नित्य संदेश, इंदौर। पुरातन काल से ही सभ्यता की धारा में
समाहित मालवांचल का एक लंबा पौराणिक तथा राजनैतिक इतिहास तो रहा ही है, करवा इसके यहां की
भौगलिक स्थिति भी धन-धान्य से परिपूर्ण भी रही, ऐसी उन्नत
संस्कृति पार्श्व में एक सहज-सरल सांस्कृतिक जीवन का जन्म हुआ, जो मां 'क्षिप्रा-गंगा-रेवा' के जल-सा निर्मल, कोमल पारिवारिक, सामाजिक एवं धार्मिक भावनाओं से ओत-प्रोत होकर उमंग
उल्लास व उत्साह का पर्याय बना हुआ है। ऐसे सुगम सरल अंचल के
भोले-भाले, सीधे-सरल हृदय लोकजन की महीन
सांस्कृतिक जीवन-धारा के बीच सृजन हुआ भावपूर्ण लोक-साहित्य का।
वस्तुत:
लोक-साहित्य किसी समाज की 'अंतरात्मा' का प्रकटीकरण होता है, जिसमें जीवन के समग्र छोटे से छोटे आंतरिक
पहलू स्वाभाविक रुप में अभिव्यक्ति हो जाते है। 'लोकगीत' लोक-साहित्य की स्पंदनशील
आत्मस्फुरित विधा होती है, अस्तु, लोकगीत लोक जीवन की सरलतम रागात्मक
मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति होते है, जो प्रत्येक लोक-हृदय में अपनी निजी
भाव-निधि के समान होते हैं। कालचक्र के प्रवाह में मालव भूमि में बसने वाले लक समुदाय ने असंख्य
लोकगीतों के माध्यम से प्रचुर अभिव्यक्तियां दी है, जिसमें आधुनिक आपाधापी वाली जिंदगी से दूर दूर्लभ होते
निश्छल आदमी की आदमी की अंतरात्मा अभी भी सुरक्षित अनुभूत होती है और इनमें मुखर होते लोकजन के सुख-दु:ख, राग-द्वेष,उल्लास, विषाद संस्कार तथा रचनाधर्मिता।
प्राय:
संक्रमणशील रहे मालवांचल को चारों ओर के सांस्कृतिक आंचलों का संपर्क मिला, लोगों का आना-जाना
चलता रहा, काल खण्ड व्यतीत होता रहे, किंतु सभी को
समाहित करते हुए भी इस अंचल ने अपनी विशिष्ट चेतना के साथ एक निजी सांस्कृतिक
मौलिकता बनाये रखी। यहां यहां का अंतर्मन मानव को मानव
कहलाने वाले हाव-भावों की क्रीड़ांगन के रुप मे फैलता गया।
अंतस को को छूने वाली भाव बाहुल्य अनेक संबंधों को देव तुल्य
पवित्र संवेदनाओं के संग जीना तथा जीवन में पारिवारिक एवं सामाजिक एकरूपता का
दर्शन एक सूत्र में सहजता के साथ हरमन अजीज़ होना मालवा की अनुपम विशेषता रही है। अपने में समाहित इन्हीं गुणो को अपने मे समाहित किये मालवी लोकगीत
आत्माभिव्यक्ति ऐसी की ऐसी अनेकानेक रचनाएं हैं, जिनमें
मालवा की सामाजिक सभ्यता सामाजिक संस्कृति,
सामाजिक लोक जीवन, आत्मीयतापूर्ण, सीधा-सरलपन, निश्छलता इत्यादि, चहुओर झलकता-छलकता-सा अनुभूत होता हैं एवं
जिनके शब्द-शब्द में महसूस होता है, मालवा का अच्छ-बुरा, कड़ुवा-मीठा-खट्टा सब कुछ।
मालवी
लोकगीतों में लोकांचल के सामाजिक जीवन के विविध रुप सरसता और अपनी सम्पूर्णता से
आकार पाते हैं ! इनके मर्म को टटोलने पर पता चलेगा कि जन्म-स़स्कार,बाल्यावस्था, विवाह, मृत्यु-संस्कार जैसे सोलह संस्कारो में लिप्त यहां का
सामाजिक परिवेश भावनाओं को अद्भुत संजदगी से उलीचता है; रंग-बिरंगे , सजे-संवरे विभिन्न व्रत-उत्सव और
त्यौहारों में मालवा का लोक जीवन, पारिवारिक,धार्मिक एवं सामाजिक जीवन की आस्थाओं और उल्लास को वर्ष
पर्यंत गतिशीलता के साथ आत्मसात किये रहता है; जन्म से लेकर मृत्यु तक के
रीति-रिवाजों के मोहक सोपानों से गुजरकर मालवा का सांस्कृतिक एवं सामाजिक जीवन
भावनाओं के उच्चादर्शों को छूता है ! यहां के रहन-सहन का चित्र प्रस्तुत करती
विशिष्टता धर्म का पूरा का पूरा अवलंबन यहां के लोक जीवन में व्याप्त है और जीवन
की समग्र कर्मशीलता, धार्मिकता से कहीं अछूती नहीं रहती
है, तो गहन दर्शन भी अपने में समाहित करती है। इनमें उमंग
उल्लास व आस्थाओं का ज्वार ही नही अपितु घोर विषमताओं और कठिनाइयों का आवग भी उतना
ही है! किंतु विषमताओं के प्रति संवेदना जितनी मुखर होती हैं उनके प्रति विद्रोह
का आवेग उतना तीव्र प्राय: अनुभूत नहीं होता बल्कि यह 'संवेदनाओं का आंचमन-सा' अनुभूत होता है जो यहां की
निस्तब्ध प्रकृति को दर्शाता है!
लोकगीतों
में समस्याओं से समझौते का भाव दिखाता है किंतु अकर्मण्यतावश नही बल्कि किसी निष्कर्षत:समझ
के साथ यद्यपि लोकजीवन में कालांतर में इसी सोच के चलते कहीं न कहीं आलस्य और
जड़ता का प्रादुर्भाव भी हुआ प्रतीत होता है !
बानगी
रुप में -- 'नाना भणो मति रे लाल, अब तो मांगी खावांगा ने डागला पे बेठ्या-बेठ्या, मक्या झाड़ांगा' में महसूस होता है और तो और सजगता के अभाव में कई विधाएं
लुप्तप्राय हो रही है, उनमें से एक है "सुवाल-जुवाब"। मालवा के
साहित्यकारों एवं प्रशासन से इसके आलेख के माध्यम से यही शुभेच्छा है की ऐसी
विधाओं के सृजन के लिए जागरुकता अभियान चलाया जाना चाहिए।
( उपरोक्त आलेख मालवांचल के मुर्धंन्य
साहित्यकार एवं सुप्रसिद्ध स्वतंत्रता संग्राम सेनानी १०३ वर्षिय, पिवड़ाय गांव आदरणीय दादा नरेन्द्रसिंह जी तोमर साहब के
जन्म दिवस पर आजादी के समय ऐकतारे से ज जगह-जगह(देश-विदेशों मालवी लोकगीतों के
माध्यम से) अलख जगाने वाले देश के सिपाही को समर्पित।
प्रेषक:-
अधिवक्ता
ने लेखक ''काव्य-कीरिट': सुभाष चंद्र निगम (सुप्रीम पावर चैनल)
हाईकोर्ट.
इंदौर.(म०प्र०)
मध्यप्रदेश.(मोबाइल
नं: ९७५३०३७५९६

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