एआई से कीटों की पहचान, जैव कीटनाशक, स्मार्ट ट्रैप और डिजिटल परामर्श सेवाओं के जरिए खेती को अधिक प्रभावी बनाने पर मंथन
नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के अटल सभागार में शुक्रवार को पादप संरक्षण विभाग की ओर से कृषि उद्यमिता, नवाचार और स्टार्टअप की संभावनाओं पर एक दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया गया। सम्मेलन में कृषि क्षेत्र की समस्याओं के तकनीकी समाधान विकसित करने, फसल रोगों एवं कीटों की समय रहते पहचान करने और शोध आधारित विचारों को व्यावसायिक उद्यमों में बदलने की संभावनाओं पर चर्चा हुई। विद्यार्थियों ने नौ समूहों में अपने नवाचारी विचारों और प्रस्तावित स्टार्टअप मॉडलों की प्रस्तुति दी। इनमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), डिजिटल पादप स्वास्थ्य परामर्श, जैव कीटनाशक, नैनो-जैव कवकनाशक, लाभकारी सूक्ष्मजीव और स्मार्ट निगरानी प्रणालियों जैसे विषय शामिल रहे।
कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. संगीता शुक्ला ने की, मुख्य अतिथि के रूप में भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के पादप संरक्षण सलाहकार डॉ. जे.पी. सिंह उपस्थित रहे। महाराजा सुहेल देव विश्वविद्यालय, आजमगढ़ के पूर्व कुलपति प्रो. प्रदीप कुमार शर्मा, सीसीएसयू के निदेशक शोध प्रो. बीर पाल सिंह तथा प्रोफेसर शैलेंद्र कुमार शर्मा, डॉ अजय कुमार सहित अन्य शिक्षकों, शोधार्थियों की भी सहभागिता रही। सम्मेलन में विशेषज्ञ वक्ताओं के रूप में सीसीएस-एनएएम, जयपुर के उपनिदेशक (मार्केटिंग) डॉ. एस.आर. सिंह, कृषि विज्ञान केंद्र-द्वितीय, सीतापुर के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. दया शंकर श्रीवास्तव तथा सीसीएस-एनएएम, जयपुर के सहायक प्रोफेसर डॉ. सुरेश चंद्र शर्मा शामिल रहे।
कुलपति प्रो. संगीता शुक्ला ने अपने संबोधन में कृषि क्षेत्र में नवाचार, शोध और उद्यमिता के महत्व पर बल देते हुए कहा कि विद्यार्थियों को केवल अकादमिक ज्ञान तक सीमित न रहकर समाज और किसानों की वास्तविक समस्याओं के समाधान की दिशा में काम करना चाहिए। कृषि में तकनीक का उपयोग तभी सार्थक होगा, जब उसके माध्यम से किसानों को व्यावहारिक लाभ मिले और समस्याओं के समाधान सुलभ तथा प्रभावी बनें। उन्होंने विद्यार्थियों को अपने विचारों को शोध, प्रयोग और नवाचार के माध्यम से विकसित करने तथा उन्हें स्टार्टअप के रूप में आगे बढ़ाने के लिए प्रेरित किया।
मुख्य अतिथि डॉ. जे.पी. सिंह ने पादप संरक्षण और कृषि के क्षेत्र में नवाचार की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि फसलों को कीटों एवं रोगों से बचाने के लिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण और आधुनिक तकनीकों का उपयोग महत्वपूर्ण है। कृषि से जुड़े नए विचारों को किसानों की जरूरतों के अनुरूप विकसित करना और उन्हें उपयोगी समाधानों में बदलना समय की आवश्यकता है। उन्होंने विद्यार्थियों को कृषि विज्ञान और उद्यमिता के बीच समन्वय स्थापित करने तथा अपने विचारों को व्यावहारिक स्तर पर विकसित करने के लिए प्रोत्साहित किया।
