विजय मान
नित्य संदेश। भारत आज विश्व का सबसे युवा देश है। यह केवल जनसंख्या का आँकड़ा नहीं, बल्कि 21वीं सदी की सबसे बड़ी राष्ट्रीय शक्ति है। जिस देश की आधे से अधिक आबादी युवा हो, वहाँ राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिक परिवर्तन की दिशा भी युवाओं की सोच से तय होती है। इसलिए आज सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि युवा किस राजनीतिक दल के साथ खड़ा है, बल्कि यह है कि युवा किन मूल्यों और किन प्राथमिकताओं के साथ खड़ा है।
निस्संदेह, प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता, रोजगार, महँगाई, शिक्षा की गुणवत्ता और अवसरों की समानता आज के युवाओं की प्रमुख चिंताएँ हैं। पेपर लीक जैसी घटनाएँ लाखों युवाओं के परिश्रम पर प्रश्नचिह्न लगा देती हैं। ऐसे में युवाओं का आक्रोश स्वाभाविक है। लोकतंत्र में अपनी बात कहना उनका अधिकार भी है और व्यवस्था के लिए आवश्यक चेतावनी भी, लेकिन क्या आज का युवा केवल इन मुद्दों तक सीमित है? मेरा मानना है कि इसका उत्तर "नहीं" है। आज का भारतीय युवा अपने व्यक्तिगत भविष्य के साथ-साथ देश के भविष्य को भी लेकर गंभीर है। वह चाहता है कि उसे सम्मानजनक रोजगार मिले, लेकिन वह यह भी चाहता है कि भारत विश्व मंच पर सम्मानपूर्वक खड़ा दिखाई दे। वह चाहता है कि प्रतियोगी परीक्षाएँ निष्पक्ष हों, लेकिन वह यह भी चाहता है कि देश की सीमाएँ सुरक्षित रहें। वह अवसर भी चाहता है और आत्मगौरव भी।
इसी संदर्भ में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत का यह कथन कि "युवाओं से आदेश नहीं, संवाद आवश्यक है" विशेष महत्व रखता है। बदलते समय में यह स्वीकार करना होगा कि आज की पीढ़ी केवल निर्देशों का पालन करने वाली पीढ़ी नहीं है। वह प्रश्न पूछती है, तर्क करती है और उत्तर चाहती है। संवाद ही विश्वास का आधार बन सकता है।
यह भी सत्य है कि डॉ. भागवत के कुछ सार्वजनिक वक्तव्य समय-समय पर राजनीतिक बहस का विषय बने हैं। लोकतंत्र में यह स्वाभाविक है। किसी भी सार्वजनिक व्यक्तित्व के विचारों से सहमति और असहमति दोनों हो सकती हैं। किंतु यदि संवाद की संस्कृति मजबूत होती है, तो मतभेद भी लोकतांत्रिक शक्ति बन जाते हैं।
दूसरी ओर, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डिजिटल युग में संवाद की शक्ति को नए स्तर पर पहुँचाया है। सोशल मीडिया, विशेषकर युवाओं के बीच लोकप्रिय मंचों पर उनकी सक्रियता ने राजनीतिक संप्रेषण का स्वरूप बदला है। समर्थक इसे उनकी व्यापक जनस्वीकार्यता और संवाद क्षमता का प्रमाण मानते हैं, जबकि आलोचक इसकी अलग व्याख्या करते हैं। परंतु यह निर्विवाद है कि आज राजनीति में जनता से सीधा संवाद एक महत्वपूर्ण साधन बन चुका है।
मेरे विचार में भारत का युवा आज किसी भी सरकार से तीन स्पष्ट अपेक्षाएँ रखता है। पहली—पारदर्शी और निष्पक्ष व्यवस्था। दूसरी—योग्यता के अनुरूप रोजगार और अवसर। तीसरी—एक सुरक्षित, आत्मविश्वासी और विश्व में सम्मानित भारत।
युवा चाहता है कि उसकी मेहनत का मूल्य मिले। उसे नौकरी भी मिले और उद्यमिता के अवसर भी। वह आधुनिक तकनीक और नवाचार के साथ आगे बढ़ना चाहता है। लेकिन इसके साथ ही वह राष्ट्रीय सुरक्षा, आतंकवाद के विरुद्ध कठोर नीति, सीमाओं की सुरक्षा और भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा को भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानता है। उसके लिए विकास और राष्ट्रहित एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
यह कहना उचित नहीं होगा कि भारत का हर युवा एक ही राजनीतिक विचारधारा का समर्थक है। लोकतंत्र की शक्ति ही विविधता में निहित है। युवाओं के विचार अलग हो सकते हैं, प्राथमिकताएँ भिन्न हो सकती हैं और राजनीतिक पसंद भी अलग-अलग हो सकती है। किंतु एक बात लगभग सभी में समान दिखाई देती है—वे एक सक्षम, विकसित, सुरक्षित और सम्मानित भारत देखना चाहते हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार, विपक्ष, सामाजिक संगठन और सभी वैचारिक संस्थाएँ युवाओं को केवल मतदाता न समझें, बल्कि नीति निर्माण का सहभागी बनाएँ। संवाद हो, विश्वास हो और उत्तरदायित्व हो। युवा केवल सुनना नहीं चाहता, वह सुना भी जाना चाहता है।
भारत का भविष्य केवल चुनावी जीत या हार से तय नहीं होगा। उसका भविष्य इस बात से तय होगा कि हम अपनी युवा शक्ति को कितना विश्वास, कितना अवसर और कितना सम्मान दे पाते हैं। यदि हम ऐसा कर सके, तो विकसित भारत का लक्ष्य केवल एक सपना नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों की वास्तविकता होगा।
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