Breaking

Your Ads Here

Monday, March 16, 2026

जब देखभाल समाप्त होती है, तब प्रश्न आरंभ होते हैं: मानवता और चिकित्सीय उत्तरदायित्व पर एक चिंतन



प्रो. (डॉ.) अनिल नौसरान
नित्य संदेश। हरिश राणा के मामले में हालिया घटनाक्रम ने गहरे भावनात्मक और नैतिक प्रश्न खड़े कर दिए हैं। जानकारी के अनुसार, उन्हें उनके घर से अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) के लिए स्थानांतरित किया गया है, और यह भी बताया जा रहा है कि उनकी फीडिंग ट्यूब तथा ट्रेकियोस्टॉमी सपोर्ट हटा दिए गए हैं। यह स्थिति केवल चिकित्सा जगत ही नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए गंभीर आत्ममंथन का विषय है।

तेरह लंबे वर्षों तक उनके माता-पिता ने अटूट समर्पण के साथ उनकी देखभाल की, हर परिस्थिति में आशा को जीवित रखा। उनका संघर्ष केवल देखभाल तक सीमित नहीं था—यह मानव सहनशीलता, प्रेम और जीवन में विश्वास का सशक्त उदाहरण था। जब ऐसा परिवार देश के सर्वोच्च चिकित्सा संस्थान के द्वार पर पहुँचता है, तो उसकी अपेक्षा केवल उपचार ही नहीं, बल्कि संवेदनशीलता, सहानुभूति और जीवन की संभावना—चाहे वह कितनी ही क्षीण क्यों न हो—से होती है।

अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान लंबे समय से चिकित्सा उत्कृष्टता का प्रतीक रहा है, एक ऐसा स्थान जहाँ गंभीरतम रोगियों को नया जीवन मिलता है। सामान्य धारणा यह है कि यह संस्थान अत्यंत गंभीर अवस्था में आए मरीजों को जीवनदान देकर वापस भेजता है। किन्तु इस मामले में जो स्थिति सामने आ रही है, वह एक असहज प्रश्न खड़ा करती है—क्या ऐसे महान संस्थान का उद्देश्य तब पूरा होता है, जब जीवन रक्षक उपचार को बिना हर मानवीय संभावना को परखे समाप्त कर दिया जाए?

निष्क्रिय इच्छामृत्यु, यद्यपि कुछ परिस्थितियों में कानूनी रूप से मान्य है, फिर भी चिकित्सा के क्षेत्र में यह सबसे संवेदनशील और जटिल नैतिक निर्णयों में से एक है। इसमें चिकित्सकीय निर्णय, रोगी की गरिमा, परिवार की सहमति तथा समाज के नैतिक मूल्यों के बीच संतुलन आवश्यक होता है। किन्तु जब एक जीवन, जिसे एक दशक से अधिक समय तक परिवार ने अपने त्याग से संजोए रखा, एक प्रतिष्ठित संस्थान में इस प्रकार समाप्ति की ओर बढ़ता है, तो यह स्वाभाविक रूप से एक गहरी पीड़ा और प्रश्न उत्पन्न करता है।

क्या एक ऐसी व्यवस्था, जो स्वास्थ्य संरचना के विस्तार और उन्नत चिकित्सा पर गर्व करती है, ऐसे असाधारण मामलों में कुछ समय के लिए अतिरिक्त सहयोग प्रदान नहीं कर सकती? क्या हमारे स्वास्थ्य तंत्र में ऐसी संवेदनशीलता के लिए स्थान है, जो केवल नियमों और संसाधनों से परे जाकर मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता दे?

यह केवल एक रोगी का मामला नहीं है। यह हमारे समाज के उन मूल्यों का प्रतिबिंब है, जिन्हें हम अपनाते हैं। यह इस बात का प्रश्न है कि हम गरिमा को कैसे परिभाषित करते हैं—केवल मृत्यु में ही नहीं, बल्कि जीवन को बनाए रखने के हर प्रयास में। यह समझने की आवश्यकता है कि हर चिकित्सीय मामला एक मानवीय कहानी है, एक परिवार का संघर्ष है, और एक नैतिक जिम्मेदारी है जो संस्थागत सीमाओं से कहीं आगे जाती है।

इस प्रकरण पर विचार करते हुए यह आवश्यक है कि नीति-निर्माता, चिकित्सा विशेषज्ञ और समाज के सभी वर्ग सार्थक संवाद करें। उद्देश्य किसी पर आरोप लगाना नहीं होना चाहिए, बल्कि यह सुनिश्चित करना होना चाहिए कि हमारी व्यवस्था वैज्ञानिक उत्कृष्टता के साथ-साथ मानवीय संवेदनशीलता को भी सशक्त बनाए।

हरिश राणा की कहानी मौन में विलीन नहीं होनी चाहिए। यह हमें पुनर्विचार, सुधार और जीवन, गरिमा तथा करुणा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को पुनः स्थापित करने के लिए प्रेरित करे।

No comments:

Post a Comment

Your Ads Here

Your Ads Here