विश्वविद्यालय के निदेशक शोध प्रो. बीर पाल सिंह ने विद्यार्थियों को कृषि एवं पादप संरक्षण के क्षेत्र में शोध की संभावनाओं पर कार्य करने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने विश्वविद्यालय की उपलब्धियों और रैंकिंग का उल्लेख करते हुए कहा कि विद्यार्थी अपने शोध को व्यावहारिक समाधान, पेटेंट और नवाचार में बदलने के लिए विश्वविद्यालय की शोध सुविधाओं का लाभ उठाएं।
डॉ. एस. आर. सिंह, उप निदेशक (विपणन), राष्ट्रीय कृषि विपणन संस्थान, जयपुर ने अपने विस्तृत व्याख्यान में कृषि विपणन, नवाचार एवं कृषि उद्यमिता के बदलते स्वरूप पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में भारतीय कृषि एक महत्वपूर्ण परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों पर बढ़ता दबाव, कृषि उत्पादन लागत में वृद्धि, उपभोक्ताओं की बदलती प्राथमिकताएँ, डिजिटल तकनीकों का विस्तार, कृषि उत्पादों की गुणवत्ता एवं उनकी उत्पत्ति का पता लगाने की बढ़ती आवश्यकता तथा कटाई उपरांत होने वाली हानियाँ कृषि क्षेत्र के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ हैं। उन्होंने बताया कि इन चुनौतियों के समाधान के साथ-साथ कृषि क्षेत्र में नए व्यावसायिक अवसर भी विकसित हो रहे हैं, जिनका लाभ युवा कृषि स्नातक, शोधार्थी, किसान तथा ग्रामीण उद्यमी उठा सकते हैं। डॉ. सिंह ने अपने संबोधन में इस बात पर विशेष बल दिया कि कृषि में उद्यमिता का उद्देश्य केवल अधिक उत्पादन करना नहीं, बल्कि कृषि उत्पादन, भंडारण, प्रसंस्करण, परिवहन, विपणन और आपूर्ति शृंखला से जुड़ी समस्याओं का प्रभावी समाधान खोजना भी है।
उन्होंने समझाया कि कृषि क्षेत्र में वास्तविक नवाचार वह है, जो किसी समस्या का व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत करने के साथ आर्थिक एवं सामाजिक मूल्य का सृजन करे। इस संदर्भ में उन्होंने उत्पाद नवाचार, प्रक्रिया नवाचार, व्यवसाय मॉडल नवाचार, विपणन नवाचार, आपूर्ति शृंखला नवाचार तथा वित्तीय एवं संस्थागत नवाचार की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने उदाहरण देते हुए स्पष्ट किया कि केवल टमाटर का उत्पादन करना सामान्य कृषि गतिविधि है, जबकि सौर ऊर्जा आधारित शीत भंडारण के माध्यम से टमाटर की बर्बादी कम करना, उसकी गुणवत्ता बनाए रखना और किसानों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराना नवाचार आधारित उद्यमिता का उदाहरण है। इस प्रकार, कृषि उत्पादों की कटाई उपरांत हानि को कम करने, भंडारण सुविधाओं को बेहतर बनाने तथा बाजार तक पहुँच मजबूत करने वाले समाधान कृषि उद्यमियों के लिए महत्वपूर्ण संभावनाएँ प्रस्तुत करते हैं। ग्रामीण उद्यमिता के संबंध में डॉ. सिंह ने कहा कि इसका अर्थ केवल गाँवों में व्यवसाय स्थापित करना नहीं है, बल्कि स्थानीय संसाधनों, पारंपरिक ज्ञान, स्थानीय प्रतिभा, संस्थागत सहयोग, डिजिटल संपर्क तथा क्षेत्रीय आवश्यकताओं का उपयोग करके ऐसे व्यावसायिक मॉडल विकसित करना है, जिन्हें आगे व्यापक स्तर पर अपनाया जा सके। उन्होंने बताया कि ग्रामीण क्षेत्रों में अनेक ऐसी समस्याएँ मौजूद हैं, जिनका समाधान स्थानीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों और नवाचार के माध्यम से किया जा सकता है।
