नित्य संदेश ब्यूरो
मेरठ। विधि अध्ययन संस्थान, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, मेरठ के समन्वयक डॉ. विवेक कुमार त्यागी, एसोसिएट प्रोफेसर ने World Congress Toward Global Recognition of older Adults, New Fundamental Rights, Autonomy, Legal Capacity, And Comprehensive Policies For Social, Labor, And Digital Inclusion, Minas Gerais में व्याख्यान दिया।
उनके वक्तव्य का शीर्षक "धर्म मीट्स राइट्स: हिंदू फिलॉसॉफिकल फाउंडेशन्स फॉर ए ग्लोबल चार्टर ऑफ ओल्डर एडल्ट्स ऑटोनॉमी, लीगल कैपेसिटी, एंड इंक्लूसिव डिजिटल फ्यूचर्स" रहा। दुनिया भर से आए समाजशास्त्र, कानून और वृद्धजन कल्याण विशेषज्ञों को संबोधित करते हुए डॉ. त्यागी ने कहा कि बुजुर्गों के अधिकारों का वैश्विक ढांचा केवल पश्चिमी व्यक्तिगत स्वतंत्रता (लिब्रलिज्म) पर आधारित नहीं होना चाहिए, बल्कि इसमें अन्य सांस्कृतिक और दार्शनिक परंपराओं को भी स्थान मिलना चाहिए। उन्होंने प्राचीन भारतीय 'धर्म' के सिद्धांतों को एक व्यावहारिक और मजबूत आधार के रूप में प्रस्तुत किया, जो बुजुर्गों की स्वायत्तता, कानूनी अधिकारों और डिजिटल समावेशन को सशक्त बना सकता है। डॉ. त्यागी ने अपने संबोधन में वरिष्ठ नागरिकों के सामने आ रही तीन प्रमुख वैश्विक चुनौतियों को रेखांकित किया:
1. गरिमा की कमी (डिग्निटी गैप), 2. कानूनी अधिकारों से उन्हें वंचित करने की प्रथा (कैपेसिटी गैप), और 3. डिजिटल तकनीक से उनका अलगाव (डिजिटल गैप)।
कानूनी व्यक्तित्व और आत्मन का सिद्धांत: डॉ. त्यागी ने संयुक्त राष्ट्र के 'दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकारों पर कन्वेंशन' (CRPD) के अनुच्छेद 12 की तुलना भारतीय दर्शन के 'आत्मन' (अविनाशी आत्मा) के सिद्धांत से की। उन्होंने कहा कि मनुष्य की गरिमा और उसके कानूनी अधिकार शारीरिक या मानसिक क्षमता पर निर्भर नहीं होते, बल्कि वे व्यक्ति के अस्तित्व में ही निहित हैं।
सहायता प्राप्त निर्णय प्रक्रिया (सपोर्टेड डिसीजन-मेकिंग): उन्होंने 'वानप्रस्थ' आश्रम की पुनर्व्याख्या करते हुए इसे बुजुर्गों द्वारा स्वयं चुना गया एक स्वैच्छिक चरण बताया। उन्होंने मांग की कि बुजुर्गों पर जबरन निर्णय थोपने के बजाय उन्हें अपने निर्णय स्वयं लेने के लिए सहायता प्रदान की जानी चाहिए।
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