्लीकेशन्स नहीं आई। फॉलो-अप रिपोर्ट्स के अनुसार, अब उसके लगभग 98% ब्लड सेल्स डोनर से विकसित हो रहे हैं।
इलाज के महत्व को बताते हुए, डॉ. कटेवा, ने आगे कहा, “बोन मैरो ट्रांसप्लांट, विशेष रूप से हैप्लोआइडेंटिकल ट्रांसप्लांट (लगभग 50% HLA मैच वाले), सिकल सेल डिजीज जैसे जेनेटिक ब्लड डिसऑर्डर के इलाज में क्रांतिकारी बदलाव ला रहा है। इसका सबसे बड़ा फायदा यह है कि इससे डोनर की उपलब्धता बढ़ती है, जिससे माता-पिता या भाई-बहन आंशिक मैच होने के बावजूद जीवनदाता बन सकते हैं। यह तकनीक इंतजार का समय कम करती है, इलाज को अधिक सुलभ बनाती है और एक स्थायी समाधान प्रदान करती है। आधुनिक ट्रांसप्लांट प्रोटोकॉल और सपोर्टिव केयर के चलते इसके परिणाम भी काफी बेहतर हुए हैं, जिससे यह दुनिया भर के कई बच्चों के लिए सुरक्षित और प्रभावी विकल्प बन गया है।”
आज प्रिंस सिकल सेल डिजीज के लक्षणों से मुक्त है और उसे अब दर्द के दौरों का सामना नहीं करना पड़ता। भविष्य में कॉम्प्लीकेशन्स का खतरा भी काफी कम हो गया है, जिससे वह अब एक स्वस्थ और सक्रिय जीवन जी सकता है। उसकी यह रिकवरी न केवल उसके परिवार के लिए एक बड़ी जीत है, बल्कि आधुनिक चिकित्सा की प्रगति का भी सशक्त उदाहरण है। यह केस एडवांस बोन मैरो ट्रांसप्लांट तकनीकों की परिवर्तनकारी क्षमता को दर्शाता है। यह भी साबित करता है कि पूरी तरह मैच करने वाला डोनर न होने की स्थिति में भी हैप्लोआइडेंटिकल ट्रांसप्लांट जैसे इनोवेटिव अप्रोच के जरिए गंभीर जेनेटिक बीमारियों से जूझ रहे मरीजों को नई उम्मीद और स्थायी इलाज मिल सकता है।

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