कृषि उत्पादों के भंडारण, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, परिवहन, विपणन तथा किसानों को बाजार संबंधी जानकारी उपलब्ध कराने के क्षेत्र में उद्यमियों के लिए नए अवसर मौजूद हैं। उन्होंने इस दृष्टिकोण को रेखांकित किया कि स्थानीय समस्या की पहचान, स्थानीय उद्यमी की सक्रिय भागीदारी तथा विस्तार योग्य व्यावसायिक मॉडल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। उन्होंने कृषि विपणन एवं आपूर्ति शृंखला के आधुनिकीकरण की आवश्यकता पर भी बल दिया। उनके अनुसार, कृषि उत्पादों को खेत से उपभोक्ता तक पहुँचाने की प्रक्रिया में होने वाली अनावश्यक लागत और हानियों को कम करना, बाजार संबंधी जानकारी की उपलब्धता बढ़ाना, उत्पादों की गुणवत्ता बनाए रखना तथा किसानों को उपयुक्त बाजारों से जोड़ना कृषि उद्यमिता के महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं। डिजिटल कृषि, कृषि-प्रौद्योगिकी तथा खाद्य-प्रौद्योगिकी के विकास से कृषि उत्पादों की निगरानी, विपणन, मूल्य संवर्धन और आपूर्ति शृंखला प्रबंधन में नई संभावनाएँ उत्पन्न हो रही हैं। उन्होंने इस बात की ओर ध्यान आकर्षित किया कि युवा उद्यमी वैज्ञानिक ज्ञान और आधुनिक तकनीकों का उपयोग करके कृषि क्षेत्र की व्यावहारिक समस्याओं के समाधान विकसित कर सकते हैं। डॉ. सिंह ने कृषि उद्यमिता एवं नवाचार को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार की राष्ट्रीय कृषि विकास योजना के अंतर्गत संचालित नवाचार एवं कृषि उद्यमिता विकास कार्यक्रम का भी उल्लेख किया।
उन्होंने बताया कि इस कार्यक्रम के माध्यम से कृषि क्षेत्र में नवाचार को प्रोत्साहित करने तथा कृषि स्टार्ट-अप के विकास के लिए इनक्यूबेशन व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने पर ध्यान दिया जाता है। इसके अंतर्गत नॉलेज पार्टनर्स तथा RKVY एग्रीबिजनेस इनक्यूबेटर्स की महत्वपूर्ण भूमिका है। उन्होंने प्रस्तुति में उल्लिखित सहायता प्रावधानों का उल्लेख करते हुए बताया कि लागू योजना की शर्तों के अधीन विचार अथवा प्री-सीड स्तर पर ₹5 लाख तक तथा सीड स्तर पर ₹25 लाख तक की वित्तीय सहायता उपलब्ध हो सकती है। इस प्रकार की सहायता कृषि क्षेत्र में नवीन विचारों को व्यावसायिक स्वरूप देने तथा प्रारंभिक चरण में स्टार्ट-अप के विकास में सहायक हो सकती है। युवा उद्यमियों को संबोधित करते हुए उन्होंने सफल स्टार्ट-अप स्थापित करने के लिए तीन महत्वपूर्ण पहलुओं पर विशेष जोर दिया। पहला, किसी तकनीक या उत्पाद को विकसित करने से पहले वास्तविक समस्या की पहचान की जानी चाहिए। दूसरा, व्यवसाय को बड़े स्तर पर विस्तारित करने से पहले संभावित ग्राहकों से समाधान की उपयोगिता और उसकी व्यावसायिक स्वीकार्यता की पुष्टि करनी चाहिए। तीसरा, उद्यम का विकास करते समय आर्थिक व्यवहार्यता के साथ सामाजिक लाभ और पर्यावरणीय स्थिरता को भी समान महत्व देना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी स्टार्ट-अप की सफलता केवल नवीन तकनीक पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि वह अपने लक्षित ग्राहकों की आवश्यकताओं को किस हद तक पूरा करता है और दीर्घकाल में कितना उपयोगी एवं टिकाऊ बना रहता है।
