Breaking

Your Ads Here

Sunday, August 9, 2026

कदमों में रफ्तार, जुबां पर भोले का नाम... आठ घंटे में हरिद्वार से मेरठ

 


-डाक कांवड़ बनी युवाओं की आस्था, अनुशासन और संगठन शक्ति की परीक्षा


लियाकत मंसूरी

नित्य संदेश, मेरठ। रात का सन्नाटा हो या दिन की तपती सड़क... कंधे पर कांवड़ और पैरों में रफ्तार लिए युवाओं की टोली शिवालयों की ओर दौड़ रही है। हरिद्वार से गंगाजल लेकर बढ़़ती टोलियों से आभास होता है कि डाक कांवड़ यात्रा सिर्फ आस्था का सफर नहीं, बल्कि शरीर, मन और अनुशासन की कठिन परीक्षा भी है। सामान्य कांवड़ यात्रा में जहां श्रद्धालु अपने गंतव्य की दूरी कई दिनों में पूरी करते हैं, वहीं डाक कांवड़िएं 8 से 10 घंटे के भीतर हरिद्वार से मेरठ तक पहुंचने का लक्ष्य लेकर दौड़ रहे हैं।


डाक कांवड़ के लिए युवाओं की असली यात्रा सावन शुरू होने से करीब दो महीने पहले शुरू हो जाती है। युवाओं की दिनचर्या बदलती है और सुबह की नींद की जगह दौड़ और व्यायाम का अभ्यास होता हैं। अलवर डाक कांवड़ लेकर जा रहे राहुल चौधरी ने बताया कि धीरे-धीरे दौड़ की दूरी और समय बढ़ाया जाता है, ताकि शरीर लगातार कई घंटे तक रफ्तार बनाए रखने के लिए तैयार हो सके। जयराम ने कहा कि खानपान पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है। तला-भुना और ऐसा भोजन कम किया जाता है, जिससे शरीर पर अनावश्यक बोझ पड़े। पौष्टिक भोजन और पर्याप्त पानी के साथ शरीर को लंबी दौड़ के लिए तैयार किया जाता है। एटा निवासी आशुतोष ने कहा कि युवाओं का लक्ष्य साफ रहता है- हरिद्वार पहुंचना, गंगाजल उठाना और तय समय में अपने शिवालय तक पहुंचकर जल चढ़ाना।



एकता का संदेश देती हैं डाक कांवड़

डाक कांवड़ की सबसे बड़ी खासियत इसकी सामूहिकता है। एक दल में 25 से लेकर 45 तक युवा शामिल होते हैं। हर सदस्य की अपनी भूमिका और जिम्मेदारी होती है। कोई आगे रहकर गति बनाए रखता है तो कोई पीछे चल रहे साथियों का हौसला बढ़ाता है। पूरी टोली एक-दूसरे की रफ्तार के साथ कदम मिलाकर चलती है। टीम भावना डाक कांवड़ को सामान्य दौड़ से अलग बनाती है। यहां मंजिल तक पहुंचना किसी एक की उपलब्धि नहीं, बल्कि पूरी टोली के संकल्प की जीत होती है।



घंटों की दौड़ में परीक्षा शरीर की नहीं, संकल्प की

हरिद्वार से अलवर तक की 400 किमी की दूरी को 22 घंटे में पूरा करना आसान नहीं। लगातार दौड़ने से पैर जवाब देने लगते हैं, शरीर पसीने से तर हो जाता है और सांसें तेज चलने लगती हैं। लेकिन जैसे ही टोली में कोई ’’हर-हर महादेव’’ का उद्घोष करता है, बाकी आवाजें भी उसी में शामिल हो जाती हैं। जयघोष के साथ कदम फिर तेज हो जाते हैं। एक साथ दौड़ते 25 से 45 युवाओं की टोली, कांवड़ की रफ्तार और शिवभक्ति के जयघोष का यह दृश्य अपने आप में अलग ही ऊर्जा पैदा करता है।



समय की पाबंदी और अनुशासन भी

डाक कांवड़ में पूरी टोली को समय, मार्ग और आपसी तालमेल का भी ध्यान रखना पड़ता है। भोजन, विश्राम और आगे बढ़ने की व्यवस्था पहले से तय रहती है। मेरठ निवासी राहुल कहते हैं कि यही कारण है कि महीनों की तैयारी के बाद जब टोली हरिद्वार से निकलती है तो हर सदस्य अपने संकल्प और जिम्मेदारी से परिचित होता है। मंजिल पर पहुंचकर जब यही जल भोलेनाथ को अर्पित होता है तो घंटों की दौड़, थकान और रास्ते की मुश्किलें सब पीछे छूट जाती हैं। यही डाक कांवड़ का रंग है- कदम दौड़ते हैं, टोली साथ चलती है और मन में सिर्फ एक ही मंजिल रहती है... भोलेनाथ का जलाभिषेक।

No comments:

Post a Comment

Your Ads Here

Your Ads Here