नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय, हल्द्वानी की विधि विशेषज्ञ द्वारा आयोजित "सूचना का अधिकार अधिनियम 2005: चुनौतियाँ एवं समकालीन विमर्श" विषयक ऑनलाइन एकदिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी में चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के इंस्टीट्यूट ऑफ लीगल स्टडीज के अध्यक्ष डॉ. विवेक कुमार त्यागी ने सूचना के अधिकार को भारतीय चिंतन परंपरा से जोड़कर प्रस्तुत किया। उन्होने कहा कि अर्थशास्त्र की अक्षपटल लेखा-व्यवस्था को बताया राजकीय अभिलेखों व अधिकारियों की निगरानी की परंपरा; हिंदू दर्शन के राजधर्म और लोकसंग्रह का भी उल्लेख किया।
डॉ. त्यागी ने कौटिल्य के अर्थशास्त्र के श्लोक "प्रजासुखे सुखं राज्ञः प्रजानां च हिते हितम्।" का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका आशय है कि शासक का हित प्रजा के हित में निहित है। उन्होंने कहा कि यही भाव सूचना के अधिकार की मूल भावना से जुड़ता है, क्योंकि शासन का केंद्र नागरिक है और सत्ता नागरिकों के प्रति उत्तरदायी है।
अक्षपटल: निगरानी की परंपरा
अर्थशास्त्र में वर्णित अक्षपटल की लेखा-व्यवस्था की चर्चा करते हुए उन्होंने इसे राजकीय अभिलेखों और अधिकारियों की निगरानी की परंपरा के रूप में रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि राज्य की आय-व्यय का लेखा रखना और अधिकारियों के कार्यों पर नज़र रखना प्राचीन भारतीय शासन-व्यवस्था में जवाबदेही का साधन रहा है। आधुनिक काल में यही भावना अभिलेखों के रखरखाव, धारा 4 के अंतर्गत सक्रिय प्रकटीकरण और सूचना आयोगों की निगरानी के रूप में दिखाई देती है।
हिंदू दर्शन का परिप्रेक्ष्य
उन्होंने कहा कि हिंदू दर्शन में सत्ता को अधिकार से पहले कर्तव्य के रूप में देखा गया है। उन्होंने इन अवधारणाओं की ओर ध्यान दिलाया:
• राजधर्म: महाभारत के शांतिपर्व में शासक के प्रजा-पालन और उत्तरदायित्व पर बल दिया गया है। शासक का धर्म प्रजा की रक्षा और कल्याण है।
• ऋत और सत्य: वैदिक चिंतन में ऋत को व्यवस्था का आधार और सत्य को उसका आचरण माना गया है। इस दृष्टि से शासन में सत्य तक पहुँच जवाबदेही की पूर्व-शर्त है।
• लोकसंग्रह: गीता का लोकसंग्रह का विचार, यानी समाज के हित को ध्यान में रखकर कर्म करना, सार्वजनिक पद पर बैठे व्यक्ति के आचरण का आदर्श प्रस्तुत करता है।
कर्तव्य से अधिकार तक
डॉ. त्यागी ने स्पष्ट किया कि भारतीय परंपरा में जवाबदेही मुख्यतः नैतिक कर्तव्य और धर्म पर आधारित थी, जबकि RTI ने इसे नागरिक का विधिक और प्रवर्तनीय अधिकार बना दिया। उन्होंने यह भी कहा कि परंपरा में मंत्रगुप्ति, यानी मंत्रणा की गोपनीयता, को भी स्थान मिला है। इसकी तुलना अधिनियम की धारा 8 की सीमित छूटों से की जा सकती है। साथ ही उन्होंने यह रेखांकित किया कि ये प्राचीन आदर्श नैतिक थे और ऐतिहासिक रूप से ज्ञान की पहुँच पर सीमाएँ भी रहीं। उन्होंने कहा कि आज की चुनौती इन मूल्यों को संस्थागत रूप से लागू करने की है। इसके लिए सूचना आयोगों में समयबद्ध नियुक्तियों, लंबित मामलों के निस्तारण और निजता व पारदर्शिता के बीच आनुपातिक संतुलन की आवश्यकता है। कार्यक्रम में कुलपति प्रो. नवीन चंद्र लोहनी, निदेशक प्रो. कमल देवलाल, समन्वयक डॉ. दीपांकुर जोशी और कुमाऊँ विश्वविद्यालय, नैनीताल के प्रो. एस. डी. शर्मा सहित अनेक प्रतिभागी ऑनलाइन जुड़े।

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