अपने व्याख्यान के माध्यम से डॉ. सिंह ने कृषि विपणन, मूल्य संवर्धन, आपूर्ति शृंखला प्रबंधन, डिजिटल तकनीकों तथा नवाचार आधारित व्यवसाय मॉडलों को कृषि उद्यमिता के विकास के लिए महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने युवा कृषि स्नातकों, विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों को कृषि क्षेत्र की वास्तविक समस्याओं को पहचानने, वैज्ञानिक ज्ञान का व्यावहारिक उपयोग करने तथा नवाचार को सफल उद्यमों में परिवर्तित करने के लिए प्रेरित किया। उनका व्याख्यान इस संदेश पर केंद्रित रहा कि कृषि क्षेत्र में आर्थिक अवसरों का विस्तार केवल उत्पादन बढ़ाने से नहीं, बल्कि कृषि प्रणाली की दक्षता में सुधार, संसाधनों के बेहतर उपयोग, किसानों को बाजार से जोड़ने और टिकाऊ व्यावसायिक समाधान विकसित करने से भी संभव है।
डॉ. दया एस. श्रीवास्तव ने कृषि उद्यमिता और फसल सुरक्षा के नवाचारों पर दिया जोर
सम्मेलन के दूसरे वक्ता डॉ. दया एस. श्रीवास्तव ने कृषि उद्यमिता की अवधारणा को स्पष्ट करते हुए कहा कि उद्यमिता केवल व्यवसाय शुरू करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें जोखिम उठाने, बाजार की मांग को समझने, नेतृत्व क्षमता विकसित करने और उपलब्ध कृषि उत्पादों में अतिरिक्त मूल्य जोड़ने की क्षमता भी शामिल है। उन्होंने बताया कि एक सफल उद्यमी को उत्पाद की गुणवत्ता के साथ-साथ उसकी ब्रांडिंग, प्रत्यक्ष विपणन, ग्राहकों को आकर्षित करने की क्षमता और भविष्य के प्रति स्पष्ट दृष्टिकोण पर भी ध्यान देना चाहिए। उनके अनुसार, किसानों को पारंपरिक खेती के साथ वैकल्पिक कृषि उद्यमों की संभावनाएँ भी तलाशनी चाहिए, ताकि उनकी आय के नए स्रोत विकसित हो सकें।
डॉ. श्रीवास्तव ने भारत की समृद्ध जैव विविधता का उल्लेख करते हुए पौधों और कवकों की विविध प्रजातियों के संरक्षण के महत्त्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने पश्चिमी घाट, हिमालयी क्षेत्र तथा पूर्वोत्तर के पर्वतीय क्षेत्रों जैसे जैव विविधता से समृद्ध क्षेत्रों का उल्लेख किया। उन्होंने वन क्षेत्रों के घटने और नीलगायों के मानव बस्तियों की ओर आने से फसलों को होने वाले नुकसान की समस्या भी उठाई। इस संदर्भ में उन्होंने किसानों की स्थानीय समस्याओं के समाधान के लिए पारंपरिक ज्ञान और स्थानीय नवाचारों के उपयोग की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने एक स्थानीय स्तर पर विकसित एवं संशोधित उपकरण का उदाहरण साझा किया, जिसे प्रगतिशील किसान श्री सुखदेव सिंह के सहयोग से तैयार किया गया था।
वक्ता के अनुसार, इस उपकरण में घड़े से उत्पन्न होने वाली विशिष्ट ध्वनि का उपयोग नीलगायों से फसलों की सुरक्षा के प्रयास में किया जाता है। उन्होंने बताया कि इस तकनीक का उद्देश्य किसानों को रात के समय भी घर से इसका संचालन करने की सुविधा देना है। उनके अनुसार, गाँव में एक किसान द्वारा इस तकनीक का उपयोग किए जाने पर आसपास के अन्य किसानों को भी राहत मिल सकती है। इस उदाहरण के माध्यम से उन्होंने रेखांकित किया कि किसानों के अनुभव, स्थानीय संसाधन और व्यावहारिक नवाचार कृषि समस्याओं के समाधान तथा कृषि उद्यमिता को बढ़ावा देने में उपयोगी भूमिका निभा सकते हैं।
डॉ. सुरेश चंद्र शर्मा ने श्री अन्न आधारित कृषि उद्यमिता और महिला सशक्तिकरण की संभावनाओं पर प्रकाश डाला
सम्मेलन के तीसरे वक्ता डॉ. सुरेश चंद्र शर्मा ने “स्मार्ट मिलेट पारिस्थितिकी तंत्र: भारत में समावेशी महिला उद्यमिता और टिकाऊ कृषि व्यवसाय के लिए कृषि-तकनीकी नवाचारों का समन्वय” विषय पर अपना व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने शुष्क एवं वर्षा-आधारित कृषि क्षेत्रों की चुनौतियों तथा उनमें उपलब्ध संभावनाओं पर प्रकाश डालते हुए बताया कि श्री अन्न (मिलेट्स) आधारित कृषि व्यवसाय किसानों की आय बढ़ाने, ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजित करने और टिकाऊ कृषि को प्रोत्साहित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। डॉ. शर्मा ने बताया कि कृषि-तकनीक, आधुनिक प्रसंस्करण प्रणालियों, मूल्य संवर्धन, प्रभावी विपणन और सामूहिक प्रयासों का समन्वय श्री अन्न आधारित उद्यमों को नई दिशा प्रदान कर सकता है। उन्होंने अपने प्रस्तुतीकरण में विभिन्न कृषि उद्यमों और महिला स्वयं सहायता समूहों के उदाहरणों के माध्यम से समझाया कि मोटे अनाजों के उत्पादन के साथ-साथ उनकी सफाई, छंटाई, प्रसंस्करण, पैकेजिंग, ब्रांडिंग तथा बाजार तक पहुँच विकसित करना भी आवश्यक है। इससे कृषि उत्पादों का मूल्य बढ़ाने और किसानों तथा ग्रामीण उद्यमियों के लिए आय के नए अवसर तैयार करने में सहायता मिल सकती है। उन्होंने स्लर्प फार्म (व्होलसम फूड्स प्राइवेट लिमिटेड), मिलेट बैंक, ओडिशा मिलेट्स मिशन के अंतर्गत कार्यरत महिला स्वयं सहायता समूहों, तमिलनाडु के थेनी स्थित मिलेट प्रसंस्करण उद्यम तथा टाटा सोलफुल जैसे उदाहरणों का उल्लेख किया।
इन उदाहरणों के माध्यम से उन्होंने बताया कि निजी उद्यमों, महिला समूहों, वित्तीय संस्थानों, सरकारी योजनाओं और अनुसंधान संस्थानों के बीच समन्वय स्थापित करके श्री अन्न आधारित व्यवसायों को आगे बढ़ाया जा सकता है। डॉ. शर्मा ने महिला उद्यमिता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के विकास पर विशेष जोर दिया। उन्होंने बताया कि महिला स्वयं सहायता समूह स्थानीय स्तर पर श्री अन्न से पौष्टिक खाद्य उत्पाद तैयार करके, उनका प्रसंस्करण करके और उन्हें बाजार में उपलब्ध कराकर आर्थिक रूप से सशक्त बन सकते हैं। विद्यालयों, आंगनवाड़ी केंद्रों और पोषण कार्यक्रमों में श्री अन्न आधारित खाद्य उत्पादों की संभावनाएँ भी ग्रामीण महिलाओं के लिए नए व्यावसायिक अवसर उत्पन्न कर सकती हैं। उन्होंने कृषि उद्यमों को सफल बनाने में वित्तीय सहायता, संस्थागत सहयोग, आधुनिक तकनीक, बाजार की समझ और सामूहिक भागीदारी के महत्त्व को भी रेखांकित किया। उनके अनुसार, श्री अन्न आधारित कृषि व्यवसाय केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पोषण सुरक्षा, महिला सशक्तिकरण, ग्रामीण रोजगार, किसानों की आय में वृद्धि और पर्यावरण के अनुकूल कृषि विकास को एक साथ जोड़ने का प्रभावी माध्यम बन सकता है।
सम्मेलन का मुख्य आकर्षण विद्यार्थियों के नौ समूहों की ओर से प्रस्तुत किए गए नवाचारी विचार रहे। पहले समूह में सिद्धार्थ सिरोही, हिमांशु पंवार, लविष सिरोही, हिमांशु, प्रशांत कुमार और पारस पंवार ने “एआई आधारित कीटों एवं पादप रोगों की पहचान और प्रबंधन : एग्री-टेक स्टार्टअप के अवसर” विषय पर प्रस्तुति दी। इस विचार के तहत कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मदद से फसलों में कीटों और रोगों की पहचान करने तथा उनके प्रबंधन के लिए तकनीक आधारित समाधान विकसित करने की संभावनाओं पर ध्यान केंद्रित किया गया। ऐसी प्रणाली किसानों को शुरुआती स्तर पर समस्या पहचानने और उचित प्रबंधन संबंधी निर्णय लेने में सहायता दे सकती है।
दूसरे समूह में मेहरवान, आकाश सिंह, चंद्रकांत मणि, वंश, पूजा चौहान और ज्योति जाखड़ ने “एंटोमोपैथोजेनिक कवकों से जैव कीटनाशक : नवाचार और उद्यमिता की संभावनाएं” विषय पर विचार प्रस्तुत किए। इस विषय में ऐसे कवकों के उपयोग पर जोर दिया गया, जो कीटों को संक्रमित कर उनके नियंत्रण में सहायक हो सकते हैं। समूह ने जैविक कीट नियंत्रण से जुड़े उत्पादों के विकास और उनके व्यावसायिक उपयोग की संभावनाओं को रेखांकित किया। यह क्षेत्र कृषि में रासायनिक कीटनाशकों के विकल्पों पर शोध और जैव-आधारित उत्पादों के विकास के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
तीसरे समूह में आदित्य दास, सुहानी सिंह, संगम, सुहानी आर्या, नेहा और खुशी चौहान ने “नैनो-जैव कवकनाशक : टिकाऊ रोग प्रबंधन के लिए उभरता नवाचार” विषय पर प्रस्तुति दी। इसमें नैनो तकनीक और जैविक घटकों के संयोजन से फसल रोगों के प्रबंधन के लिए नए विकल्प विकसित करने की संभावनाओं पर ध्यान दिया गया। इस प्रकार के नवाचार का उद्देश्य पौधों को प्रभावित करने वाले रोगों के नियंत्रण के लिए अधिक प्रभावी और टिकाऊ समाधान तलाशना है।
चौथे समूह में समृति, तमन्ना, ज्योति, शिवानी और सचिन ने “जलवायु-स्मार्ट कृषि के लिए पादप रोगों का पूर्वानुमान और प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली” विषय प्रस्तुत किया। समूह के विचार का केंद्र रोगों के संभावित जोखिम की समय रहते पहचान करना रहा। मौसम और फसल स्वास्थ्य से संबंधित जानकारियों का विश्लेषण करके रोग फैलने की आशंका का पूर्वानुमान लगाने वाली प्रणालियां किसानों को समय पर आवश्यक कदम उठाने में मदद कर सकती हैं। इससे फसल प्रबंधन की योजना बनाने और संभावित नुकसान को कम करने के प्रयासों को दिशा मिल सकती है।
पांचवें समूह में भवानी चौहान, ऋषभ सिंह, गगन राणा, अभिमन्यु चौहान, अनुराग सिंह और आदित्य कुमार ने “डिजिटल पादप स्वास्थ्य परामर्श सेवाएं : रोग प्रबंधन का उभरता व्यावसायिक मॉडल” विषय पर प्रस्तुति दी। इस विचार में डिजिटल माध्यमों के जरिए पौधों के स्वास्थ्य, रोगों की पहचान और उनके प्रबंधन से संबंधित परामर्श उपलब्ध कराने की संभावनाओं को रेखांकित किया गया। ऐसी सेवाएं किसानों और कृषि विशेषज्ञों के बीच संपर्क को आसान बनाने तथा तकनीक आधारित कृषि सेवाओं को उद्यम के रूप में विकसित करने का माध्यम बन सकती हैं।
छठे समूह में विशाल पाल, विनीत सैनी, वंश कुमार, विकास कुमार, आयुष और विनीत कुमार ने “लाभकारी कीटों का बड़े पैमाने पर उत्पादन : कृषि उद्यमिता का एक संभावनाशील मॉडल” विषय पर विचार रखे। इसमें उन लाभकारी कीटों के उत्पादन और उपयोग से जुड़ी संभावनाओं पर ध्यान दिया गया, जो कृषि में कीट प्रबंधन और प्राकृतिक संतुलन बनाए रखने में सहायक हो सकते हैं। लाभकारी कीटों का वैज्ञानिक तरीके से उत्पादन और किसानों तक उनकी उपलब्धता सुनिश्चित करना कृषि आधारित उद्यमिता के लिए एक उपयोगी क्षेत्र बन सकता है।
सातवें समूह में अंश कुमार, अनमोल चौधरी, अंशुल शर्मा, भूपेश शर्मा और मुकेश कुमार भड़ाना ने “लाभकारी सूक्ष्मजीवों के जैव-फॉर्मुलेशन : पादप रोग प्रबंधन में नवाचार और स्टार्टअप की संभावनाएं” विषय पर प्रस्तुति दी। इस विषय में ऐसे जैव उत्पाद विकसित करने की संभावनाओं पर जोर दिया गया, जिनमें लाभकारी सूक्ष्मजीवों का उपयोग करके पौधों के स्वास्थ्य और रोग प्रबंधन में सहायता मिल सके। प्रयोगशाला में विकसित तकनीकों को उपयोगी उत्पादों में बदलना तथा उनकी गुणवत्ता और प्रभावशीलता सुनिश्चित करना इस क्षेत्र के व्यावसायिक विकास में महत्वपूर्ण हो सकता है।
आठवें समूह में विश्वात्मन शुक्ला, सौम्या उपाध्याय, निशांत कुमार, प्रियांश और दीपिका ने “ट्राइकोडर्मा आधारित जैव कवकनाशक : प्रयोगशाला के नवाचार से व्यावसायिक उद्यम तक” विषय पर अपने विचार प्रस्तुत किए। ट्राइकोडर्मा लाभकारी कवकों का एक समूह है, जिसकी कुछ प्रजातियों का उपयोग पौधों में रोग पैदा करने वाले कवकों के प्रबंधन के लिए किया जाता है। समूह ने इस क्षेत्र में प्रयोगशाला आधारित शोध को व्यावहारिक कृषि उत्पादों और व्यावसायिक अवसरों से जोड़ने की संभावनाओं पर ध्यान केंद्रित किया।
नौवें समूह में जुनैद, कृष्ण कुमार, प्रशांत शर्मा, रविकांत और रेखा बाई ने “कीटों की स्वचालित पहचान और निगरानी के लिए एआई तथा स्मार्ट ट्रैप” विषय पर प्रस्तुति दी। इस विचार में सेंसर, स्मार्ट ट्रैप और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के माध्यम से खेतों में कीटों की निगरानी को अधिक व्यवस्थित बनाने की संभावनाओं पर जोर दिया गया। ऐसी तकनीक कीटों की गतिविधियों से संबंधित जानकारी एकत्र करने और उनके प्रबंधन के लिए समय पर निर्णय लेने में मदद कर सकती है।
सम्मेलन में प्रस्तुत इन नौ विषयों ने स्पष्ट किया कि कृषि उद्यमिता का दायरा केवल पारंपरिक कृषि गतिविधियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डिजिटल सेवाओं, जैव प्रौद्योगिकी और पर्यावरण अनुकूल उत्पादों के विकास के लिए भी अवसर मौजूद हैं। विद्यार्थियों की प्रस्तुतियों में जहां एक ओर फसल रोगों और कीटों की पहचान को तकनीक से जोड़ने की संभावनाएं सामने आईं, वहीं दूसरी ओर जैविक उत्पादों के निर्माण, लाभकारी जीवों के उपयोग और डिजिटल परामर्श सेवाओं को व्यावसायिक मॉडल के रूप में विकसित करने पर भी ध्यान दिया गया।
विशेषज्ञों की सहभागिता वाले इस राष्ट्रीय सम्मेलन ने कृषि विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए नवाचार और उद्यमिता के विभिन्न क्षेत्रों को समझने का अवसर उपलब्ध कराया। ऐसे प्रयास कृषि से जुड़ी समस्याओं के समाधान तलाशने, शोध को व्यावहारिक उपयोग से जोड़ने और भविष्य में कृषि आधारित स्टार्टअप विकसित करने की दिशा में उपयोगी भूमिका निभा सकते हैं। कार्यक्रम का आयोजन चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के पादप संरक्षण विभाग की ओर से किया गया।


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